मानव जीनोम परियोजना-राइट (Human Genome Project-Wright –Science And Technology)

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सुर्ख़ियों में क्यों?

2 जून 2016 को, अमेरिका में अनेकों शैक्षणिक संस्थानों के वैज्ञानिकों ने साइंस (विज्ञान) पत्रिका में एक परिपेक्ष्य के रूप में दूसरे मानव जीनोम परियोजना का प्रस्ताव प्रकाशित किया जिसे मानव जीनोम परियोजना राइट कहा गया है।

पृष्ठभूमि

• मुल मानव जीनोम परियोजना एचजीपी-आरईएडी कहा जाता था।

• एचजीपी-आरईएडी का उद्देश्य मानव जीनोम को पढ़ना था। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि अब सही मायने में हमारे आनुवंशिक ब्लूप्रिंट (नीली छाप) को समझने के लिए आवश्यक है कि डीएनए ”लिखने” और मानव (और दूसरे) के जीनोम को प्रारंभ से निर्मित करना होगा।

मानव जीनोम परियोजना-राइट क्या है?

• यह एक ख्लुाी, अकादमिक, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान परियोजना होगी जिसका संचालन बहु-विषयक वैज्ञानिकों दव्ारा किया जाएगा, यह दस वर्षों के भीतर इंजीनियरिंग और कोशिक लाइनों (रेखाओं) में बड़े जीनोम के परीक्षण, जिसमें मानव जीनोम भी सम्मिलित हैं, की लागत में 1,000 गुना से भी अधिक की कमी लायेंगी।

• वे नई प्रौद्योगिकियों और जीनोम पैमाने पर इंजीनियरिंग के साथ ही परिवर्तनकारी चिकित्सा अनुप्रयोगों के लिए एक नैतिक ढांचे को भी विकसित करेंगे।

• इस तरह के प्रयास का व्यापक लक्ष्य मानव जीनोम परियोजना एचजीपी-आरईएडी दव्ारा प्रदान किये गए ब्लूप्रिंट के बारे में हमारी समझ को आगे ले जाना है।

एचजीपी से मानवता को कैसे लाभ होगा?

इसमें शामिल कुछ अनुप्रयोग हैं, लेकिन ये यहीं तक सीमित नहीं हैं

• प्रत्यारोपण के लिए मानव अंगों का विकास करना, इस प्रकार इससे वैश्विक स्तर पर हजारों मरीजों की जान बचायी जा सकती है जो दुर्घटना या बीमारी के कारण अंगदाता नहीं मिलने के कारण मर जाते हैं।

• कोशिका लाइनों (रेखाओं) में वायरस के लिए इंजीनियरिंग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करना।

• नई चिकित्सकीय कोशिका लाइनों में इंजीनियरिंग कैंसर प्रतिरोध क्षमता का अध्ययन करना।

• उच्च उत्पादकता, लागत प्रभावी टीका और दवा के विकास को सक्षम करने से मानव कोशिकाओं और ओर्गनोइडस (संगठन) के लिए सटीक दवा तथा उसको और अधिक किफायती और सार्वभौमिक बनाना

मानव जीनोम परियोजना (एचजीपी) एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय और बहु संस्थागत प्रयास है जिसमें 13 वर्ष (1990-2003) लगे और लगभग 2.7 अरब डॉलर खर्च हुआ। इसके अंतर्गत जीन का अनुक्रम और जीन के बीच स्थान का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया जो कि एक विशिष्ट मानव जीनोम बनाते हैं।

एचजीपी की उपलब्धियां

• बैटल (लड़ाई/संघर्ष) टेक्रोलॉजी पार्टनरशिप (भागीदार) प्रैक्टिस (अभ्यास) ने एचजीपी आरईएडी के सही आर्थिक लाभ का आकलन किया और सुझाव दिया कि अन्य निर्गतों के बीच प्रत्येक 1 डॉलर के अमेरिकी सरकार के निवेश के बदले 141 डॉलर प्राप्त हुआ है।

• मानव जीनोम अनुक्रम (सिक्केंस) की उपलब्धता कई मानव जीन के प्रकार्य के बारे में हमारी समझ में सहायता करते है, नए मानव विशेषताओं से जुड़े जीन की खोज में, मानव और अन्य हुमनोइड जैसे वानर और प्राइमेट के बीच आनुवंशिक विविधता पर अध्ययन में; खुफिया, संज्ञानात्मक कार्यों और भाषा से संबंधित जीन के अध्ययन में; और अंत बेहतर विशेषताओं वाले मानव बनने को समझने में।

• मानव जीनोम अनुक्रम की उपयोगिता का सबसे अच्छा उदाहरण कई मोनोजेनिक विकारों के लिए रोग-जीन की खोज में और आँन्कोलॉजी के लिए व्यक्तिगत दवा में हैं।

• इसका एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण उदाहरण कैंसर जीनोमा सिक्केंसिंग की खोज है, जो हमें मेटाबोलिज्म और कैंसर के बीच की कड़ी की खोज करने वाली नई दवाओं को विकसित करने अवसरों प्रदान करता हैं।

एचजीपी-राइट जैव चिकित्सा अनुसंधान में कैसे लाभ पहुंचाएगा?

• अनुक्रमण और गणना के जैसे ही डीएनए संश्लेषण एक मूलभूत तकनीक है। इसलिए एजीपी -राइट के दव्ारा जीवन विज्ञान के स्पेक्ट्रम (वर्णक्रम/संबंधित गुण) में अनुसंधान और विकास में तेजी लाने के लिए बुनियादी अनुसंधान और नई जैव आधारित चिकित्सा, टीके, सामग्री, ऊर्जा स्रोतों, और खाद्य पदार्थ के विकास का समर्थन करने की उम्मीद है।

• इसके अतिरिक्त, यह परियोजना जैव चिकित्सा अनुसंधान में प्रयुक्त व्यापक प्रयोज्यता के उपकरणों को विकसित करेगा, जैसे:-

कम्प्यूटेशनल उपकरण जो किसी भी जीनोम के नये स्वरूप की अनुमति देता है। इसके बाद, प्रिंट (छाप) करने से पहले, सिलिको में रिडिजाइन किए गये कोड का संकलन और परीक्षण किया जाता है।

• प्रारूपी स्क्रीनिंग प्लेटफार्मों (मंचो) जैसे कि ऑर्गनोआइड कलचरर्स (संस्कृति), जो सिंथेटिक (अप्राकृतिक) डीएनए और अज्ञात महत्व के वेरिएंट के निष्पादन के चित्रण के लिए अनुमति देते हैं।

• सस्ता, अधिक सटीक और लंबा डीएनए संश्लेषण और समूहन।

• विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं के लिए या योजनाबद्ध तरीके से कई अंग प्रणालियों के लिए टारगेटेड (लक्ष्य) डिलीवरी (पहुंचाने की क्रिया)।

भारत को लाभ

• भारत को एचजीपी-राइट (न्यायोचित/सर्वोचित) की क्षमता का लाभ मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के लिए नए समाधान उपलब्ध कराने में हैं।

• इन घातक बीमारियों का मुकाबला करने के खिलाफ रणनीतियों में से एक वातावरण में बाँझ मच्छरों को छोड़ना है जो अपने जंगली प्रकार के साथियों के साथ संभोग के बाद संतानों के उत्पादन में असमर्थ होगा और मच्छरों में रोगजनक प्रतिरोध के निर्माण, दोनों जीनोम इंजीनियरिंग के दव्ारा संभव हो सकता है।

• एचजीपी-राइट के माध्यम से उत्पन्न उपकरण सिंथेटिक (अप्राकृतिक) वेक्टर जीनोम को परजीवी या वायरस के पोषण के लिए अक्षम बनाकर इस प्रक्रिया में सहायता कर सकता है।

• टीका विकास वायरस का कृत्रिम रूप से काफी संख्या में निर्माण करके प्रक्रिया में तेजी लाया जा सकता है और फिर टीके के विकास में इनका उपयोग किया जा सकता है।

• यह जान बचाने के अलावा, हमारी अर्थव्यवस्था में और योगदान कर सकता है।

• बड़े परियोजनाओं में ज्यादा धन की आवश्यकता होती है और भारत के लिए यह बेहतर है कि अन्य देशों के साथ लागत और जोखिम (तकनीकी, वैज्ञानिक और वित्तीय) साझा कर इस तरह की बड़ी परियोजनाओं को क्रियान्वित करे।

• इसके अतिरिक्त, एचजीपी-राइट जैसी परियोजनाओं के ज्ञान और वैश्विक चिंतको के प्रसिद्ध समूह की विशेषज्ञता के लिए भारतीय वैज्ञानिकों को पहुंच प्रदान करेगा।

चिंताए: चिंताएं नैतिकता से लेकर वैज्ञानिक तक हैं

• समाज के एक वर्ग के बीच वास्तविक आशंका है कि नए जीनोम का संश्लेषण कर मानव प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर सकता है। इसका दुरूप्रयोग कर नए जीवन को बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए बाँझ व आनुवंशिक रूप से फिर से विकसित मच्छर पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन पैदा कर सकते हैं और कीड़ों की पूरी आबादी का सफाया कर सकते हैं।

• तब जंगलों में संशोधित मच्छरों को छोड़ने से गैर लक्षित प्रजातियों में भी इसका जीन हस्तांतरित हो सकता है जो कि इसका नकारात्मक प्रभाव हैं।

• इसके नियंत्रण के लिए मजबूत डिजाइन (रूपरेखा) और उच्च रोकथाम स्तर का फील्ड (क्षेत्र) ट्रायल (परीक्षण) आवश्यक है।

• सही कदम मच्छरों की आबादी को समाप्त करना नहीं हो सकता है लेकिन मच्छरों को या तो हानिरहित या घातक रोगजनकों के लिए अलाभकारी मेजबान बनाना हो सकता है।

आगे का रास्ता

• भारत को विज्ञान आधारित गतिविधियो में भाग लेने से खुद को दूर नहीं करना चाहिए तथा एक पारदर्शी नीति के ढांचे के भीतर शुरू से ही इसे सही ढंग से क्रियान्विति करना चाहिए।

• भारत ने एचजीपी-रीड (अध्ययन करना) में भाग नहीं लिया या लेकिन पिछले दशक में भारत में की गयी वैज्ञानिक खोजों की सफलता ने एक संदर्भ में मानव जीनोम अनुक्रम की उपलब्धता को सुनिश्चित किया है।

• भारत विश्व के विज्ञान क्षेत्र में उस स्थान पर पहुँच चुका है जहां इस प्रकार के अतंरराष्ट्रीय प्रयासों में लंबे समय तक शामिल न होने से लाभ से अधिक नुकसान हो सकता हैं।

• यूनिवर्सल (संपूर्ण) इंटरनेट कनेक्टिविटी की तरह सरकारी कार्यक्रमों को हमारे देश के दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाया जा रहा है, भारत की तकनीकी समझ रखने वाले युवा मानव जीनोम के लाभों का दोहन कर नवाचार और अर्थव्यवस्था में योगदान के लिए इंतजार कर रहे हैं।