Science and Technology: Bio-Fertilizer and Objectives of Department of Biotechnology

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जैव प्रौद्योगिकी के अनुपयोग (Applications of Biotechnology)

कृषि के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology in Agriculture)

जैव कीटनाशक (Bio-Fertilizer)

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के उद्देश्य (Objectives of Department of Biotechnology)
  • सामाजिक आर्थिक विकास के लिए नई तकनीकी का विकास एवं उपयोग।
  • जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अवसरंचनाओं का निर्माण एवं विकास।
  • फसल संवर्धन के लिए विशेष कार्यक्रमों का निरूपण।
  • जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित सभी कार्यक्रमों का आयोजन, संचालन तथा समेकन।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के निम्नलिखित छ: स्वायत्त संस्थान हैं-

  • राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली।
  • राष्ट्रीय कोशिका विज्ञान केन्द्र, पुणे
  • डी. एन. ए. फिंगर प्रिंटिंग एवं नैदानिकी केन्द्र, हैदराबाद
  • राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान केन्द्र, नई दिल्ली
  • राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केन्द्र, नई दिल्ली।
  • जैव-संसाधन एवं सतत्‌ विकास संस्थान, मणुिपर।

जैव-प्रौद्योगिकी में अनुसंधान के लिए इन तीन संस्थानों में शोध केन्द्रों की स्थापना की गई है-

  • भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई (IARI) , दिल्ली
  • राष्ट्रीय दुग्ध अनुसंधान संस्थान (NDRI) , कारनाल
  • भारतीय वेटरनेरी अनुसंधान संस्थान (IVRI) , इज्जतनगर (बरेली) ।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में स्थापित केन्द्र को आजक्ल राष्ट्रीय पादप जैव -प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र (National Research Centre in Plant Bio-technology) कहा जाता है।

पादप आण्विक जैविकी (Plant Molecular Biology) में उच्च अन्वेषण के लिए जैव-प्रौद्योगिकी विभाग में निम्नलिखित सात संस्थानों में पादप आण्विक जैविकी केन्द्रों की स्थापना की है-

  • मदुरै कामराज, विश्वविद्यालय, मदुरै (तमिलनाडु)
  • जवाहरल लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
  • दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
  • उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
  • बोस संस्थान, कोलकाता
  • तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर
  • राष्ट्रीय वानस्पतिक शोध संस्थान (NBRI) , लखनऊ।

संयुक्त राष्ट्र ने एक अंतरराष्ट्रीय आनुवांशिक अभियांत्रिकी एवं जैव -प्रौद्योगिकी केन्द्र (International Centre for Genetic Engineering & Biotechnology-ICGEB) की स्थापना की है। ICGEB का एक संस्थान ट्रिएस्टे (इटली) तथा दूसरा नई दिल्ली है। नई दिल्ली स्थित केन्द्र की स्थापना सन्‌ 1987 में की गई थी।

प्रोटिऑमिक्स (Proteomics)
  • प्रोटिऑमिक्स एक आधुनिक विज्ञान है, जिसके अंतर्गत मानव शरीर में पाये जाने वाले प्रोटीन्स की विभिन्न अवस्थाओं का एक ही समय में तीव्र गति से विश्लेषण किया जाता है तथा कोशिकाओं में प्रोटीन्स की अंत: स्थिति व उनके परस्पर संबंधों का मानचित्र तैयार किया जाता है।
  • इस विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति से कैंसर व हृदय रोग जैसी बीमारियों को समझने, पोषण स्तर का अध्ययन करने, प्रौधों और उनकी प्रजातियों के लक्षणों को पहचानने तथा पौधों में आनुवांशिक भिन्नता का पता लगाने आदि में हमें काफी सहायता मिली है। इससे हमें यह जानने में भी सहायता मिली है कि किस प्रकार विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं तथा किस प्रकार इसके विरुद्ध नई दवाइयाँ निर्मित की जा सकती हैं? इस प्रकार कहा जा सकता है कि आने वाले समय में चिकित्सा जगत में प्रोटिऑमिक्स की भारी उपयोगिता संभव है।
टर्मिनेटर जीन (Terminator Gene)
  • टर्मिनेटर जीन अभिव्यक्ति को बदल देता है, जिससे पौधे अपने प्रजनक स्विच को नष्ट करके भ्रूण के विकास को अवरुद्ध कर देते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, जैव प्रौद्योगिकी की सहायता से किसी भी पौधे में इस प्रकार के जीन डाले जा सकते हैं जिससे उस पौधे की अच्छी फसल तो प्राप्त की जा सकेगी, लेकिन इसके बीज नए पौधे उत्पन्न करने में सक्षम नहीं होंगे। इस तरह के जीन का विकास वस्तुत: जन साधारण के लाभ को ध्यान में रखकर ही किया जाता है, लेकिन कभी-कभी स्थिति इसके विपरीत हो जाती है, और ऐसा ही टर्मिनेटर जीन के साथ भी हुआ है जिसकी वजह से यह वैश्विक स्तर पर विवाद का मुद्दा बन गया है। इस तरह के जीन से एक जो सबसे बड़ी समस्या हो सकती है, वह यह है कि यदि संपूर्ण विश्व में एक समान जीन वाली फसलें उगाई जाने लगीं तो विविधता समाप्त हो जाएगी तथा फसलों के लुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा।
  • टर्मिनेटर जीन युक्त बीजों को बिक्री से पूर्व टेट्रासाइक्लिन के संपर्क में लाया जाता है। पर्यावरणविदों का मानना है कि टेट्रासाइक्लिन युक्त बीजों को बार बार बोए जाने से मृदा में उपस्थित लाभप्रद सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं जिसे मृदा की उर्वरता घट जाती है।
Mh- , U- , - Vhdk (DNA Vaccine)
  • मनुष्य के विभिन्न रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता के विकास के लिए डी. एन. ए. टीके बनाए जाते हें। ये टीके परंपरागत टीकों की तुलना में प्रभावशाली एवं सुरक्षित होने के साथ साथ सस्ते भी होते हैं, क्योंकि इन टीकों में जीवाणु या मृत रोगाणुओं का प्रयोग न करके इनसे प्राप्त किए गए विशेष जीन (Pathogens) का प्रयोग शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय बनाने के लिए किया जाता है।
  • किसी रोगाणु के विरुद्ध डी. एन. ए. टीका विकसित करने के लिए सर्वप्रथम उस रोगाणु के उस जीन की पहचान की जाती है जो प्रतिजन (Antigen) की तरह कार्य करने वाले प्रोटीन को कूटबद्ध (Coded) करता है। ये जीन जीवाणु (Bacteria) से प्राप्त किए गए प्लाज्मिड नामक डी. एन. ए. की छोटी श्रृंखला में समाहित करा दिये जाते हें। इस तरह से तैयार प्लाज्मिड ही डी एन. ए. टीके होते हैं। डी. एन. ए. टीका एक घोल के माध्यम से अथवा सुई दव्ारा त्वचा की कोशिकाओं या माँसपेशियों की कोशिकाओं में प्रवेश कराया जाता है। इन टीकों के प्रयोग से किसी अनैच्छिक संक्रमण की आशंका भी नही रहती क्योंकि डी. एन. ए. टीकों में रोगाणु को पुन: उत्पन्न कर सकने वाले जीव नहीं होते हैं।
  • डी. एन. ए. टीकों ने अब ऐसी बीमारियों को भी साध्य बना दिया है, जिन्हें अब तक असाध्य माना जा रहा है। उदाहरण स्वरूप वैज्ञानिकों ने ‘प्रोटिएज इनहिविटर’ नामक ऐसी दवा की खोज शुरू की हैं जो एड्‌स के विषाणुओं को रोगी की कोशिकाओं के साथ संबंध नहीं बनाने देती है।
डी. एन. ए टीके के लाभ (Advantages of DNA Vaccines)
  • डी. एन. ए. टीके अत्यधिक स्थिर एवं सुरक्षित होते हें।
  • डी. एन. ए. टीके दीर्घ काल तक रहने वाली प्रतिक्रिया उपलब्ध कराते हैं।
  • इन टीकों का ठोस अथवा बाल के रूप में भण्डारण किया जा सकता है।
  • इस तरह के समस्त टीके एक ही तरह की तकनीक से बनाए जा सकते हैं।ं

बायो रेमेडिएशन (Bio-Remediation)

  • बायो रेमेडिएशन एक ऐसी तकनीक है जिसमें सूक्ष्म जीवों (Micro Organism) का प्रयोग कर पर्यावरणीय प्रदूषकों को कम करने या रोकने का कार्य किया जाता है। इसके अंतर्गत पर्यावरण से प्रदूषकों को दूर करने के साथ-साथ प्रदूषिक जगहों को उसके पूर्व रूप में लाया जाता है तथा भविष्य में होने वाले प्रदूषण की रोकथाम की जाती है।
  • यह तकनीक मुख्यत: इस आधार पर कार्य करती है कि सूक्ष्म जीवों में जैविक यौगिकों को नष्ट करने की असीमित क्षमता होती हैं। अनुसंधान के तौर पर बायो रेमेडिएशन का व्यापक रूप से प्रयोग मरुस्थलीकरण को रोकने, वैश्विक जलवायु परिवर्तन को कम करने एवं पदार्थों के जीवन चक्र को उनके प्राकृतिक रूप में बनाये रखने के लिए किया जा रहा है। साथ ही इस दिशा में ऐसे सूक्ष्म जीवों के विकास पर बल दिया जा रहा है जो मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को विपरीत दिशा में मोड़ने में सहायता करें।

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