Science and Technology: Developing Agriculture through Biotechnology

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निम्नतापी शल्य चिकित्सा के विभिन्न चरण (Different Stages of Inferior Surgery)

जैव प्रौद्योगिकी से कृषि विकास (Developing Agriculture through Biotechnology)

  • भारत में कृषि अब केवल जीविका का साधन मात्र नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय कई विशिष्ट परियोजनाओं का क्रियान्वयन कर फसल उत्पादन में वृद्धि की जा रही है। वास्तव में जैव प्रौद्योगिकी की सहायता से कृषि क्षेत्र में व्याप्त जैविक तथा अजैविक, दोनों ही प्रकार की समस्याओं का निराकरण भी संभव हो सका है।
  • विभिन्न प्रकार के खर-पतवारों तथा कीटों दव्ारा जैविक तनाव उत्पन्न होते हैं। इनके प्रभाव के कारण उत्पादन में अंतत: हृास होता है। ऐसे जैविक तनावों को कम करने के लिए नये पदार्थों के निर्माण की आवश्यकता होती है। इस कार्य में अत्यधिक निवेश अनिवार्य है। जैसा कि सर्वविदित है, हानिकारक पदार्थों के उपयोग में कई प्रकार की स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी समस्याएंँ उत्पन्न होती हैं। ऐसी स्थिति में जैव प्रौद्योगिकी अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकती है। जैव प्रौद्योगिकी ने कई प्रभावकारी, विश्वसनीय, सुरक्षित तथा पर्यावरण मित्र प्रक्रियाओं का विकास किया है।
  • आधारिक रूप से डी. एन. ए. पुनर्संयोजी तकनीक ने ऐसी प्रक्रियाएंँ विकसित की हैं। इनके तहत प्रजातियों में नाटकीय परिवर्तन लाने के लिए उपापचयी मार्गों को परिचालित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, प्रजातियों पर पड़ने वाले जैविक तनावों को कम करने में पराजीनी तकनीक ने भी विशिष्ट योगदान दिया हैं। एक अनुमान के अनुसार, संपूर्ण विश्व में लगभग 50 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर पराजीनी तकनीक से विकसित फसलों की कृषि की जाती है। इनमें से 90 प्रतिशत प्रजातियांँ ऐसी हैं जिनमें कीटानाशक अथवा खर-पतवार का नाश करने की क्षमता विद्यमान है। तकनीकी दृष्टिकोण से यहांँ यह उल्लेख समीचीन होगा कि विषाणुओं के संक्रमण का विरोध करने के लिए प्रजातियों का विकास जीन परिचालन (Gene Manipulation) विधि दव्ारा किया जाता है। इसके लिए विषाणु के आवरण के प्रोटीन का प्रयोग होता है।
  • अजैविक तनावों के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि ऐसे तनाव खनिजों तथा जल की कमी से अथवा मृदा की खराब स्थिति से उत्पन्न होते हैं। भारत जैसे देश में पोषक तत्वों और मृदा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अनुत्पादक क्षेत्रों का निरंतर विस्तार हो रहा है। इस विस्तार को रोकने तथा फसलों की उत्पादकता में वृद्धि के लिए जैव प्रौद्योगिकी की सहायता ली जा रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के राष्ट्रीय फसल जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र के. वी. एल. चोपड़ा के शब्दों में, ‘अजैविक तनावों के कारण प्रभावित क्षेत्रों में व्यावसायिक कृषि की संभावना कम है जिसका मुख्य कारण यह है कि निजी क्षेत्र, जिनके पास बौद्धिक संपदा अधिकार संरक्षित है, को इन क्षेत्रों से पर्याप्त लाभ प्राप्त नहीं होता। इस कारण वे ऐसे कार्यों में पर्याप्त निवेश नहीं करती।’ जैव प्रौद्योगिकी के तहत विभिन्न तकनीकों का प्रयोग फसलों की व्यावसायिक व्यवहार्यता की वृद्धि के लिए भी किया जाता है। विशेष रूप से आर्थिक उदारीकरण के काल में यह आवश्यक है कि उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का विकास किया जाए। केवल गुणवत्ता में वृद्धि के बाद ही भारत वैश्विक स्तर पर निर्यात बाजारों का लाभ प्राप्त कर सकता है। साथ ही, प्रौद्योगिकीय रूप से उन्नत फसलों के विकास से प्रतिस्पर्धात्मक कीमतों का निर्धारण भी संभव है। इस पृष्ठीभूमि में यह अनिवार्य है कि नये गुणों वाली फसल प्रजातियों का विकास किया जाए। उदाहरणस्वरूप, बीटी कपास, जीएम सरसों आदि।
  • इसके अतिरिक्त, जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से फसलों तथा उत्पादों को लंबी अवधि तक संरक्षित रखने के कार्य में भी व्यापक सफलता प्राप्त हुई है। इसके कारण भी उनकी व्यावसायिक व्यवहार्यता में वृद्धि होगी। हाल के वर्षों में केन्द्र के स्थानातंरण के बदले हरितलवक (Chloroplast) रूपांतरण की प्रक्रिया पर विशेष बल दिया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हरितलवक रूपांतरण की प्रक्रिया के कई लाभ हैं। प्रत्येक हरितलवक किसी पौधे में एक छोटे कारखाने के रूप में कार्य करता है तथा इस तकनीक के माध्यम से जीन को बेहतर अभिव्यक्ति भी की जा सकती है।

संश्लेषित जैविकी (Synthetic Biology)

  • संश्लेषित जैविकी जैव अभियांत्रिकी का वह पक्ष है, जिसमें जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा अभियांत्रिकी का व्यवहारिक उपयोग किया जाता है। इस शब्दावली का प्रयोग 1994 में (Waclowsky) सेंप ने किया था इसे कई अवसरों पर जीव विज्ञान में संश्लेषित रसायन शास्त्र का विस्तार कहा गया है। जबकि अभियांत्रिकी जैविकी को एक प्रौद्योगिकी के रूप में मान्यता दी गई है।
  • अत: स्पष्ट है कि यह जैव प्रौद्योगिकी का ही विस्तृत रूप है जिसमें न केवल नई प्रजातियों का विकास बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को भी शामिल किया गया है जैसे मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक दवाओं और टीकों का निर्माण, कम्प्यूटर प्रणालियों के लिए डी. एन. ए. चिप का निर्माण, विभिन्न जीवाणु कोशिकाओं में रासायनिक परिवर्तन लाकर उनकी उपयोगिता में वृद्धि, कई उपयोगी पदार्थों का निर्माण जैसे सिल्क प्रोटीन, कीटरोधी प्रजातियों का विकास कर विशेषकर कृषि उत्पादकता में वृद्धि, विभिन्न उत्पादों को संश्लेषित कर औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन।
  • इन उपयोगिताओं के बावजूद संश्लेषित जैविक एक विवादास्पद विज्ञान है। अधिकांशत: यह कहा गया है कि संश्लेषित जैविकी जैव सुरक्षा और जैव नैतिकता का विरोध करती है। दूसरी ओर यह कई अवसरों पर जैव संसाधनों के अनुचित उपयोग को भी बढ़ावा देती है। अत: इसका विनियमन प्रभावी रूप से किया जाना चाहिए।

जीन हस्ताक्षर (Genetic Signature)

  • कोशिकाओं में उपस्थित डी. एन. ए. में एडनीन, थायमीन, गुआनिन, साइटोसिस जैसे नाइट्रोजन के क्षार पाए जाते हैं। इन्हीं क्षारों के विशिष्ट अनुक्रमों से प्रोटीन संश्लेषण होता है। इन अनुक्रमों को जीन कहते हैं। इसके विपरीत डी. एन. ए. में उपस्थित कई अन्य प्रकार के अनुक्रम प्रोटीन संश्लेषण के लिए उत्तरदायी नहीं होते तथा व्यक्ति विशिष्ट होते है। इन्हीं अनुक्रमों को सामूहिक रूप से जीन हस्ताक्षर अथवा जीन फिंगर प्रिंट कहा जाता है।
  • किसी व्यक्ति के जीन हस्ताक्षर का निर्माण उसके माता-पिता से प्राप्त जीनों अथवा क्षार अनुक्रमों से होता है।

उपयोगिताएंँ (Utilities)

  • मातृत्व अथवा पितृत्व की पहचान में सहायक।
  • नए रोगों की पहचान में सहायक।

उल्लेखनीय है कि ऐसे विशिष्ट रोगों की पहचान के लिए जीन चिन्हकों का प्रयोग किया जाता है।

इन चिन्हकों की सहायता से अंगप्रत्यारोपण के लिए अंगदाता के जीन हस्ताक्षर का विश्लेषण करना सरल होता है। हाल ही में किए गए प्रयोग से यह स्पष्ट किया गया है कि Tr-DNA (Trans Renal DNA) की उपस्थित कई विशिष्ट रोगों की पहचान में सहायता होती है जो विशेषकर वृक्क से संबंधित होते हैं।

डी. एन. ए. पितृत्व परीक्षण (DNA Paternity Test)

  • यह परीक्षण वस्तुत: जीन हस्ताक्षर अथवा जीन फिंगर प्रिंट का प्रयोग है जिसके आधार पर किसी व्यक्ति के माता-पिता की आनुवांशिक पहचान की जाती है। दूसरे शब्दों में पितृत्व परीक्षण किसी बच्चे के जैविक पिता की पहचान करने वाली तकनीक है।
  • उल्लेखनीय है कि इस तकनीक के पूर्व कई अन्य तकनीकों से जैविक पिता की पहचान की जाती रही है जैसे-रक्त समूह टाइपिंग, विशिष्ट प्रोटीन अथवा इंजाइमों का परीक्षण अथवा विश्लेषण HLA (Human Leulocyle Antigen) का प्रयोग। इन परीक्षणों के लिए PCR (Poly Mersa Chain Reaction) पद्धति का भी प्रयोग किया जाता रहा है जिसमें डी. एन. ए. अनुक्रमों की प्रतिनिधि बनाई जाती है। इन सभी तकनीकों का अधिक सटीक तकनीक के रूप में डी. एन. ए. पितृत्व की पहचान है क्योंकि इसकी सफलता दर 99.0 प्रतिशत है।
  • ऐसे परीक्षण के लिए डी. एन. ए. प्रोफाइलिंग नामक विधि का प्रयोग किया जाता है जिसमें व्यक्ति की संपूर्ण डी. एन. ए. संरचना का चित्रण किया गया है। अनुसंधानों से यह स्पष्ट किया गया है कि किसी व्यक्ति में माता और पिता से लगभग समान मात्रा में आनुवांशिक पदार्थ हस्तांतरित होते हैं। इन्हीं पदार्थों से व्यक्ति के विशिष्ट डी. एन. ए. अनुक्रमों का निर्माण होता है। इन पदार्थों को सामान्यत: नाभिकीय आनुवांशिक पदार्थ कहा गया है। इस आधार पर व्यक्ति और उसके माता पिता के अनुक्रमों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।
  • यहांँ यह उल्लेखनीय है कि. ल गुणसूत्र से हस्तांतरित अनुक्रमों से पितृत्व की पहचान सबसे सटीक होती है। इसी प्रकार मातृत्व परीक्षण को सर्वाधिक सटीक तब माना जाता है जब माता की जीन संरचना में से (Mitochondria) के डी. एन. ए. अनुक्रम का हस्तांतरण बच्चे की जीन संरचना में होता है।
  • इस परीक्षण का उपयोग यौन अपराधों की जाँच से संबंधित है। यह माना गया है कि पितृत्व परीक्षण किसी व्यक्ति के एकान्तता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। दूसरे शब्दों में इसे संविधान के एक्ट 21 का उल्लंघन माना जा सकता है। इसी प्रकार यह भी आशंका है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 20 (3) का उल्लंघन होता है। जिसमें स्वयं के विरुद्ध साक्षी होने से सुरक्षा का प्रावधान है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि “यदि कोई वस्तु या पदार्थ जो किसी व्यक्ति के स्वामित्व में है तथा उसे प्राप्त किए बिना जाँच की प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती तथा अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा जा सकेगा तो भारतीय साक्ष्य कानून 1872 के तहत ऐसी वस्तु अथवा पदार्थ की प्राप्ति की जा सकती है। इस स्थिति को एक्ट 20 (3) और 4 का उल्लंघन नहीं माना जाएगा” ।

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