भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसीए), 1988 में संशोधन (Amendment To The Prevention of Corruption Act, 1988 – Governance And Governance)

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सुर्ख़ियों में क्यों?

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्यसभा में लंबित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2013 से संबंधित प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के निर्णय के माध्यम से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन करने के लिए अपनी मंजूरी दे दी है।

प्रस्तावित संशोधन

प्रस्तावित संशोधन घरेलू भ्रष्टाचार निवारण कानून में कथित विसंगतियों को दूर करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (सभा) (यूएनसीएसी) के अनुरूप देश दायित्वों को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा करने में मदद करते हैं।

• रिश्वत देने और लेने वालों को अधिक सख्त सजा दी जाएगी।

• सजा के प्रावधान न्यूनतम 6 महीने से बढ़ाकर 3 वर्ष और अधिकतम 5 वर्ष से बढ़ाकर 7 वर्ष (रिश्वत के मामले में 7 वर्ष की सजा घोर अपराध की श्रेणी में आती है।) किये गये।

• भ्रष्टाचार से मिलने वाले लाभ पर रोक के लिए कुर्कियों का अधिकार जिला न्यायालय के बजाय निचली अदालत (विशेष न्यायाधीश) को दिये जाने का प्रस्ताव।

• सरकारी कर्मचारियों दव्ारा किये जाने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए व्यक्तियों से लेकर वाणिज्यिक संस्थाओं को प्रावधान के दायरे में लाया जा रहा हैं।

• वणिज्यिक संगठनों से जुड़े व्यक्तियों को सरकारी कर्मचारी को घूस देने से रोकने के लिए दिशा निर्देश जारी करने के प्रावधान।

• पिछले 4 वर्ष में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामलों की औसत सुनवाई के अवधि 8 वर्ष से अधिक है। 2 वर्ष के भीतर त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने का प्रस्ताव किया गया है।

• सरकारी कर्मचारियों दव्ारा धन संवर्धन आपराधिक दुराचार और आय से अधिक संपत्ति को सबूत के रूप में लिया जाएगा।

• गैर-मौद्रिक पारितोषण शब्द संतुष्टि की परिभाषा के अंतर्गत शामिल किया गया है।

• धारा 7 (2) में सरकारी कर्मचारी के दायित्व को इस तरह से वर्णित किया गया है कि कोई सरकारी कर्मचारी अपनी संवैधानिक कर्तव्य या नियमों, सरकारी नीतियों, कार्यकारी निर्देशों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता।

पृष्ठभूमि

• भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988, वर्ष 1988 में अधिनियमित किया गया था।

• भारत के दव्ारा यूएसीएसी की पुष्टि, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार आदि की रोकथाम के संबंध में अंतरराष्ट्रीय परंपराओं का पालन करने के प्रति संकल्प की प्रष्ठभूमि में अधिनियम के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा जरूरी हो गयी थी।

आलोचना

• प्रस्तावित संशोधन पीसीए के तहत सभी वास्तविक और संभावित रिश्वत देने वालों को अपराधी घोषित करता है।

• यह एक वास्तविकता है कि हमारे देश में लोग राशन, पेंशन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तरह अपने बुनियादी हको को पाने के लिए भी रिश्वत देने को मजबूर हैं।

• लोक सेवक पर अभियोग लगाने से पहले सरकार अनुमति लेने की आवश्यकता के खिलाफ बड़े पैमाने पर जनता की राय होने के बावजूद, यह संशोधन सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों को भी इस प्रावधान के तहत कवर करने के दव्ारा इसे और सशक्त करने का प्रावधान करता है।

आगे की राह

• सरकार को कम से कम तीन प्रकार के रिश्वत देने वालों को उन्मुक्ति प्रदान करने पर विचार करना चाहिए

• जो लोग अपने कानूनी हकों को प्राप्त करने के लिए रिश्वत का भुगतान करने के लिए मजबूर हैं।

• जो लोग स्वेच्छा से और भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों के खिलाफ शिकायत और गवाही देने के लिए तैयार होते हैं।

• जो लोग गवाह (अप्रूवर) बनने के लिए तैयार है।

• अगर सरकार एक प्रभावी शिकायत पिटान प्रणाली की स्थापना करे तो उत्पीड़क भ्रष्टाचार का मुकाबला अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

• पीसीए के दव्ारा अभियोग लगाने वाली एजेंसियों (कार्यस्थानों) को सरकारी प्रभाव से बचाना चाहिए।

• लोकपाल कानून के अंतर्गत मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी देने की शक्ति को लोकपाल में निहित किया गया है। प्रस्तावित संशोधन को इसे प्रतिबिंबित करना चाहिए।

• जहाँ भी अभियोग प्रक्रिया प्रारंभ करने की शक्ति को लोकपाल या लोकायुक्त कानून में परिभाषित किया गया है, वहां इसे ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए।

• अन्य मामलों में जहां कोई लोकपाल या लोकायुक्त गठन नहीं किया गया है एक स्वतंत्र समिति को मुकदमा चलाने के लिए पूर्व अनुमति देने की जिम्मेदारी सौंपी जाना चाहिए।

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