भारत में अपस्फीति (India My Despair – Economy)

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मुद्रास्फीति और अपस्फीति में अंतर

मुद्रास्फीति

मुद्रास्फीति कीमतों में वृद्धि का एक पैमाना हैं। यदि अगस्त 2014 में आलू की कीमत 100 रुपये प्रति किग्रा हैं, और यदि अगस्त 2015 में कीमत 110 रुपये हो जाती हैं तो आलू की कीमत में मुद्रास्फीति 10 प्रतिशत थी। जब ऐसा अपेक्षाकृत दीर्घ समयावधि के लिए सभी वस्तुओं के मूल्यों में होता हैं तो हम कह सकते हैं की अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति का अनुभव कर रही हैं।

अपस्फीति

अपस्फीति मुद्रास्फीति की विपरीत स्थिति है। अर्थात्‌ कीमतें एक अवधि से दूसरी तक गिरती जाती हैं। इस प्रकार अपस्फीति वस्तुओं तथा सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में एक गिरावट है। जब मुद्रास्फीति की दर 0 प्रतिशत से नीचे गिर जाती हो (एक ऋणात्मक मुद्रास्फीति दर) अपस्फीति होती हैं।

सकरात्मक प्रभाव

• अपस्फीति को एक अस्थायी अवस्था के रूप में माना जा सकता है जो बजट को संतुलित तथा प्रतिस्पर्धा में सुधार करेगी।

• मध्यम श्रेणी की अपस्फीति बचतकर्ताओं तथा निवेशकों के लिए लाभदायक हो सकती हैं क्योंकि उनकी परिसंपत्तियों का मूल्य अपस्फीति की दर के सापेक्ष बढ़ती है।

• सामान्यत: जब श्रम बल में शिथिलता होती हैं तब मजदूरी दर निम्न रखने का दबाव होता हैं, जोकि व्यापार के लिये अच्छा समझा जाता हैं। व्यापारी मजदूरों को कम भुगतान करके ज्यादा मुनाफ़ा कमा सकते है।

नकारात्मक प्रभाव

• अपस्फीति ऋणाधारकों के लिए हानिकारक हो सकती हें चूँकि वे उस मुद्रा में ऋण चुकाते हैं जो कि अपस्फीति के कारण ज्यादा महँगी हो गयी हैं।

• चूंकि श्रमिक भी उपभोक्ता हैं। यदि मजदूरी एक समान हैं तो वृद्धि भी एक समान ही होगी।

• सामान्यत: एक समान मजदूरी वो हैं जो खपत में वृद्धि को रोकती हैं और इस प्रकार इसका अपस्फीति प्रभाव हो सकता हैं।

• कम मुद्रास्फीति या अपस्फीति इस प्रकार से उच्च बेराजगारी के साथ सहसंबद्ध हैं।