फ्लाई ऐश (उड़न राख) (Fly Ash – Environment And Ecology)

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सुर्खियों में क्यों?

• हाल ही में पर्यावरण एवं मंत्रालय के एक विशेषज्ञ पैनल (तालिका) ने फ्लाई ऐश का उपयोग करके खदानों को भरने पर चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञ पैनल के अनुसार इसके निम्नलिखित पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं:-

o फ्लाई ऐश में पायी जाने वाली भारी धातुओं की लीचिंग के कारण भू-जल के प्रदूषित होने का खतरा।

o फ्लाई ऐश खदानों के छिद्रो को भर देगी इसके परिणामस्वरूप भूजल के पुनर्भरण में कमी आएगी।

o फ्लाई ऐश से भरे गए स्थान पेड़-पौधों के लिए उपयुक्त नहीं होंगे क्योंकि फ्लाई ऐश के कारण वृक्षों की जड़ें सही से विकसित नहीं हो पाएंगी। इससे ऐसे स्थान पर उगने वाले वृक्ष मंद गति से चलने वाली पवनों को भी नहीं झेल पाएगें और जल्द ही जड़ सहित उखड़ जाएगें।

फ्लाई ऐश के बारे में

• फ्लाई ऐश कोयला दहन उत्पादों में से एक है और सूक्ष्म कणों से निर्मित होता है जो कि बॉयलर (उबालने का बर्तन) से चिमनी गैसों के साथ बाहर निकलते हैं। ऐसे ऐश जो कि बायलर के नीचे जाती है उसे बॉटम ऐश कहते हैं।

• फ्लाई ऐश में सिलिका (अग्नि प्रस्तर), एल्यूमीनियम (एक प्रकार की हल्की धातु) और कैल्शियम (चुना) के आक्साइड्‌स की पर्याप्त मात्रा शामिल होती है। आर्सेनिक (हरताल/संखिया नामक तीव्र विष), बोरान (एक अलोह मूलवस्तु दवा के निर्माण में उपयुक्त), क्रोमियम (वर्ण धातु), सीसा आदि जैसे तत्व भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते है। इस प्रकार यह पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरा है।

• हालांकि, इस प्रकार के इतने सारे खनिजों की एक साथ उपस्थित फ्लाई ऐश को कुछ अदव्तीय गुण प्रदान करती है। रेलवे तटबंधों के निर्माण, पुरानी खदानों को भरने, भवन निर्माण सामग्री और निचले इलाकों को भरने के लिए फ्लाई ऐश का उपयोग किया जा सकता है।

भारत में फ्लाई ऐश से संबंधित स्थिति

• भारतीय कोयले में बहुत अधिक मात्रा में ’ऐश सामग्री’ पायी जाती है। आयातित कोयले में 10-15 प्रतिशत ऐश की मात्रा पायी जाती है जबकि इसकी तुलना में भारतीय कोयले में 30-40 प्रतिशत ऐश की मात्रा पायी जाती है।

• भारत सरकार को यह एहसास हो गया है कि फ्लाई ऐश की इतनी अधिक मात्रा वाले कोयले का प्रयोग भी लाभकरी तरीके से किया जा सकता है और इसलिए इस दिशा में कदम उठाए गए हैं।

• पर्यावरण एवं वन मंत्रालय दव्ारा फ्लाई ऐश के उपयोग हेतु 2009 में जारी की गयी अधिसूचना में तापीय विद्युत संयंत्र से 100 किलोमीटर के दायरे में ही संपूर्ण फ्लाई ऐश का उपयोग करने की वकालत की गयी है।

• फ्लाई ऐश के नए और अभिनव उपयोग भी किये जा रहे हैं। इस प्रकार के उपयोग विशेष रूप से विद्युत कंपनियों (संघों) जैसे एनटीपीसी इत्यादि ने आईआईटी-दिल्ली और आईआईटी- कानपुर जैसे संस्थानों के सहयोग से प्रारंभ किये हैं, ऐसे नए उपयोगों में रेलवे के लिए प्री-स्ट्रेस्ड (बेचैन) कंक्रीट रेलवे स्लीपरों (सोने वाला) का निर्माण आदि सम्मिलित है।

परिवहन लागत: उड़ीसा जैसे कुछ राज्यों ने विभिन्न प्लांटो (औद्योगिक संयत्र) को फ्लाई ऐश की परिवहन लागत में सब्सिडी (सरकारी आर्थिक सहायता ) देने का आदेश दिया है।

• हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने सिंगापुर और दुबई जैसे स्थानों पर फ्लाई ऐश की बढ़ती मांग को देखते हुए इसके निर्यात के लिए एक निर्यात नीति की घोषणा की है।