Science and Technology: Behavioural Technology and Economic Aspects

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आधारभूत संकल्पनाएँ (Basic Concepts)

व्यावहारिक प्रौद्योगिकी (Behavioural Technology)

  • वह प्रौद्योगिकी जिसके माध्यम से पर्यावरण के सभी जैविक एवं अजैविक कारकों के व्यवहार में परिवर्तन लाने वाले सभी का अध्ययन किया जाता है, व्यावहारिक प्रौद्योगिकी कहलाती है। लेकिन यह जान लेना अति आवश्यक है कि ऐसे व्यावहारिक परिवर्तनों का अध्ययन क्यों किया जाना चाहिए? विशेष भूमंडलीकरण के दौरान जब व्यक्तिवादी मनोवृत्तियों का विकास तीव्र से हो रहा है, तकनीकी तथा प्रौद्योगिकीय उन्नयन हमारे व्यवहारों को निर्देशित करने वाला उपकरण सिद्ध हुआ है।
  • यह विदित है कि ‘प्रवृत्ति’ (Tendency) शब्द का अर्थ व्यवहार के सन्निकट है। प्रवृतियांँ वस्तुत: मानव के पूर्वनियोजित व्यवहार लेकिन इन प्रवृत्तियों में क्षेत्र एवं सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से भी परिवर्तन होते हैं। दूसरी ओर, नृवैज्ञानिक आयाम भी व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। इन प्रभावों के कारण किसी व्यक्ति में नम्यता जैसे गुण विकसित होते हैं। इसी नम्यता के कारण उसमें अनुकूलन (Adaptation) तथा अवबोधन (Perception) की क्षमता भी विकसित होती है। यह नम्यता वास्तव में व्यवहार के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक निर्धारकों के प्रभावों का ही परिणाम होता है। ऐसे निर्धारकों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने में तकनीकों तथा प्रौद्योगिकियों का विशेष महत्व है। उदाहरण के लिए जब किसी नई तकनीक को निचले स्तर पर लाकर परंपरागत तकनीकों के साथ जोड़ा जाता है तब नई प्रवृत्तियों का विकास होता है, जो नम्यता के साथ-साथ समूहों को उत्तरदायी भी बनाता है। इसके अतिरिक्त इसका प्रभाव नृवैज्ञानिक कारकों पर भी पड़ता है, जिससे व्यक्तियों में तकनीकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है जो अन्तत: उन सफलता में सहायक है। एक बार ऐसे वातावरण के निर्माण के बाद विकास की नई संभावनाएं पनपती हैं। इसी कारण विश्व भर में सभी सरकारें ऐसे वातावरण के निर्माण के लिए पूरी तरह कटिबद्ध हैं तथा हर संभव प्रयास कर रही हैं। इन सरकारी प्रयासों से न केवल ऐसे वातावरण का निर्माण होगा बल्कि विकास की निरंतरता भी बनायी जा सकेगी।
  • व्यावहारिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से हम अपने आस-पास के अजैविक कारकों को भी अच्छी तरह समझ सकते है। वास्तव में यह प्रौद्योगिकी मनुष्य को प्रकृति के नियमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। इससे एक ओर तो प्रकृति की संरक्षा की जा सकती है तथा दूसरी ओर भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित भी रखा जा सकता हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा सतत्‌ विकास (Science & Technology and Sustainable Development)

पर्यावरणीय विकास, हरित विकास और सतत्‌ विकास जैसी संकल्पनाएंँ प्राकृतिक संसाधन की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन गई है। लेकिन इन सभी का यदि तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो निश्चित रूप से सतत्‌ विकास की संकल्पना में पर्यावरणीय विकास शामिल हो जाता है। दूसरी ओर, सतत्‌ विकास, हरित विकास से इस रूप में भिन्न है कि जहांँ हरित विकास आर्थिक और सांस्कृतिक सततता पर पर्यावरणीय सततता को वरीयता देता है वहीं सतत्‌ विकास में आर्थिक, सामाजिक, संस्थागत तथा पर्यावरणीय सभी प्रकार के विकास शामिल होते हैं। दूसरे शब्दों में, सतत्‌ विकास की अवधारण में विकास के इन सभी कारकों के बीच अंतनिर्भरता स्थापित करने के प्रयास किये जाते हैं। वास्तव में सतत्‌ विकास की संकल्पना का विकास तब हुआ था, जब पृथ्वी का पर्यावरणीय सीमाओं के अंदर सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर कार्य करने की आवश्यकता महसूस की गई। ऐसी स्थिति में यह देखा गया कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों का यदि संरक्षण नहीं किया गया तो विकास अवरूद्ध हो जाएगा। 1980 के दशक के पूर्वार्द्ध में उभरी यह संकल्पना हांलाकि समाज और पर्यावरण के बीच अंतनिर्भरता पर केन्द्रित रही है लेकिन धीरे-धीरे इसमें कई अन्य पक्ष भी शामिल कर लिए गए हैं। वर्ष 1987 में विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (World Commission on Environment and Development) की ब्रंडटलैंड (Brundtland) रिपोर्ट में सतत्‌ विकास शब्दावली का प्रयोग किया गया। आयोग का विचार था कि बेहतर जीवन शैली के लिए यह आवश्यक है कि वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भविष्य के लिए भी संसाधनों का संरक्षण किया जाए। इसके बाद 1992 के पहले पृथ्वी सम्मेलन, जिसका आयोजन रियो डि जेनेरों में किया गया था, में अनुमोदित एजेंडा 21 (Agenda 21) में पुन: इस संकल्पना के विकास के लिए तेजी से प्रयास करने पर जोर दिया गया। इस सम्मेलन में यह कहा गया कि आरंभिक चरणों में मानव विकास सतत्‌ नहीं था, जिसका मुख्य कारण यह था कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में आर्थिक, पर्यावरणीय तथा सामाजिक कारकों पर एकीकृत बल नहीं दिया गया था। इस कारण कई बड़ी पर्यावरणीय समस्याएँं जैसे प्रदूषण, मरूस्थलीकरण, जलवायु परिवर्तन, वन्य जीवन के विलुप्त होन की आशंका तथा राष्ट्रों के बीच विषमताएँं उत्पन्न हो गई।

सतत्‌ विकास का त्रिकोणीय दृष्टिकोण (Triangular Approach to Sustainable Development)

  • हांलाकि सतत्‌ विकास को देखने के कई दृष्टिकोण विकसित किए गए हैं लेकिन समान्यत: इसमें शामिल तीन आयामों आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है।
  • आर्थिक कारकों का उद्देश्य निश्चित रूप से मानव कल्याण का है, जो उत्पादों और सेवाओं के उपभोग की दर में वृद्धि कर सुनिश्चित किया जाता है। दूसरी ओर, पर्यावरणीय कारकों दव्ारा पारितंत्रों की कार्यकुशलता तथा लचीलेपन की रक्षा की जाती है। जहाँं तक सामाजिक कारकों का प्रश्न है, इनमें मानवीय संबंधों को प्रभावत करने वाले कारक शामिल किए जाते हैं।
  • हाल के वर्षों में जब ऊर्जा की पहचान सबसे महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में की गई है तब से सतत्‌ विकास की अवधारणा और भी संपष्ट हो गई है। इसका कारण यह है कि ऊर्जा, आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक आयामों को सकरात्मक रूप से प्रभावित कर सतत्‌ विकास को सही दिशा तथा गति देने में सक्षम है। निश्चित रूप से यह कहना तर्कसंगत होगा कि सतत्‌ विकास एक बहुआयामी अवधारणा है।

आर्थिक पक्ष (Economic Aspects)

  • जैसा कि हम जानते हैं कि आर्थिक प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण मापक मानव कल्याण है। इसके लिए आय में वृद्धि का होना अनिवार्य होता है क्योंकि तभी उत्पादों और सेवाओं के उपभोग की दर में वृद्धि होती है। अत: अधिकांशत: आर्थिक नीतियों का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य आय में वृद्धि करना होता है। इसके अतिरिक्त, कीमत स्थिरीकरण तथा रोजगार के अवसरों का सृजन भी आर्थिक कारकों में शामिल होते हैं।
  • जहाँ तक आर्थिक सततता का प्रश्न है, यहांँ यह उल्लेख करना न्यायसंगत होगा कि आर्थिक कार्यकुशलता न केवल उत्पादन के लिए आवश्यक संसाधनों के आवंटन में महत्वपूर्ण योगदान देती है, बल्कि उपभोग के स्तर में वृद्धि की उपयोगिता को भी बढ़ाती है। लेकिन आर्थिक कार्यकुशलता सुनिश्चित करने के मार्ग में सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम आर्थिक संसाधनों का तो मूल्य निर्धारण कर सकते हैं लेकिन पर्यावरणीय तथा सामाजिक संसाधनों के मूल्यों का निर्धारण करना संभव नहीं होता है। ऐसी स्थिति में संसाधनों के बीच सामंजस्य स्थापित कर पाना भी आसान नहीं होता। ऐसा सामंजस्य तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब आर्थिक प्रतिस्पर्धा उच्च स्तरीय होती है यही कारण है कि आज के आर्थिक रूप से उदारीकृत विश्व में जहाँ बाजारी शक्तियों का प्रभाव अत्यधिक है, आर्थिक सततता के पक्ष सबसे महत्वपूर्ण हो गया है। प्रतिस्पर्धा के दौरान कई बार राष्ट्रों दव्ारा ऐसी नीतियांँ बनाई जाती हैं जो अर्थव्यवस्था में असंतुलन उत्पन्न कर देती हैंं। इसके फलस्वरूप संसाधनों के आवंटन में समस्याओं के उत्पन्न हो जाने की आशंका होती हैं अत: यह आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था में उपयोग में आने वाले संसाधनों का स्टॉक भी बना रहे तथा उनका समुचित अनुप्रयोग भी किया जाए।
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