मणिपुर विधानसभा दव्ारा पारित तीन बिल राष्ट्रपति दव्ारा अस्वीकृत (Three Bills Passed By Manipur Assembly, Rejected By The President – Governance And Governance)

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सुर्खियों में क्यों?

• हाल ही में, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी दव्ारा मणिपुर विधानसभा दव्ारा 31 अगस्त, 2015 को पारित तीन विधेयकों लौटा दिया गया।

• पिछले वर्ष से मणिपुर को इन विधेयकों के संबंध में विभिन्न रूपों में अनेक विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा है।

• विवादास्पद विधेयकों में मणिपुर भूमि सुधार और भू-राजस्व (7वाँ संशोधन) विधेयक, 2015 मणिपुर दुकान और प्रतिष्ठान (दव्तीय संशोधन) विधेयक, 2015 और मणिपुर जन संरक्षण विधेयक, 2015 शामिल है।

• संवैधानिक एवं विधि विशेषज्ञ तीनों विधेयकों का पुनर्परीक्षण करेंगे। प्रथम दो विधेयकों का परीक्षण ’उचित निष्कर्ष के लिए तथा तीसरें विधेयक का परीक्षण मणिपुर के पहाड़ी और घाटी क्षेत्र के निवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।

पृष्ठभूमि

• भारत के साथ मणिपुर का विलय 15 अक्टूबर, 1949 को हुआ। विलय से पहले, मणिपुर राज्य में प्रवेश एक परमिट (अनुमति देना/अनुज्ञापत्र) प्रणाली दव्ारा विनियमित था जिसे बाद में समाप्त कर दिया गया था।

• यह परमिट इनर लाइन (भीतरी, रेखा) परमिट (अनुज्ञापत्र) के रूप में जाना जाता था। यह प्रणाली ब्रिटिश औपनिवेशक सरकार दव्ारा अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए शुरू की गयी थी। बाद में, वहां के जनजातीय लोगों और उनकी संस्कृति की रक्षा के लिए एक उपकरण के रूप में इसका इस्तेमाल किया गया।

• चूंकि मणिपुर आधिकारिक तौर पर एक आदिवासी राज्य नहीं है, वहां इनर लाइन परमिट प्रणाली को लागू करने के मार्ग में संवैधानिक चुनौतियाँ हैं।

• विधेयक के अनुसार, ”मणिपुर के निवासी का अर्थ है मणिपुर के ऐसे व्यक्ति, जिनके नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (पंजीकरण करना), 1951, जनगणना रिपोर्ट 1951 तथा गांव निर्देशिका 1951 में दर्ज हैं और उनके वंशज, जिन्होंने मणिपुर के सामूहिक सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के लिए योगदान दिया है।”

• दृष्टव्य है की यह जनगणना विसंगतियों से युक्त थी क्योंकि इसके अंतर्गत पूरे राज्य को शामिल नहीं किया गया था। उस समय बुनियादी ढांचा भी पर्याप्त नहीं था और कई लोग इस प्रक्रिया में बाहर छूट गए। अत: विधेयक के प्रावधानों के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाले कुकी और नागा जैसे लोग मणिपुर के निवासियों की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आते।

• पहाड़ी क्षेत्र के लोगों में यह भावना घर करती जा रही है कि यह विधेयक राज्य सरकार के दव्ारा उनकी भूमि पर कब्जा करने की एक रणनीति है।

• पहाड़ी क्षेत्रों में छठी अनुसूची को लागू करने की राज्य सरकार की अनिच्छा ने जनजातीय लोगों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।

• पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों से विधेयक का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में विचार-विमर्श नहीं किया गया।

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