स्वतंत्र राजकोषीय परिषद (Independent Fiscal Council – Economy)

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• चौदहवें वित्त आयोग के सदस्यों ने स्वतंत्र राजकोषीय परिषद का गठन करने की उनकी सिफारिशों पर कार्रवाई न करने के लिए सरकार पर सवाल उठाए हैं।

• प्रस्तावित परिषद बजट घोषणाओं और पूर्वानुमानों का निष्पक्ष रूप से मूल्यांकन करेगी और संसद को अपनी रिपोर्ट देगी। यह वित्तीय प्रबंधन पर सरकार की साख में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है।

राजकोषीय परिषद का महत्व

• केंद्र सरकार राज्यों के राजकोषीय लक्ष्य पर निगरानी रखती है, परन्तु इसके वित्तीय फैसलों का निरीक्षण कोई नहीं करता है। राज्य वित्त प्रबंधन में अकसर दबाव महसूस करते हैं क्योंकि भारतीय रिजर्व बैेंक उनके घाटे को नियंत्रित करता है तथा केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना राज्य की ओर से बांड (अनुबंध) जारी नहीं कर सकता।

• विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्र रचनात्मक लेखांकन का चुनाव करता है, तथा राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 के तहत संसद में प्रस्तुत लक्ष्यों को पूरा नहीं करता।

• 2003 से अर्थात जब से यह अधिनियम प्रभाव में आया है, इसमें निहित घाटे के लक्ष्य में चार बार बाधा उत्पन्न हुई है तथा कई बार लक्ष्यों का उल्लंघन भी हुआ है।

• लघु और मध्यम अवधि में, यह वित्तीय लक्ष्यों के लिए सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में वैश्विक क्रेडिट (साख) रेटिंग (मूल्य निर्धारण करना) एजेंसियों (शाखा) की आशंका को दूर करेगा।

• महालेखा परीक्षक राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम की निगरानी करता है, परन्तु यह एक कार्योत्तर आकलन होता है।

• पिछले आठ में से छह वर्षों में, अधिमूल्यांन के कारण सरकारी राजस्व के अनुमान में करीब 10 फीसदी तक की कमी हुई है। इस वजह से वित्तीय वर्ष के मध्य में सभी योजनाओं और परियोजनाओं के धन में कटौती की गयी है।

• सरकार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने के लिए हमेशा दबाव में रहती है। आरबीआई का भी मुख्य ध्यान मौद्रिक नीति पर होता है। इस प्रकार राजकोषीय परिषद एक बहुत ही महत्वपूर्ण परिषद् होगी विशेष रूप से तब, जब राजकोषीय घाटे की सीमा जैसे मुद्दों पर विवाद पैदा होता है।