Science and Technology: Achievements of Indians in Science and Technology

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियाँ (Achievements of Indians in Science and Technology)

  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र का महत्व हमेशा से कौतूहल भरा रहा है। भारत के विशेष परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो एक मत यह है कि भारत ने इस क्षेत्र में देरी से कदम रखा, जबकि दूसरा मत यह है कि भारत का विज्ञान-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में पूर्व काल से ही अमूल्य योगदान रहा था।
  • विज्ञान-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियों से पूर्व इसका अवलोकन महत्वपूर्ण होगा कि भारत में विज्ञान-प्रौद्योगिकी ढांचा कितना उन्नत है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा वैज्ञानिक-प्रौद्योगिकीय ढांचा न तो विकसित देशों जैसा मजबूत था और ना ही संगठित। भारतीय वैज्ञानिक शोध मूलत: दूसरे देशों में उपलब्ध विशेषज्ञता पर आधारित थे। लेकिन धीरे-धीरे भारत ने शोध अनुसंधान क्षेत्र में प्रगति की। विभिन्न समयांतरालों पर विज्ञान नीतियाँ अपनायी गयीं। साथ ही इस क्षेत्र में भारतीयों की रूचि बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रोत्साहन योजनाएँ भी चलायी गई।
  • मूलभूत और अनुप्रयुक्त विज्ञान के क्षेत्र की नवीनतम जानकारी से लैस अनुभवी विशेषज्ञों का समूह अब भारत में उपलब्ध है जो नई प्रौद्योगिकियों का उपयोग कर सकता है और देश के भावी विकास का ढांचा तैयार कर सकता है।

विज्ञान-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निम्नलिखित भारतीयों की उपलब्धियाँ सराहनी रही हैं। इनके योगदानों का उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता है-

  • जगदीश चन्द्र बसु- ये भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। इन्हें भौतिकी, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा मुरातत्व का ठोस ज्ञान था। इन्होंने सूक्ष्म तरंगों के क्षेत्र में वैज्ञानिक शोध किए तथा अपवर्तन विवर्तन एवं ध्रुवीकरण के क्षेत्र में भी प्रयोग किए। लघु तरंगदैर्ध्य, रेडियो तरंगो तथा श्वेत एवं पराबैंगनी प्रकाश दोनों के रिसीवर में गेलेना क्रिस्टल का प्रयोग बोस ने ही विकसित किया। बोस ने 1885 में रेडियो तरंगों दव्ारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था। इन्होंने ही सूर्य से आने वाले विद्युत चुंबकीय विकिरण के अस्तित्व का सुझाव दिया था जिसकी पुष्टि 1944 में हुई। इन्होंने ही दर्शाया कि यांत्रिक, ताप, विद्युत तथा रासायनिक जैसी विभिन्न प्रकार की उत्प्रेरक प्रक्रियाओं में सब्जियों के उत्तक भी प्राणियों समान विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं। इसके लिए उन्होंने क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र का आविष्कार किया।
    • 1917 में बोस को ‘नाइट’ (Knight) की उपाधि दी गई। उल्लेखनीय है कि बोस ने अपना पूरा शोधकार्य बिना किसी अच्छे (महंगे) उपकरण और प्रयोगशाला के किया था। बोस ने एक अच्छा प्रयोगशाला बनाने का भी प्रयास किया। बोस इंस्टीट्‌यूट (बोस विज्ञान मंदिर) उनके इसी सोच का परिणाम है।
  • आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय- आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय भारत में रसायन विज्ञान के जनक माने जाते हैं। आचार्य राय भारत में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक पुनर्जागरण के प्रमुख प्रणेता था। ये आधुनिक भारत की पहली पीढ़ी के वैज्ञानिकों में से एक थे जिनके कार्यो और आदर्शो ने भारतीय विज्ञान को एक नई दिशा दी।
    • 1885 में पीएच. डी. पर शोध कार्य पूरा करने के बाद 1887 में ताम्र और मैग्नीशियम समूह के ‘कॉन्जुगेटेड सल्फेट’ के बारे में किए गए उनके कार्यो को मान्यता देते हुए देते हुए एडिनबरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. एस. सी. की उपाधि प्रदान की। वर्ष 1896 में इन्होंने मर्क्यूरस नाइट्राइट नामक एक नवीन स्थायी रासायनिक यौगिक के निर्माण से संबंद्ध एक शोध पत्र प्रकाशित किया। उनके इस कार्य के बाद विभिन्न धातुओं को नाइट्राइट और हाइपोनाइट्राइट तथा अमोनिया और कार्बनिक एमाइन्स (Organic Amines) के नाइट्राइट से संबंद्ध अन्य शोध पत्रों को नए आयाम मिले। वर्ष 1924 में उन्होंने भारतीय रसायन विद्यालय प्रारंभ किया।
    • आचार्य राय की प्रतिभा के कारण उन्हें भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 1920 में आयोजित सम्मेलन में अध्यक्ष पद सौंपा गया। उनके कार्यो को सम्मान देते हुए रॉयल सोसायटी ऑफ कमेस्ट्री ने उन्हें यूरोप के बाहर प्रथम ‘केमिकल लैंडमार्क प्लैक’ से संबोधित किया।
  • एम. विश्वेश्वरैया-ये भारत के लब्ध प्रतिष्ठित इंजीनियर थे। इनकी प्रतिभा को सम्मान देते हुए प्रति वर्ष 15 सितंबर (विश्वेश्वरैया का जन्म दिवस) को अभियंता दिवस (Engineer՚s Day) के रूप में मनाया जाता है।
    • इन्होंने हैदराबाद शहर की बाढ़ सुरक्षा प्रणाली के मुख्य डिजाइनर के रूप में कार्य किया। मैसूर में कृष्ण राजसागर बाँध के निर्माण के दौरान इन्हें मुख्य अभियंता का दायित्व सौंपा गया। विश्वेश्वरैया ने दक्कन क्षेत्र में सिंचाई प्रणाली की उत्तम व्यवस्था में भी योगदान दिया।
    • मैसूर राज्य (Mysore State) की सेवा करने के कारण इन्हें आधुनिक मैसूर राज्य का पिता भी कहा जाता है। इन्होंने ब्लॉक प्रणाली नामक एक प्रणाली का विकास किया। इसके तहत इस्पात फाटक बनाए गए। इन फाटकों के जरिए बांधों से प्रवाहित अपशिष्ट जल को रोका जा सकता था। उस समय के ब्रिटिश अधिकारी भी विश्वेश्वरैया के इस आविष्कार से चकित रह गए। विश्वेश्वरैया मात्र भवन निर्माण, सड़क और पुल निर्माण जैसे क्षेत्र तक अपनी प्रतिभा को सीमित रखने वाले इंजीनियरों में से नहीं थे। उन्होंने अवलोकन किया कि भारतीयों की स्थिति शोचनीय है। विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी और 100 में से अत्यल्प ही पढ़ और लिख सकते थे। अधिकांश किसान थे जो अपने भोजन के लिए पूरी तरह वर्षा पर निर्भर थे।
    • इन्हीं स्थितियों में विश्वेश्वरैया ने परामर्श दिया कि अनभिज्ञता, निर्धनता और रूग्णता जैसी समस्याओं के निराकरण के लिए एक आर्थिक सम्मेलन प्रारंभ किया जाए। इसका अनुपालन करने से देश के कई भागों में सकारात्मक परिणाम दिखे।
    • इन्होंने बैंक ऑफ मैूसर की स्थापना में भी अपना योगदान दिया। वर्ष 1955 में विश्वेश्वरैया को ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।
  • श्री निवास रामानुजन- भारत के प्रमुख वैज्ञानिकों में इनका नाम भी है। रामानुजन देश के प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। इन्हें सम्मान देते हुए वर्ष 2012 को इनके जन्म का 125वां वर्ष होने के कारण ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ के रूप में अंकित किया गया।
    • रामानुजन का गणित के प्रति लगाव था। वे गणित से ही ईश्वर का सही स्वरूप स्पष्ट करना चाहते थे। वे संख्या ‘एक’ को अनन्त ईश्वर का स्वरूप मानते थे। वे आदि संख्याओ के मान दशमलव के हजारवें स्थान तक निकालने में सक्षम थे।
    • रामानुजन के प्रमुख गणितीय कार्यों में से एक है किसी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात करने फॉर्मेले की खोज। उदहारण के लिए संख्या 5 के कुल विभाजनों की संख्या 7 है। रामानुजन के फॉमूले से किसी भी संख्या के विभाजकों की संख्या ज्ञात की जा सकती है। भौतिक जगत की नयी थ्योरी ‘सुपरस्ट्रिंग थ्योरी’ में इस फॉमूले का उपयोग हुआ है। रामानुजन ने एंडवास मैथेमेटिक्स के क्षेत्रों जैसे नंबर थ्योरी, इलिप्टिक फलन, हाइपरज्योमैट्रिक श्रेणी इत्यादि में अनेक महत्वपूर्ण खोज की।
  • रामानुजन संख्याएँ- ‘रामानुजन संख्या’ उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग दव्ारा निरूपित किया जा सकता है।

उदाहरणार्थ

23 + 163 = 93 + 153 = 4104

103 + 273 = 193 + 243 = 20683

इन्होंने वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात ‘पाई’ () के अधिक से अधिक शुद्ध मान प्राप्त करने के अनेक सूत्र प्रस्तुत किए हैं। ये सूत्र अब कम्प्यूटर दव्ारा n के दशमलव के लाखों स्थानों तक परिशुद्ध मान ज्ञात करने के लिए कारगर सिद्ध हो रहे हैं।

रामानुजन के जन्म दिवस 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस घोषित किया गया है।

  • चंद्रशेखर वेंकट रामन- रामन की ख्याति भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक के रूप में है। वे भौतिकी और गणित के विद्धान थे उन्हें ‘सर’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने अनुसंधान में इस बात का पता लगाया कि किस तरह अपसरित प्रकाश में अन्य तरंगदैर्ध्य की किरणें भी उपस्थित रहती हैं। उनकी खोज को ‘रमन प्रभाव’ के नाम से भी जाना जाता है। 1921 में विदेश यात्रा के दौरान उनके दव्ारा इस खोज का सूत्रपात किया गया। इस यात्रा में समुद्र के गहरे नीले जल पर इनका ध्यान आकर्षित हुआ जिसके बाद जल, हवा, बर्फ आदि पारदर्शक माध्यमों के अणुओं दव्ारा परिक्षिप्त (Scattered) होने वाले प्रकाश का उन्होंने अध्ययन किया। इस सिद्धांत के दव्ारा ही रमन ने बताया कि प्रकाश का रंग परिक्षेपण (Scattering) दव्ारा बदल जाता है। फांटोन्स (प्रकाश की किरण कणों) में ऊर्जा की कुछ कमी और इसके परिणामस्वरूप स्पेक्ट्रम में कुछ असाधारण रेखाएँ होना ‘रमन इफेक्ट’ कहलाता है। फोटोन्स दव्ारा खोई ऊर्जा की मात्रा उस द्रव रसायन के द्रव के अणु के बारे में सूचना देती है जो उन्हें छितराती है। भिन्न-भिन्न प्रकार के अणु फोटोन्स के साथ मिलकर विविध प्रकार की पारस्परिक क्रिया करते हैं और ऊर्जा की मात्रा में भी अलग-अलग कमी होती है। असाधारण रमन रेखाओं के फोटोन्स में ऊर्जा की कमी को मापकर द्रव, ठोस और गैस की आंतरिक अणु रचना का पता लगाया जाता है। इस प्रकार, पदार्थ की आंतरिक संरचना का पता लगाने के लिए रमन प्रभाव एक लाभदायक उपकरण सिद्ध हो सकता है। इससे पदार्थों में अणुओं और परमाणुओं की आंतरिक संरचना का अध्ययन सहज हो गया।
    • ‘रामन प्रभाव’ की खोज 28 फरवरी, 1928 को हुई थी। इस महान खोज की याद में 28 फरवरी को प्रति वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है।
    • रामन को अपने अभूतपूर्व खोज के लिए 1930 में भौतिकी का नोबल पुरस्कार देने की घोषणा भी की गयी। रामन पहले एशियाई और अश्वेत थे जिन्होंने विज्ञान में नोबल पुरस्कार जीता था। इससे पहले 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला था। भारत सरकार ने इन्हें, 1954 में भारत रत्न से भी सम्मानित किया। इनकी मृत्यु 1970 में हो गयी।

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