प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र उधार प्रमाणपत्र (Priority sector lending certificate-Economy)

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सुर्ख़ियों में क्यों?

भारतीय रिजर्व बैंक PSLCs प्रमाणपत्र जारी करने और उसके व्यापार की अनुमति देने के लिए 7 अप्रैल 2016 को एक अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत बैंक अपने प्राथमिकता -प्राप्त क्षेत्र के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इस तरह के लिखत (क्रेडिट) को खरीद और बेच सकते हैं।

PSLCs क्या हैं?

• PSLCs व्यापार-योग्य प्रमाणपत्र होते हैं जोकि बैंको के प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र के ऋण के एवज में निम्न के लिए जारी किये जाते हैं-

• जो बैंक प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार देने के लक्ष्य और उप-लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं, उन्हें इन लिखतों की खरीद के लिए सक्षम बनाने के लिए।

• साथ ही अधिशेष वाले बैंको को प्रोत्साहन देना, जिससे अंतत: PSLC के अंतर्गत विभिन्न श्रेणियों को और अधि ऋण प्रदान करने के लिए इन्हें प्रेरित किया जा सके।

• कार्बन (अधातु तत्व) क्रेडिट (साख) ट्रेडिंग (व्यापार) की तर्ज पर PSLCs का लक्ष्य बाजार तंत्र के माध्यम से विभिन्न बैंको को उनके प्रतिस्पर्धी क्षमता के आधार पर प्राथमिक क्षेत्रक ऋण को बढ़ावा देना है।

• सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको सहित), शहरी सहकारी बैंक, लघु वित्त बैंक और लोकल (स्थानीय) एरिया (क्षेत्र) बैंक (अधिकोष) PSLCs के व्यापार के लिए पात्र हैं।

PSLCs के प्रकार

चार प्रकार के PSLCs होंगे:

• PSLC कृषि: कुल कृषि लक्ष्य की दिशा में उपलब्धियों की गणना के लिए ।

• PSLCs SF/MF : छोटे और सीमांत किसानों को आधार के उप-लक्ष्य की दिशा में उपलब्धियों की गणना के लिए।

• PSLC सूक्ष्म उद्यम: सूक्ष्म उद्यम को उधार के उप-लक्ष्य की दिशा में उपलब्धियों गणना के लिए।

• PSLC सामान्य : समग्र प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र लक्ष्य दिशा की में उपलब्धियों गणना के लिए।

तर्क

• वर्तमान में कई बैंको को अपनी पीएसएल आवश्यकता को पूरा करने में कठिनाई आ रही है क्योंकि वे ग्रामीण या एमएसएमई क्षेत्रक को उधार देना व्यवहार्य नहीं मानते।

• कृषि पर पर्याप्त ध्यान केन्द्रित होने के बावजूद, कृषि के क्षेत्र में पूंजीगत निवेश में काई ख़ासा वृद्धि नहीं हुई है, क्योंकि बैंक सिर्फ आरबीआई के नियमों को पूरा करने लिए लघु अवधि के लिए इस क्षेत्र को ऋण देते हैं (आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15)।

• आधे से अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (26 में से 16) वर्ष 2014 में 18 प्रतिशत के कृषि ऋण के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए थे, जबकि 20 में से 13 निजी बैंक कृषि के लिए उप-लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहे थे।

लाभ

• प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को ऋण देने के लक्ष्य को पूरा करने में असमर्थ बैंको के पास इस कमी को पूरा करने के लिए अब एक और अधिक व्यावहारिक और आसान तरीका उपलब्ध होगा।

• यह बैंको को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के लक्ष्यों को खरीदने और बेचने के लिए एक सहज मंच प्रदान करता है।

• जो बैंक प्राथमिकता -प्राप्त क्षेत्र को ऋण देने पर ध्यान केंद्रित किये हुए हैं, उनके पास अब ऐसे प्रमाण-पत्र जारी करने और दव्तीयक बाजार में उन्हें आसानी के साथ बेचने के साधन उपलब्ध होंगे।

• इससे पहले, जब एक बैंक अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाता था, उसे दूसरे बैंको से इस तरह के ऋण खरीदने पड़ते थे, जिसका मतलब था खरीददार बैंक की बैलेंस शीट (तुलन पत्र) में वृद्धि। लेकिन अब बैंक अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसी अन्य बैंक से PSLCs खरीद सकते हैं।

• PSLCs के लिए किया जाने वाला भुगतान बाजार दव्ारा निर्धारित होगा। PSLCs की कीमत कई कारकों पर निर्भर करेगी जैसे ऋण की श्रेणी और मांग तथा आपूर्ति का परिदृश्य।

• वित्तीय वर्ष के अंत में बैंकों दव्ारा आनन-फानन में लक्ष्य को पूरा करने का मुद्दा भी हल हो जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा -निर्देशों के अनुसार किसी बैंक को उसके बही -खाते में अंतर्निहित ऋण के बिना पिछले वर्ष की PSLCs उपलब्धियों के 50 प्रतिशत तक PSLCs जारी करने की अनुमति है।

• यह बैंको को उनके खुद के मजबूत पक्ष पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा, क्योंकि प्राथमिक क्षेत्र ऋण के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए स्वयं के संसाधनों को डायवर्ट (मोड़ना) करने के बजाय यह ऐसे बैंको को अन्य बैंको से उक्त लिखित (क्रेडिट) के खरी की अनुमति देता है।

• हर बैंक अपने कुशल व मजबूत क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगा।

• प्राथमिकता वाले क्षेत्रों और समाज के कमजोर वर्गो के लिए ऋण का सामाजिक उद्देश्य प्रत्येक बैंक पर बोझ डाले बिना पूरा हो जाएगा।

प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र?

प्राथमिकता क्षेत्र अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्रों को संदर्भित करता है जिसे विशेष व्यवस्था के अभाव में समय पर और पर्याप्त ऋण नहीं मिल पाता है।

प्राथमिकता क्षेत्र के तहत श्रेणियों में शामिल

1. कृषि

2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम

3. निर्यात ऋण

4. शिक्षा

5. आवास

6. सामाजिक अवसंरचना

7. अक्षय ऊर्जा

8. अन्य।