लोहाफेक्स परियोजना (Lohfeks Project – Science And Technology)

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सुर्खियों में क्यों

• हाल ही में, भारतीय वैज्ञानिकों ने जीवाणुओं के ऐसे तीन नए समूहों की खोज की जिनका संबंध किसी अन्य जीवाणु से नहीं है। यह खोज दक्षिणी महासागर, अंटार्टिका में ’लोहाफेक्स प्रयोग’ के दौरान हुई जिसका उद्देश्य वैश्विक तापन प्रबंधन पर अध्ययन करना था। इसके एक भाग के तौर पर महासागरीय लौह निषेचन के माध्यम से बढ़ते हुए सी ओ प्रच्छादन का अध्ययन किया गया।

• खोजे गए 3 लोहाफेक्स समूहों में से प्रथम समूह से bacteroidetes संबंधित था जबकि शेष 2 firmicutes से संबंधित थे।

• इन तीन समूहों की अनूठी विशेषता थी-सागर में लोह तत्व की उपस्थिति के प्रति उनकी अलग अलग प्रतिक्रिया।

• अंटार्कटिका में भारत-जर्मन परियोजना ने यह अनुमान लगाया है कि लोहे के निषेचन से प्रेरित ऐल्गल ब्लूम/शैवाल प्रस्फुटन (लौहा शैवाल की वृद्धि के लिए आवश्यक है) वातावरण से अत्यधिक मात्रा में सीओ2 को अवशोषित कर उसे महासागरों में जब्त कर देगा।

• अंटार्टिका के पास समुद्र में चल रहे प्रयोग से प्राप्त संकेतो के अनुसार यह संभव है कि महासागरों में लोहे के निषेचन से ग्लोबन वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण ना हो सके।

• इसके अलावा, पर्यावरणविदों ने इसका विरोध किया है क्योंकि समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों पर लौह निषेच का प्रभाव अज्ञात है इसके साथ ही यह सीबीडी (जैव विविधता पर अभिसमय) के नियमों का उल्लंघन भी है।