सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको की कमियों को दूर करना (Removal of The Shortcomings of Public Sector Banks-Economy)

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पृष्ठभूमि

• हमारे बैंक कई गैर-निष्पादित ऋणों तथा धीमे ऋण विस्तार से प्रभावित हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में इसे भारतीय विशेषताओं के साथ ’बैलेंस (बराबर) शीट (किसी भी पदार्थ की चद्दर जैसे कागज़, शीशे आदि) सिंड्रोम’ कहा गया है।

• 2016 की पहली तिमाही में औद्योगिक ऋण की वृद्धि दर 5 प्रतिशत से भी कम थी। यह 7 प्रतिशत से अधिक की विकास दर को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

समस्या की प्रकृति

• स्वीकार्यता में कमी-जो परिसंपत्तियां वास्तव में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां हैं, सामान्यत: उन्हें बैंको दव्ारा एनपीएएस के रूप में वर्गीकृत न कर नए ऋणों में तब्दील कर दिया है। इसका खुलासा भारतीय रिजर्व बैंक के परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा में किया गया है।

• जब रिजर्व बैंक की पहल के कारण इन्हें एनपीएएस माना गया, तब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको (भारतीय स्टेट बैंक को छोड़कर) को करीब 30 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको का सर्वव्यापी संकट: चूंकि सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंको की बैलेंस शीट में समस्या है, इसलिए अनर्जक आस्तियों का तत्काल हल निकाला जाना आवश्यक है।

• स्वस्थ आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको की अपरिहार्यता: हालांकि निजी क्षेत्र के बैंक ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन वे कुल ऋण का केवल एक चौथाई ही देते हैं।

ऋण का संकूचन: कॉर्पोरेट (पालिका) के मुनाफे में कमी आई है, जबकि ऋण बढ़ रहे हैं: इस कारण से कंपनियां (जनसमूह) धन आपूर्ति के लिए निवेश में कटौती हेतु बाध्य हो रही हैं।

समाधान

• इसके लिए 4 मोर्चो पर कार्यवाही की आवश्यकता है: मान्यता, पुनपूंजीकरण, संकल्प और सुधार।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको के पुनर्पूजीकरण की आवश्यकता

• विकास को पुनर्जीवित करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको के ऋण संबंधी कार्यकलापों में 12 प्रतिशत की वृद्धि की आवश्यकता है, इसके लिए मार्च 2019 के अंत तक बेसल-111 आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 2.4 ट्रिलियन (एक लाख करोड़) रूपए की अतिरिक्त पूंजी की जरूरत होगी।

• इस समस्या के निराकरण हेतु बजट से 70,000 करोड़ रुपए प्राप्त होने थे परन्तु 2015-16 और 2016-17 में बजटीय योगदान 25,000 करोड़ रुपए ही था, जो अपर्याप्त हैं।

• पुनर्गठित परिसंपत्तियों और दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को वर्तमान में अर्जक परिसंपति के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा अगले दो वर्षों में अनर्जक परिसंपत्ति में तब्दील हो सकता है। ऐसी स्थिति में:

• पूँजी निर्माण में मुनाफे के योगदान के बहुत कम होने की संभावना है।

• बाजार से पूंजी जुटाने की संभावना में भी कमी आ सकती है, क्योंकि सार्वजनिक बैंको के शेयरों में भी गिरावट आएगी।

• उठाए गए कदम-आर्थिक सर्वेक्षण में प्रस्तावित सुझावों के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक में निर्मित भंडार से लाभांश की विशेष घोषणा का उपयोग करते हुए पुनर्पूंजीकरण किया गया।

• इंद्रधनुष योजना लागू की जा रही है।

गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की समस्या का समाधान

• कुछ परिसंपत्तियों को हानिग्रस्त परिसंपत्ति के रूप में मानकर उन्हें बही-खाता से हटा देना चाहिए, भले ही मूल्य परिसमापन के माध्यम से थोड़ा बहुत ही पाने के प्रयास किये जा रहे हों।

• नया दिवालियापन कोड एक संभावित स्थिति परिवर्तक है, लेकिन इसके परिचालित होने में समय लग सकता है।

• रणनीतिक कर्ज पुनर्रचना, परिसंपत्ति कंपनी, राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना कोष, दबावग्रस्त आस्तियों की धारणीय सरंचना की योजना जैसे विचारों के लिए पुनर्गठित परियोजना को आकर्षक बनाने हेतु बैंको को मौजूदा ऋण में पर्याप्त कटौती करने की जरूरत है।

• निजी तौर पर प्रबंधित परिसंपत्ति पुननिर्माण कंपनियों को संपत्ति बेचना, जिससे बैंको के अनर्जक परिसंपत्तियों में फिर से बदलाव दिख सकता है।

• एक सरकारी स्वामित्व वाले ”बैड (अप्रिय) बैंक” (अधिकोष) की स्थापना, जो इस तरह के बैड लोन (ऋण) बैंको से खरीदेगा और संभवत: निजी परिसंपत्ति पुननिर्माण कंपनियों की मदद से ऋण वापसी के प्रयास करेगा।

उठाए गए कदम

• निवेशकों और नए प्रबंधन से जाता पूंजी के प्रयोजन के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने दो योजनाएं तैयार की है। रणनीति ऋण पुनर्गठन योजना और दबावग्रस्त आस्तियो की धारणीय संरचना की योजना।

• निजी भागीदारों की सहायता से परिचालित होने वाली प्रस्तावित राष्ट्रीय निवेश और अवरसंरचना कोष (एनआईआईएफ) वस्तुत: कार्यनीतिक कर्ज पुनर्रचना तंत्र के के माध्यम से चल रही दबावग्रस्त अवसंरना परियोजनाओं के लिए इक्किटी और नए ऋण प्रदान करेगा।

ऋण की गुणवत्ता में सुधार

• भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों दव्ारा ऋण देने की गुणवत्ता में सुधार लाना होगा ताकि इस प्रकार की समस्या फिर से न आए।

• वणिज्यिक संस्थाओं के रूप में संचालित करने के लिए बैंको की स्वायत्ता बढ़ाना।

• बैंको में सरकार की हिस्सेदारी को कम करना।

• सरकार को प्रबंधन से दूर होना चाहिए।

• पी.जे. नायक समिति ने एक सार्वजनिक क्षेत्र की होल्डिंग (स्वामित्व वाली वस्तु, जैसे क्षेत्र, शेयर आदि) कंपनी (जनसमूह) बनाने का सुझााव दिया था। जिसमें सरकार की हिस्सेदारी हस्तांरित कर दी जाएगी।

• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको का केवल एक नियामक-भारतीय रिजर्व बैंक-होना चाहिए, और वित्तीय सेवा विभाग का व्यापक अर्घ नियामक नियंत्रण समाप्त किया जाना चाहिए।

• सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको को बोर्ड (मंडल) दव्ारा प्रबंधित एक संस्थान के रूप में होना चाहिए, जहाँ मुख्य कार्यकारी अधिकारी सहित सभी नियुक्तियों के लिए बोर्ड जिम्मेदार होगा।

• बैंक बोर्ड (मंडल) ब्यूरों (तथ्य की जानकारी प्रदान करने वाला कार्यालय) इस दिशा में पहला कदम है।

• अगर बैंक पूरी तरह से बोर्ड दव्ारा प्रबंधित होंगे तो ही अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के अलग-अलग पद की संकल्पना साकार होगी।