सूचना का अधिकार (Right to Information) Part 5

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भारत में सूचना का अधिकार का इतिहास

पूरी दुनिया में सूचना की आजादी के आंदोलनो से भारत में भी इसकी जरूरत महसूस हुई। हालांकि यह माना जाता है कि भारत के संविधान की धारा 19(1) (क) में जानने का अधिकार भी निहित है। इसमें सभी नागरिकों को वाक्‌-स्वातंत्रय एवं अभिव्यक्ति-स्वातंत्रय के अधिकार की बात है संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का ही अलग से उल्लेख नहीं है। प्रत्येक नागरिक के लिए प्रदत्त इस स्वतंत्रता में ही प्रेस की स्वतंत्रता को भी अंतनिर्हित माना गया है। इसी तरह सूचना का अधिकार को भी इसका अनिवार्य अंग बताया गया है। उच्चतम न्यायालय के अनेक निर्णयों में सूचना का अधिकार के अनुकूल निर्णय दिए गए है जैसे कि

  • इंडियन (भारतीय) एक्सप्रेस (व्यक्त) न्यूजपेपर्स (समाचार पत्र) बनाम भारत संघ 1985 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि नागरिकों को सरकार के संचालन संबंधी सूचनाओं के विषय में जानने का अधिकार है।

  • हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ 1960 में कहा गया कि सामान्य हित के विषयों पर विचार और सूचना ग्रहण करने तथा पाने का अधिकार भी वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शामिल है।

  • हिम्मतलाल बनाम सोलस आयुक्त अहमदाबाद 1973 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि लोकतंत्र की मूल अवधारणा यह है कि नागरिकों की सहमति के आधार पर शासन होना चाहिए। यह सहमति स्वतंत्र और स्वाभाविकी होने के साथ ही विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त पर्याप्त क्षमताओं और विचार विमर्श पर आधारित होनी चाहिए।

दव्तीय प्रेस आयोग, 1981 के अनुसार लोकतंत्र का आधार जागरूक और जानकार जनमत है और जनता अपना मत तभी बना सकती है, जब उसे पूरी जानकारी हो। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार के पास जो भी जानकारी है, वह जनता को उपलब्ध हो।”

10वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में कहा गया है कि अगर सूचना को अधिकार के तौर पर सभी नागरिकों को उपलब्ध कराया जाये तो शासन के लिए विकास योजनाओं का कार्यान्वयन आसान हो जाएगा।

भारत में सूचना का अधिकार के लिए सबसे ठोस, स्पष्ट एवं अनवरत आंदोलन राजस्थान में किसानों ने चलाया। अरुणा राय एवं निखिल डे के नेतृत्व में ”हमारा पैसा, हमारा हिसाब” आंदोलन भारत में सूचना का अधिकार का अगुवा बना। 1975 में आईएएस की नौकरी छोड़कर जनांदोलनों से जुड़ी अरुणा राय ने 1987 में राजस्थान के देवडुंगरी गांव में एक संगठन की नींव रखी-’मजदूर किसान शक्ति संगठन’ भारत के पूर्व एयर मार्शल पी.के.डे. के पुत्र निखिल डे तथा स्थानीय कार्यकर्ता शंकर सिंह की मदद से इस संगठन ने जल्द ही अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इसके नेतृत्व में मजदूरी, आजीविका के साधन तथा जमीन के सवालों पर आंदोलन तेज हुआ।

इसी तरह, विकास योजनाओं में गबन तथा कम मजदूरी के खिलाफ 1993 में आंरभ अभियान ने धीरे-धीरे पारदर्शिता के लिए आंदोलन का रूप लिया। इसी दौरान, ’अपना गांव, अपना काम’ योजना में भारी अनियमितता का भंडाफोड़ करने के लिए इससे संबंधित दस्तावेजों की मांग करते हुए 15 जून, 1994 को भीम राजसमंद में धरना दिया गया। इसी वर्ष जून महीने में पाली जिले के कोट किराना गांव में ग्रामीणों के दबाव में बीडीओ दव्ारा किये गये जांच में फर्जीवाड़े का पता चला। इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-सुनवाई का अनूठा प्रयोग शुरू हुआ। जन-सुवाई में दस्तावेजों को ग्रामीणों के बीच जांच के लिए पेश करने पर भारी गड़बड़ियों का पता चला। चार जिलों में जन-सुनवाई के आधार पर मजदूर किसान शक्ति संगठन ने भ्रष्ट अधिकारियों एवं जन प्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का प्रयास किया। लेकिन इसकी अनुमति नहीं मिली।

इसके बाद मजदूर किसान शक्तिसंगठन ने जानने के अधिकार को लेकर आंदोलन तेज कर दिया। 1 मई, 2000 को राजस्थान विधानसभा ने सूचना का अधिकार कानून पारित किया। इसी दिन पंचायती राज अधिनियम में संशोधन करके वार्ड (निगरानी) सभा एवं ग्राम सभा में सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य कर दिया गया। 26 जनवरी, 2001 से राजस्थान में सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ। राजस्थान को सूचना का अधिकार देने वाले पहले राज्य का श्रेय भले ही न मिला हो, लेकिन यहाँ के ग्रामीणों को पूरे देश में इसकी अवधारणा और उदाहरण पेश करने का ऐतिहासिक गौरव अवश्य प्राप्त हुआ।