Science and Technology: Achievements of Indians in Science and Technology

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियाँ (Achievements of Indians in Science and Technology)

  • बीरबल साहनी- ये भारत के जीवाश्म जीवविज्ञानी (Pale botanist) और भू-विज्ञानी (Geologist) थे। इन्होंने भारतीय उपमहादव्ीव में विद्यमान जीवाश्मों का अध्ययन किया। उन्होंने जीवन भर प्रकृति के रहस्य ढूंढने का कार्य जारी रखा। वे लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर रहे और विद्यार्थियों को जीव विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा दी। बीरबर साहनी ने कई बार हिमालय क्षेत्र का भ्रमण किया। उन्होंने हिमालयी पौधों का व्यापक संग्रहण किया था। उन्होंने सजीव और जीवाश्म पौधों के आकृति विज्ञान का गहन अध्ययन किया। उन्होंने भारत के गोंडवाना क्षेत्र के पादपों का भी अध्ययन किया।
    • उन्होंने जीवाश्म जीवविज्ञान समाज की स्थापना की। भारत में रहकर उन्होंने शिक्षण कार्य भी किए। लगभग एक वर्ष तक उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय में पढ़ाया। बीरबल साहनी को सम्मान देते हुए लखनऊ में बीरबल साहनी ‘पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान’ स्थापित किया गया।
  • पी. सी महालनोविस- ये एक भारतीय वैज्ञानिक और सांख्यिकी विशेषज्ञ थे। उन्हें महालनोविस दूरी (Mahalanobis Distance) नामक सांख्यिकी मापक की अवधारणा देने के लिए याद किया जाता है। उन्हीं के निर्देशन में भारतीय सांख्यिकीय संस्थान की स्थापना की गयी। महालनोविस के निर्देशन में ही व्यापक स्तरीय नमूना सर्वेक्षण किए गए। उन्होंने फसल उपज का आकंलन करने की विधि भी सुझाई। स्पीच पैथोलॉजी और भाषायीशुद्धता क्षेत्र में भी इन्होंने योगदान दिया।
    • भारत के दव्तीय पंचवर्षीय योजना में महालनोविस ने दव्क्षेत्रीय मॉडल पर आधारित औद्योगिकीकरण पर बल दिया। उनके नाम से युक्त ‘महालनोविस मॉडल’ का दव्तीय पंचवर्षीय योजना में अमूल्य योगदान रहा। इसी आधार पर इस अवधि में वृहद स्तर पर औद्योगीकरण कार्य संपन्न हुए। इन्हें भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
  • मेघनाद साहा- ये एक प्रसिद्ध खगोलविद थें। ये साहा समीकरण के प्रतिपादक थे। यह समीकरण तारों (In stars) में भौतिक एवं रासायनिक स्थिति की व्याख्या करता है। इन्होंने साहा इंस्टीट्‌्‌यूट ऑफ न्यूक्लीयर फिजिक्स तथा इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइन्स नामक दो महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की।
    • साहा ने तापीय आयनीकरण का सिद्धांत (Theory of Thermal Ionisation) दिया। इसके जरिए उन्होंने तारकीय वर्णक्रम के उत्पत्ति (Origin of Stellar Spectra) की व्याख्या की। साहा दव्ारा गतिशील तारे माइरा सेटी) की खोज ने खगोलीय इतिहास को नई दिशा दी।
    • भारत में सर्वप्रथम साहा ने ही नाभिकीय भौतिकी क्षेत्र में शिक्षण प्रशिक्षण कार्य प्रांरभ किया। देश में प्रथम साइक्लोट्रॉन का निर्माण साहा के नेतृत्व में ही किया गया।
    • साहा 1938 में जवाहरलान नेहरू की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय योजना समिति के सक्रिय सदस्य भी थे। उन्होंने सामाजिक विकास के लिए व्यापक औद्योगिकरण को समर्थन दिया।
    • साहा ने भारतीय कैलेन्डर के सुधार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1952 में कैलेन्डर सुधार समिति के अध्यक्ष पर पर साहा की नियुक्ति की गयी। इस समिति का कार्य वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित एक ऐसे परिशुद्ध कैलेन्डर का निमार्ण करना था जिसे पूरे भारत में अपनाया जा सके। समिति को पूरे देश में विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग में लाए जाने वाले लगभग 30 कैलेन्डरों का अध्ययन करना था। समिति ने निम्नलिखित प्रमुख परामर्श दिए-
    • एकीकृत राष्ट्रीय कैलेन्डर के रूप में शक संवत्‌ का उपयोग किया जाना चाहिए।
    • वर्ष का प्रारंभ वसंत विषुव दिवस (21 मार्च) से होना चाहिए।
    • एक सामान्य वर्ष 365 दिनों का और एक अधिवर्ष 366 दिनों का हो। शक संवत्‌ में 78 का योग करने पर कुल यदि 4 से विभाजित हो, तब वह अधिवर्ष माना जाए।
    • वर्ष का प्रथम माह चैत्र हो। चैत्र से भाद्र माह तक प्रत्येक माह 31 दिनों का और शेष 30 दिनों का हो।
  • शांति स्वरूप भटनागर- श्री भटनागर भारत के एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे। वे वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के प्रथम महानिदेशक थे। उन्हें ‘शोध प्रयोगशालाओं का पिता’ की संज्ञा दी गयी है। श्री भटनागर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रथम अध्यक्ष भी थे।
    • कच्चे तेल की ड्रिलिंग विधि को उन्नत करने में श्री भटनागर का अमूल्य योगदान रहा। स्वतंत्रता के बाद भारत की विज्ञान प्रौद्योगिकी अवसंरचना और नीतियों के निर्माण में भटनागकर का योगदान रहा। वर्ष 1948 में साईटिफिक मैनपावर समिति की रिपोर्ट निर्मित करने एवं इसके प्रकाशन में उन्होंने अपना योगदान दिया। उन्होंने अप्लायड कमेस्ट्री के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया।
    • भटनागर की प्रेरणा के परिणामस्वरूप सरकार ने वर्ष 1943 में राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला, राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, ईंधन शोध स्टेशन, ग्लास एंड सिरामिक रिसर्च इंस्टीट्‌यूट की स्थापना को स्वीकृति दी। इससे भारत में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं का युग शुरू हुआ।
    • भारत की स्वतंत्रता के बाद भटनागर शिक्षा मंत्रालय में सचिव और सरकार के शैक्षणिक सलाहकार के रूप में भी नियुक्त हुए। स्वतंत्र भारत में इन्होंने भारतीय रसायन समाज, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान और भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष का पदभार भी संभाला। भारत सरकार ने वर्ष 1954 में इन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। बाद में विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रदान किये जाने वाले पुरस्कार का नामकरण शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार किया गया।
  • सत्येन्द्रनाथ बोस- सत्येंद्रनाथ बोस ने अपने वैज्ञानिक शोधों के लिए प्रेरणा जगदीश चंद्र बोस और प्रफुल्ल चंद्र राय से ली। सत्येंद्रनाथ को क्वांटम सिद्धांत पर किये गए कार्य के लिए ख्याति मिली। इस सिद्धांत के जरिए बोस-आइंस्टीन कार्यपद्धति को समर्थन मिला। अलबर्ट आइंस्टीन और सत्येंद्र बोस ने कण भौतिकी (Particle Physics) पर शोध-पत्र भी प्रकाशित किया।
    • जिन कणों ने बोस-आइंस्टीन कार्य पद्धति का अनुपालन किया उन्हें बोसॉन कंण की संज्ञा दी गई। हिग्स बोसॉन की खोज एक प्रकार से सत्येंद्रनाथ बोस को दी गई श्रद्धांजली है क्योंकि बोसॉन शब्द इनके उपनाम पर ही आधारित है।
    • हिग्स बोसॉन की आधारभूत अवधारणा बोस आइंस्टीन कार्य पद्धति पर ही आधारित है। सत्येंद्रनाथ को अपनी उपलबिधयों के लिए वर्ष 1954 में पदम्‌ विभूषण से सम्मानित किया गया। वर्ष 1974 में इनकी मृत्यु हो गई। वर्ष 1986 में सत्येंद्रनाथ बोस के सम्मान में सत्येंद्रनाथ बोस आधारभूत विज्ञान केंद्र की स्थापना की गई।
    • सत्येंद्रनाथ ने मेघनाद साहा के साथ मिलकर भारत में आधुनिक सैद्धांतिक भौतिकी की स्थापना की। इन्होने सांख्यिकीय यांत्रिकी और क्वांटम सांख्यिकी क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैद्युतगतिकी (Electrodynamics) के पारंपरिक उपयोग के बिना सत्येंद्रनाथ ने प्लैंक के कष्ण पिंड विकिरण नियम की व्याख्या की।
  • पंचानन महेश्वरी- महेश्वरी एक लब्ध प्रतिष्ठित जीव विज्ञानी थे। इन्होने जीम्नोस्पर्म (Gymnosperm) और एनिजयोस्पर्म (Angiosperm) के भ्रूण विज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन किया। इन्होने प्रयोगिक भ्रूण विज्ञान, पौध उत्तक विज्ञान और वनस्पति विज्ञान का भी अध्ययन किया। उन्होने ‘इन्टरनेशनल सोसायटी ऑफ प्लांट सॉफोलोजिस्ट्‌स’ की स्थापना की। पंचानन महेश्वी ने पौधों के 1000 से भी अधिक वर्गो के भ्रूण कोश से समबन्द्ध अध्ययन किया। उन्होने वर्गीकरण विज्ञान (Taxonomy) में भ्रूणीय लक्षणों के उपयोग को प्रचलित किया। भ्रूण विज्ञान और ऊत्तक सवर्द्धन के शोध के केंद्र के रूप में उन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय में वनस्पति विभाग की स्थापना की।
    • श्री महेश्वरी ने भ्रूण विज्ञान, शरीर विज्ञान और आनुवांशिकी के मध्य संबंध का अध्ययन किया। उन्होंने अपरिपक्व भ्रूणों के कृत्रिम संवर्धन (Artificial Culture) पर पहल करने को प्राथमिकता दी। परखनली निषेचन और अंतर अंडाशयी परागण (Intraovarian Pollination) क्षेत्र में भी उनका योगदान रहा।
  • डी. एस. कोठारी-श्री कोठारी भारत के महत्वपूर्ण वैज्ञानिक थे। उन्होंने अर्न्स्ट रदरफोर्ड के निरीक्षण में पीएच. डी की डिग्री पायी। दिल्ली विश्वविद्यालय में वर्ष 1934 से 1961 तक रीडर, प्रोफेसर एवं भौतिकी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य किया। 1948 से 1961 तक रक्षा मंत्रालय के सलाहकार रहे और वर्ष 1961 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। दिल्ली विश्वविद्यालय में रहते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा, कल्पनाशीलता और मानव कल्याण की भावना के साथ कार्य किया और इस विश्वविद्यालय को नई दिशा दी। उल्लेखनीय है कि भारत की स्वतंत्रता के बाद भारत के रक्षा विज्ञान को ठोस रूप देने की जिम्मेदारी कोठारी को ही दी गई। रक्षा वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने अनुसंधान के लिए जिन मुख्य क्षेत्रों को चुना उनमें ऑपरेशनल रिसर्च, बैलिस्टिक, विस्फोटक, शस्त्रीकरण, रॉकेट्‌स और मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, नौसेना संबंद्ध तकनीक, इंजीनियरिंग, खाद्य सामग्री, जीवनयापन, प्रतिकूल पर्यावरण की समस्याएँ और रक्षा संबंधी संस्थानों में प्रशिक्षण आदि विषय प्रमुख थे। कोठारी का मंतव्य था कि हमारे संसाधन सीमित हैं, इसलिए हमें विज्ञान को पूरी तरह समझकर मितव्ययता के साथ और विवेक के साथ अपनी रक्षा सामग्री का निर्माण करना चाहिए।
    • कोठारी आयोग- इस आयोग की नियुक्ति वर्ष 1964 में डॉ. डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में की गई। आयोग के कार्य थे-
      • सरकार को शिक्षा के सभी पक्षों तथा प्रक्रमों के विषय में राष्ट्रीय नमूने की रूपरेखा बनाने का सुझाव देना।
      • शिक्षा से संबंद्ध साधारण सिद्धांत की रूपरेखा बनाने का सुझाव देना।
    • आयोग ने निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिए-
      • शिक्षा के अनिवार्य अंग के रूप में समाज सेवा और कार्य अनुभव, जिसमें हाथ से काम करने का तथा उत्पादन अनुभव सम्मिलित हों, आरंभ किए जाएँ।
      • माध्यमिक शिक्षा को व्यावसायिक बनाने पर बल दिया गया।
      • शिक्षा के पुननिर्माण में कृषि, कृषि में अनुसंधान तथा इससे संबंधित विज्ञानों को उच्च प्राथमिकता दी जाए।
      • विश्वविद्यालयों में एक छोटी-सी संस्था ऐसी बनायी जाए जो उच्चतम अंतरराष्ट्रीय मानकों को प्राप्त करने का उद्देश्य रखती हो।

कोठारी ने यूजीसी और एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं में भी महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। वे जेएनयू (दिल्ली) के कुलपति और इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी के निर्देशक भी रहे। उन्हें पद्म भूषण पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

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