इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 2

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हर्वड स्पेंशर:- हर्बट स्पेंशर का विकासवाद-विकास का अर्थ- अस्थिर से स्थिर की ओर, सरल से जटिल की ओर जाना, अव्यस्थित से व्यवस्थित की ओर बढ़ना। अविकास से विकास की ओर जाना।

स्पेंशर विचारधार-

  • स्पेंशर ने विकासवाद का वही अर्थ लिया है जो डार्विन ने लिया था अर्थात विकास का अर्थ है सरलता से जटिलता, अव्यवस्था से व्यवस्था तथा एकता से अनेकता की ओर अग्रसर होना, स्पेंशर का दावा है कि विकास का यह नियम सिर्फ जीवशास्त्र पर लागू नहीं होता, इसमें समाज तथा नैतिकता के नियम भी निर्धारित होते हैं।

  • स्पेंशर के अनुसार विकासवाद जिसका अर्थ है प्रकृति के साथ प्राणी के समायोजन ंकरने (समायोजन) की निरन्तर प्रक्रिया, जो कर्म वातावरण के साथ मनुष्य के समायोजन में सहायक है, वे शुभ है और विरोधी कर्म अशुभ है, शुभत्व की मात्रा भी इसी से तय होती है कि कोई कर्म मनुष्य के अस्तित्व को बचाने या उसके दीर्घ जीवन में कितना सहायक है

  • नैतिकता के विकास की प्रक्रिया के दो चरण है-सापेक्ष नैतिकता तथा निरपेक्ष नैतिकता।

सापेक्ष नैतिकता:-

सभ्यता की शुरूआत में सापेक्ष नैतिकता होती है इस समय मनुष्यों का आचरण कम विकसित होता है अर्थात वह प्राय: ऐसा आचरण करते है जो समायोजन में बाधक होता है। उदाहरण-आपस में संघर्ष करना, सहयोग न करना।

निरपेक्ष नैतिकता:-

धीरे-धीरे आचरण विकसित होता है और समायोजन बेहतर होने लगता है। नैतिक विकास की चरम स्थिति तब आती है जब, व्यक्ति का समायोजन के मूल्यों से पूर्ण सामंजस्य हो जाता है, उसका अन्य व्यक्तियों से विरोध पूर्णतय समाप्त हो जाता है और वह सामाजिक हित मे ही अपना हित देखने लगता है, व्यक्तिगत हित की पृथक धारणा उसमें मन से पूर्णत: समाप्त हो जाती है इसी स्थिति को स्पेंशर ने निरपेक्ष नैतिकता कहा है।

नैतिक नियमों के संदर्भ में स्पेंशर के कुछ विचार-

  • हजारों वर्षों में हमारे पूर्वजों ने जिन नैतिक नियमों और सद्गुणों की खोज की है वे समाज की जीवन रक्षा के उद्देश्य पर ही आधारित है अत: सामान्यत: उनका पालन करना उचित है।

  • स्पेंशर होबिस और वेथम की तरह मनुष्य को केवल स्वार्थी नही मानते और न ही मार्क्स की तरह उसे मूलत: परार्थी मानते है वह सिजविक की तरह इस विचार से सहमत है कि मनुष्य में स्वार्थ और परार्थ दोनों प्रवृत्तियां होती है, केवल स्वार्थ जितना गलत है उतना ही गलत परार्थ भी है, स्वार्थ अपने आप में बुरी प्रवृत्ति नही है क्योंकि इसी के कारण आत्मरक्षा और विकास की प्रेरणायें उत्पन्न होती है। व्यक्ति के स्वार्थ को वहीं अनैतिक माना जाना चाहिए जहाँ वह समाज का अहित कर रहा हो।

  • प्रत्येक व्यक्ति को वहाँ तक पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जहाँ तक उसके कार्य किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधक न होते हों।

  • प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमताओं के अनुसार ही महत्व तथा विकास के अवसर मिलने चाहिए, योग्य व्यक्ति को अधिक अवसर मिलने चाहिए क्योंकि वह अपनी योग्यता के बलबूते समाज के विकास मेें अपेक्षाकृत बढ़ी भूमिका निभाता है।

  • समाज का जो सदस्य जितना असहाय है उसे बाकी सदस्यों का उतना ही सहयोग और संरक्षण मिलना चाहिए, यह बात मुख्यरूप से बच्चों के पालन-पोषण के संदर्भ में लागू होती है।

  • संकट की अवस्था में समाज का अस्तित्व बचाये रखने के लिए कुछ व्यक्तियों की बलि उचित है क्योंकि नैतिकता का मूल उद्देश्य समाज के अस्तित्व को बचाना है।

स्पेंशर इस दृष्टिकोण के प्रमुख व्याख्याकार है जिसकी धारणा को विकासात्मक सुखवाद भी कहा जाता है, उन्होंने सुखवादी आधार लेते हुये विकासवाद के नियमों को नीतिशास्त्र में शामिल किया है।

स्पेंशर ने नीतिशास्त्र में सुखवाद का आधार भी लिया है उसके प्रमुख विचार इस प्रकार है-

  • सुख ही एकमात्र स्वत: साध्य शुभ है, शुभ या अशुभ की व्याख्या सिर्फ सुख की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर हो सकती है सदगुण भी सुख के आधार पर परिभाषित हो सकते है।

  • सबसे अच्छा आचरण वह है जो अमिश्रित सुख उत्पन्न करें। पर ऐसा आचरण निरपेक्ष नैतिकता के स्तर पर ही संभव है वहाँ मनुष्य का वातावरण के साथ पूर्ण सामंजस्य हो जाता है, सापेक्ष नैतिकता में प्रत्येक सुख दुखों के साथ मिश्रित होता है सुखो की उच्चता और निम्नता का फैसला सुख और दुख के ratio (अनुपात) से होता है।

मूल्यांकन-

  • जैविक नियम तथ्यात्मक होते है जबकि नैतिक नियम के आदर्श अलग है तथ्यात्मक नियम से आदर्श मूलक नियमक को निकालना तर्क शास्त्रीय मूल है।

  • विकासवाद और सुखवाद का संबंध उलझा हुआ है स्पेंशर स्पष्ट नहीं कर पाते, इनमें से मूल सिद्धांत कौनसा हैं।

  • यह मानकर चलना उचित नही है कि मनुष्य लगातार नैतिक दृष्टि से बेहतर दृष्टि की ओर बढ़ रहा है और भविष्य में निरपेक्ष नैतिकता आने वाली है। (कई मामलों में जनजातीय समाज विकसित समाज से बेहतर है।)

  • यह मानना भी गलत है कि विकास के साथ-साथ वातावरण के साथ सामंजस्य बढ़ रहा है अगर ऐसा होता तो ग्लोबल (विश्वव्यापी) वार्मिंग (गरमाना) और ओजोन परत क्षरण जैसे संकट क्यों उत्पन्न होते

  • काल्पनिक नहीं ठोस यथार्तपरक आधार

  • निरपेक्ष नैतिकता की दशा में समाज को नैतिक मूल्यों पर बल देने की आवश्यकता नहीं होगी पर यह अवस्था एवं आदर्श मात्र है जो वर्तमान स्थिति से काफी अलग है, वर्तमान स्थिति सापेक्ष नैतिकता की है और उसके लिए नैतिक नियमों की जरूरत पड़ती है।