सूचना का अधिकार (Right to Information) Part 17

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12 राज्यों में सूचना के अधिकार की प्रगति का विवरण-

12 राज्यों में सूचना के अधिकार अधिनियम की प्रगति की स्थिति का आकलन एशिया में सहभागी शोध (पीआरआईए) के दव्ारा किया गया। इन बारह राज्यों में शामिल थे-हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, केरल, गुजरात एवं बिहार। इन राज्यों में राज्य सूचना आयोगों के गठन, इनकी भूमिका, नोडल (केन्द्रीय) एंजेसियों (शाखा) की भूमिका, लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति, इनसे सूचना प्राप्ति के अनुभव, आरटीआई अधिनियम की धारा IV में प्रकट बाध्यताएँ एवं अधिनियम की धारा 26 के तहत लोगों को आरटीआई के बारे में शिक्षित करने में सरकार की भूमिका इत्यादि का अध्ययन किया गया।

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ राज्य सूचना आयोग का गठन एवं भूमिका-अध्ययन में पाया गया कि इन 12 राज्यों में से अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी 11 राज्यों में सूचना आयोग अगस्त 2006 तक गठित किये जा चुके थे। परन्तु इनमें से कुछ राज्यों जैसे- बिहार, झारखंड उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान में राज्य सूचना आयोगों की स्थापना में कुछ महीनों की देरी हुई। इन्हें पर्याप्त अवसंरचनाएँ जैसे कार्यालय, कम्यूटर (परिकलक), स्टॉफ (कर्मचारी) व निधियाँ आदि उपलब्ध नहीं कराई गई थीं। उदाहरण के लिये, उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में कार्यबोझ ज्यादा था और केवल दो सूचना आयुक्त ही नियुक्त किये गये थे। बिहार राज्य सूचना आयुक्त ने हाल ही में शपथ ली थी परन्तु कार्यालय का पता वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं था। राजस्थान सूचना आयोग एक कमरे में कार्य कर रहा था। लोक सूचना अधिकारियों दव्ारा कर्तव्य की अवहेलना करने पर भी राज्य सूचना आयोग उनको दंडित करने के अनिच्छुक थे। इस तरह के मामले में दंडित करने के बहुत कम उदाहरण थे (उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश में ही कुछ पेनाल्टी (दंड) के मामले देखे गये थे)। ग्रामीण क्षेत्रीय लोगों ने महसूस किया कि अपील प्रक्रिया काफी महँगी थी। (मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ में अपील के लिये फीस (शुल्क) का प्रावधान था)। हालांकि डाक के माध्यम से अपील करने का प्रावधान था परन्तु लोगों को लगता था कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पक्ष को सही ढंग से नहीं रखा जा सकेगा। आवेदन शुल्क हरियाणा में सर्वाधिक था (50रु) एवं फोटोकॉपी (फोटो प्रतिलिपि) फीस (शुल्क) सर्वाधिक हिमाचल प्रदेश में थी (10 रु प्रति पृष्ठ)

  • नोडल (केन्द्रीय) एजेंसियों (शाखा) की भूमिका-उत्तराखंड, मध्यपद्रेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, राजस्थान एवं केरल में लोक सूचना अधिकारियों के प्रशिक्षण की प्रक्रिया राज्य की नोडल एजेंसियों के माध्यम से शुरू की गई सुशासन के लिये केन्द्र, यशादा (पुणे) एवं लोक प्रशासन संस्थान की देखरेख में सर्वेक्षण वाले राज्यों के लोक सूचना अधिकारयों (पीआईओ) के लिये प्रशिक्षण कार्य चल रहा था। सूत्र विभागो एवं खंड विकास अधिकारी और लोक सूचना अधिकारी का प्रशिक्षण संतुष्टिपूर्ण नहीं था। इनमें से कई तो अधिनियम के प्रति जागरूक भी नहीं थे। प्रखंड विकास अधिकारियों (बीडीओएस) और पंचायत सचिवों को प्रशिक्षण नोडल (प्रधान) एजेंसीज (शाखा) दव्ारा कैसे दिया जायेगा। यह स्पष्ट नहीं था। कोई समय सीमा व रोडमैप (सड़क मानचित्र) तैैयार नहीं था। उत्तर प्रदेश में ही 52 हजार ग्राम पंचायतों के पंचायत सचिवों को प्रशिक्षण दिया जाना था और बजट केवल दस लाख वार्षिक था। आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, आदि राज्यों की नोडल एजेंसी ने आरटीआई सीखने की सामग्रियों (टेम्पलेट, पर्चे आदि) के माध्यम से सूचना प्रसारित की। वहीं अन्य राज्यों में इसकी गति काफी धीमी थी। केरल में आरटीआई एक्ट (अधिनियम) मलयालम था जिसे पढ़े-लिखे लोगों की समझना में कठिनाई आ रही थी।

  • लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति कई जगह लोक अर्थोरिटी (अधिकार) की परिभाषा को लेकर संदेह व्याप्त थी। कुछ राज्यों में जैसे केरल में कई लोक अर्थोरिटी (अधिकार) वर्ग ऑपरेटिव (कार्यकारी) बैंक (अधिकोष) सहायता प्राप्त शैक्षिक संस्थाएँ घोषणा कर रही थी कि वे आरटीआई एक्ट (अधिनियम) के तहत नहीं आते। इसी तरह हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड में बांधों के निजी बिल्डर (निर्माता) एवं निजी बैंक भी घोषणा कर रहे थे। केन्द्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों को इस मुद्दे को स्पष्ट करना आवश्यक है। हरियाणा एवं पंजाब के उच्च न्यायालय में जो कि लोक अथॉरिटी हैं, कोई लोक सूचना अधिकारी नहीं थे। कई जगह ऐसे व्यक्तियों को लोक सूचना अधिकारी नियुक्त किया जिनकी सूचना लोगो तक आसानी से नहीं पहुंच सकती थी। उत्तराखंड में सरपंच को लोक सूचना अधिकारी बना दिया था हिमाचल प्रदेश में प्रखंड सूचना विकास अधिकारी के ग्राम पंचायत तक के लिये पीआईओएस नियुक्त किया गया। पीआईओएस सामान्यत: विभाग के जूनियर (कनिष्ठ) अधिकारियों को बनाया गया जिन्हें वरिष्ठ अधिकारियों से सूचना लेने मेें कठिनाई आती थी, पीआईओएस को नियुक्ति की गई किन्तु लोग प्राधिकरणों की आवश्यकता के अनुसार नहीं। अधिकतर लोक प्राधिकरणों में (यहाँ तक कि जिला स्तर पर भी) पीआईओएस के नाम पट्‌िटकाओं का अभाव पाया गया, जिससे लोगों को यह जानकारी नहीं मिल पा रही थी कि आवेदन कहाँ जमा किये जायें।

  • पीआईओएस से सूचना प्राप्ति का अनुभव- राज्य एवं जिला स्तर अधिकतर पीआईओएस सहयोगी नहीं थे, कई बार वे आवेदक के आवदेन वापस लेने आ जाते थे। ऐसा उदाहरण हरियाणा में देखने को मिला। ऐसे ही कुछ उदाहरण, उत्तर पद्रेश, मध्ध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में देखे गये। अधिकतर पीआईओएस यह नहीं जानते थे कि किस अधिकारी के अधीन आवदेन शुल्क निक्षेपित किया जाये। ये अधिकतर अनुपस्थित रहते थे और उनकी अनुपिस्थति में कोई अन्य आवेदन नहीं होता था। शुल्क पोस्टल (डाक) ऑर्डर (आदेश) के माध्यम से ली जा सकती थी परन्तु अधिकतर पीआईओएस ने ऐसी फीस (शुल्क) यह कह कर लौटा थी कि पोस्टल ऑर्डर के माध्यम से फीस लिये जाने का कोई प्रावधान नहीं है। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में ही पीआईओएस पक्षतापपूर्ण ढंग से कई लोगों से बिना पैसे लिए उन्हें सूचना दे रहे थे। लोगों की आवश्यकताओं के प्रति संवदेनशील बनाने के लिए पीआईओएस को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये और जानबूझकर दोषपूर्ण कार्य करने वाले पीआईओएस को या सूचना देने से इंकार करने पर सजा दी जानी चाहिये।

  • पीआईओएस अधिनियम की धारा IV में प्रकट बाधाएँ- मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं आंध्र प्रदेश के मंत्रालय एवं निदेशालय स्तर के कार्यालयों ने अपनी क्रियाविधियों की जानकारी अपनी वेबसाइट में दी हुई थी। जबकि हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, राजस्थान एवं बिहार के सरकारी विभागो में आरटीआई अधिनियम की धारा IV के क्रियान्वयन के लिए कोई कदम नहीं उठाये थे। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश के कृषि विभाग ने आरटीआई एक्ट (अधिनियम) की धारा IV के बहुत से मुद्दे अपना लिये थे कार्यालयीन एवं पीआईओएस की सूची मंत्रालयों व निदेशालयों में नहीं थी। साथ ही खर्चो का विवरण केवल वरिष्ठों के हाथों में था, जिला व प्रखंड स्तरीय फंड (निधि) का विवरण उपलब्ध नहीं था, दिनांक आदि नहीं डाली जाती थी। यह भी देखा गया कि इन 12 राज्यों में जिला प्रखंड एवं पंचायत स्तर पर स्व-प्रकटीकरण प्रारंभ नहीं किया था।

  • आरटीआई एक्ट (अधिनियम) की धारा 26 के तहत लोगों को शिक्षित करने की सरकार की भूमिका-आरटीआई के अभियान एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अनुभव दर्शाता है कि लगभग 90 प्रतिशत लोग एक्ट (अधिनियम) के प्रति जागरूक नहीं हैं, एवं वे आवदेन करने को जागरूक नहीं है। शिक्षित लोगों विशेषत: सरकारी सेवकों के लिए आरटीआई का कम उपयोग प्रतिबंधित है। आरटीआई का ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग सभी राज्यों में शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा में काफी कम था। सरकार ने आरटीआई को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत) एवं प्रिंट (छाप) मीडिया (संचार माध्यम) का न ही इस्तेमाल किया और न ही कोई अभियान चलाया। केन्द्रीय एवं राज्य दोनों सरकारों ने आरटीआई अभियान के लिए न ही कोई निधि अखंडित की और न ही नोडल (केन्द्रीय) एजेंसियों (शाखा) का कोई सहयोग किया।