गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) (Non Performed Assets – Economy)

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गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ क्या हैं?

• बैंकों की परिसपंत्तियाँ जो अपेक्षित कार्य निष्पादित नहीं करती (अर्थात्‌-कोई प्रतिफल नहीं लाती) गैर निष्पादित परिसपंत्तियाँ (एनपीए) या फंसे हुए कर्ज (बैड लोन) कहलाती है।

• ग्राहकों को दिये गये ऋण तथा अग्रिम, बैंको की परिसपंत्तियाँ होते हैं। यदि ग्राहक ब्याज या मूलधन का भाग या दोनों में से किसी का भी भुगतान नहीं करता है तो ऐसे ऋण, फंसे हुए कर्ज (बैड लोन) में परिवर्तित हो जाते हैं।

• भारतीय रिजर्व (सुरक्षित रखना) बैंक (अधिकोष) (आरबीआई) के अनुसार सावधि ऋण जिन पर ब्याज या मूलधन की किश्त, एक विशेष तिमाही के अंत से 90 दिनों से अधिक समय तक नहीं चुकाई जाती हैं तो गैर निष्पादित परिसपंत्ति कहतलाती हैं।

कृषि/कृषक्षेत्र ऋणों के संदर्भ में एनपीए ऐसे परिभाषित किया जाता है

• कम अवधि की फसल के लिए कृषि ऋण 2 फसल सीजन (मौसम) के लिए भुगतान नहीं किया है।

• ल्बाीं अवधि की फसलों के लिए, उपरोक्त देय तिथि से 1 फसल सीजन (मौसम) होगा।

गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ (एनपीए) के कारण आंतरिक कारक

निधि की कमी-प्रतिभूतिकरण कंपनियों तथा पुननिर्माण कंपनियों को (एससीएस/आरसीएस) अपने विस्तार के लिए तथा क्षेत्र में एक उपयोगी भूमिका निभाने के लिए वृद्धिशील पूँजी की आवश्यकता होती हैं।

गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ (एनपीएएस) का मूल्य निर्धारण-विक्रेताओं दव्ारा अपेक्षित मूल्य तथा प्रतिभूतिकरण कंपनियों तथा पुननिर्माण कंपनियों दव्ारा निविदित मूल्य के बीच का अंतराल बढ गया हैं, जिसमें नीलामियों की सफलता दर घट रही हैं।

• मानसून की कमी के कारण, भारत के कृषि ऋण की परिसपंत्ति गुणवत्ता उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होती हैं।

• जिस विशेष उद्देश्य हेतु ऋण लिए गए थे उस उद्देश्य के लिए प्रयोग नहीं किया जाना।

• वितरित ऋणों की अपर्याप्त सूची।

• गैर-आर्थिक लागत पर निर्मित अतिरिक्त क्षमता।

• कॉर्पोरेट (संयुक्त संस्था) समूह की पूँजी बाज़ार से इक्विटी (निष्पक्षता) या अन्य ऋण साधन दव्ारा पूँजी जुटानें में असमर्थता।

• व्यापार की असफलताएं।

• नयी परियोजनों की स्थापना/विस्तार/आधुनिकीकरण के लिए प्रदत्त कोष का सहयोगी संस्थाओं की सहायता आदि में उपयोग करना।

• इरादतन चूक, धन की हेराफेरी, धोखाधड़ी, विवाद, प्रबंधन के विवाद, ग़बन इत्यादि के कारण।

• बैंको की तरफ से कमियाँ जैसे कि साख निर्धारण में, निगरानी तथा जाँच की प्रक्रिया का उचित रूप अनुपालन न होने से अनेक सरकारी निकायों दव्ारा भुगतान आदि के निपटाने में देरी इत्यादि से।

बाहृय कारक

सुस्त कानूनी व्यवस्था:

§ लंबी कानूनी उलझने

§ श्रम कानूनों में किये गए बदलाव

§ गंभीर प्रयासों का अभाव

• कच्चे माल की कमी, कच्चे माल/आगतों के मूल्य में वृद्धि, निवेश मूल्य में बढ़ोत्तरी, बिजली की कमी, औद्योगिक मंदी, अतिरिक्त क्षमता, प्राकृतिक आपदाएँ जैसे कि बाढ़ दुर्घटना।

• विफलताएं, अन्य देशों में गैर भुगतान/बकाया, अन्य देशों में मंदी, राष्ट्रों के नियमों में परिवर्तन से पड़ने वाले प्रभाव, प्रतिकूल विनिमय दर इत्यादि।

• सरकारी नीतियां, जैसे उत्पाद शुल्क में परिवर्तन, आयात शुल्क में परिवर्तन इत्यादि।