सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) पर आधारित अवसंरचना विकास की समीक्षांं पर विजय केलकर समिति की रिपोर्ट (Report of Vijay Kelkar Committee on Review of Opportunity Development Based on Public Private Partnership – Economy)

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2015-16 के बजट में की गयी घोषणा के अनुसार अवसंरचना विकास के सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल (आदर्श) में सुधार के लिए वित्त मंत्री दव्ारा केलकर समिति का गठन किया गया था।

प्रमुख सिफारिशें

1. विभिन्न क्षेत्रों की अवरुद्ध परियोजनाओं को संबोधित करने के लिए स्वतंत्र नियामकों की स्थापना।

2. निर्णय निर्माण एवं कार्यो में भ्रष्टाचार तथा वास्तविक गलतियों के बीच अंतर को स्पष्ट करने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में संशोधन करना।

3. ऐसी परियोजनाओं के लिए आसान फंडिंग तथा सरकारों, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं दव्ारा जीरो कूपन बांड (बंधन) को प्रोत्साहन देना। इसके निम्नलिखित परिणाम होंगे।

• लंबी परिपक्वता अवधि वाली पीपीपी परियोजनाओं की व्यवहार्यता सुनिश्चित हो सकेगी। उदाहरण के लिए -हवाई अड्‌डों, बंदरगाहों और रेलवे का विकास।

• अवसंरचना क्षेत्र में उपयोग शुल्क से सुलभ ऋण के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।

• बैंको के जोखिम मूल्यांकन और आकलन क्षमताओं का निर्माण।

• इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण डिलीवरी (आपूर्तिकर्ता) के बाद स्थिर राजस्व प्रवाह वाली व्यवहार्य परियोजनाओं के लिए मौद्रीकरण के प्रावधान किये जाने चाहिये।

3पी इंडिया का समर्थन

• समिति जोरदार तरीके से ’3पीआई’ का अनुमोदन करती है जो पीपीपी में उत्कृष्टता के केंद्रों के रूप में काम करने के अतिरिक्त, अनुसंधान, समीक्षा तथा क्षमता के निर्माण के लिए गतिविधियों को शुरू करने और अनुबंधकारी तथा विवाद निपटान तंत्रों के अधिक सूक्ष्म और परिष्कृत मॉडलों (आदर्शो) की स्थापना को सुगम बनाते हैं।

4. राजकोषीय लाभ के बजाय सेवा वितरण पर ध्यान देना

पीपीपी परियोजनाओं में निहित जोखिमों की उचित पहचान तथा विभिन्न हितधारकों के मध्य उनका वितरण करने के लिए उनके दव्ारा प्राप्त होने वाली सेवा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाना चाहिये।

5. अवसंरचना पीपीपी परियोजना समीक्षा की स्थापना (आईपीआरसी)

उद्देश्य- ऐसी परियोजनाओं के संदर्भ में आने वाली समस्याओं से निपटना।

संगठन-अर्थशास्त्र पृष्ठभूमि से एक विशेषज्ञ और अन्य क्षेत्रों जैसे इंजीनियरिंग (अभियंता) और कानून से एक या अधिक विशेषज्ञ।

अधिदेश्ा-पीपीपी आधारित ऐसी आधारभूत संरचना से संबंधित परियोजनाएं जो दी हुयी समय सीमा के अंतर्गत अपने कार्य को समाप्त नहीं कर पाती हैं, के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए और उचित कानूनी कार्यवाहियों को सुझाते हुए यह समिति अपनी रिपार्ट (विवरण) एक निश्चित समय सीमा के भीतर प्रस्तुत करेगी।

अवसंरचना पीपीपी अधिनिर्णय न्यायाधिकरण (आईपीएटी)

• सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) के पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश इसके अध्यक्ष होंगे

• कम से कम एक तकनीकी और एक वित्तीय सदस्य का होना प्रस्तावित है।

6. निम्नलिखित के लिए मॉडल (आदर्श) कंसेशन (छूट) अग्रीमेंट (समझौता) को अपनाना:

• प्रबंध जोखिम का उचित मूल्यांकन

• बोली लगाने वाले दस्तावेज में ही पुन: वार्ता का विकल्प

• उपयोगकर्ताओं, परियोजनाओं समर्थकों, रियायत दाताओ, उधारदाताओं और बाजार सहित सभी हितधारकों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक क्षेत्र के मॉडल (आदर्श) रियायत समझौते समीक्षा

क्षेत्र विशिष्ट सिफारिशें

विमानपत्तन: सरकार को ग्रीनफील्ड (पौधा घर/हरित क्षेत्र) और ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में पीपीपी मॉडल (आदर्श) को प्रोत्साहन करना चाहिए।

रेलवे: पीपीपी अवसरों का दोहन करने में मदद करने के लिए एक स्वतंत्र प्रशुल्क नियामक प्राधिकरण की स्थापना करनी चाहिये।

सड़क: बीओटी (बिल्ड (निर्माण)-ऑपरेट (संचालित)-ट्रांसफर (स्थानांतरण)) परियोजनाओं के लिए रियायत की अवधि बढ़ानी चाहिए।

ऊर्जा: कई ऊर्जा परियोजनाएं पीपीपी के तहत नहीं हैं। इस क्षेत्र में वित्तीय समाधान की जरूरत है क्योंकि इससे बैंक ऋण पर असर पड़ रहा है।

ब्दांरगाह: प्रमुख बंदरगाहों के लिए पुरानी टैरिफ (दर-सूची) अथॉरिटी (अधिकार) के स्थान पर नई टैरिफ अथॉरिटी लाना।

निम्नलिखित प्राधिकारी वर्ग के सोच और नज़रिए में बदलाव

• निजी क्षेत्रक के साथ साझेदारी सार्वजनिक एजेंसियाँ (शाखाए)

• पीपीपी का पर्यवेक्षण करने वाली सरकारी विभाग

• पीपीपी की निगरानी करने वाले लेखा और विधायी संस्थान

बहुत छोटी परियोजनाओं में पीपीपी मॉडल (आदर्श) व्यवहार्य नहीं है

• समिति ने बहुत छोटी परियोजनाओं के लिए पीपीपी मॉडल के उपयोग के खिलाफ सलाह दी है। छोटी पीपीपी परियोजनाओं के लाभ उनकी प्रबंधन की जटिलता और परिणामस्वरूप लागत के अनुरूप नहीं होते।

स्विज चैलेंज (स्विज चुनौतियों) का मुद्दा

• अनापेक्षित प्रस्तावों (”स्विज चैलेंज”) को हतोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि वे खरीद प्रक्रिया में जटिलता उत्पन्न कर सकते हैं।

• उनका परिणाम पारदर्शिता में कमी एवं खरीद प्रक्रिया में संभावित बोलीकर्ताओं के साथ अनुचित एवं असमान बर्ताव के रूप में सामने आ सकता है।