Science and Technology: Environmental Aspects and Social Aspects

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आर्थिक पक्ष (Economic Aspects)

पर्यावरणीय पक्ष (Environmental Aspects)

  • पर्यावरणीय सततता वस्तुत: पर्यावरण की वह योग्यता अथवा क्षमता है, जिसके आधार पर सभी पर्यावरणीय कारक निरंतर कार्यकुशल बने रहते हैं। दूसरे शब्दों में, सतत्‌ विकास का पर्यावरणीय दृष्टिकोण यह बताता है कि किस प्रकार परितंत्र की व्यवहार्यता (Viability) बनी रह सकती है। व्यवहार्यता बनाए रखने के लिए ही पारितंत्रों में बाह्‌य आघातों का प्रतिरोध करने की क्षमता पाई जाती है। विकास के साथ-साथ इस क्षमता का संरक्षण ही पर्यावरणीय सततता है।
  • पर्यावरणीय सततता पर तब दुष्प्रभाव पड़ते हैं जब प्राकृतिक पूंजी, जो समस्त प्राकृतिक संसाधनों का कुल योग है, की खपत की दर उसके नवीकरण की दर की तुलना में अधिक हो जाती है। अत: मानवीय गतिविधियाँं इस रूप में होनी चाहिए कि प्राकृतिक पूंजी की खपत और उसके नवीकरण की दर समान हो। हांलाकि इससे बेहतर स्थिति तब होगी जब खपत की यह दर अपेक्षाकृत कम हो। यह कार्य वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास के जरिए किया जा सकता है। और भी व्यापक स्तर पर पर्यावरणीय सततता का अध्ययन करने पर यह कहा जा सकता है कि वह सतत्‌ विकास केवल पारितंत्रों की यथास्थिति बनाए रखने वाली संकल्पना नहीं है। इसके विपरीत, इसमें एक पारिस्थितिकीय तथा सामाजिक-आर्थिक प्रणाली शामिल होनी चाहिए ताकि जैव विविधता का वह स्तर बना रहे जो पारितंत्रों की कार्यकुशलता सुनिश्चित करे। ऐसा इसलिए कि इसी कार्यकुशलता पर मानवीय उपभोग तथा उत्पादन दोनों ही निर्भर करते हैं।
  • पर्यावरणीय सततता का एक पक्ष पारितंत्र में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा भी है। हम यह भी जानते हैं कि पारितंत्र ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम से संचालित होता है। साथ ही, ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है। इस ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य का प्रकाश है। अत: सततता बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य है कि ऊर्जा की जो मात्रा पारितंत्र को प्राप्त होता है वह अन्य रूपों में पर्यावरण को वापस कर दी जाए। इसी प्रकार, कई भू-रासायनिक पदार्थों जैसे कार्बन, नाइट्रोजन, जल आदि भी चक्रीय चरणों के बाद संतुलित मात्रा में पर्यावरण में विद्यमान रहें। अत: यह स्पष्ट है कि सतत्‌ विकास तभी संभव हो सकता है जब पारिस्थितिकीय प्रणाली तथा सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों के बीच संतुलन बना रहे।

सामाजिक पक्ष (Social Aspects)

  • सतत्‌ सामाजिक विकास और सामाजिक पूंजी का बेहतर अनुप्रयोग एक दूसरे के पूरक हैं। पर्यावरणीय और आर्थिक पूंजी के विपरीत, सामाजिक पूंजी उपयोग से बढ़ती है। वास्तव में सतत्‌ विकास के सामाजिक दृष्टिकोण में उन सभी प्रक्रियाओं को शामिल किया जाता है जो समता और वितरण न्याय सुनिश्चित करने में सहायक होती हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं के संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक प्रणालियों को सुदृढ़ बनाया जाए। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर सामाजिक और सांस्कृतिक पूंजी का संरक्षण, विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के बीच अंतनिर्भरता का विकास तथा विद्यमान संघर्षों को दूर किया जाए।
  • जहाँ तक समता का प्रश्न है, यह एक जनोन्मुखी संकल्पना है जिसका सबसे महत्वपूर्ण आधार सामाजिक है, लेकिन सतत्‌ विकास के संदर्भ में इसका प्रत्यक्ष संबंध आर्थिक एवं पर्यावरणीय कारकों के साथ भी स्थापित होता है। समता के माध्यम से ही नीति निर्धारण में सहभागिता भी सुनिश्चित की जा सकती है। इस संदर्भ में यह कहना समुचित होगा कि समता लाने के लिए निचले स्तर तक विकेन्द्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत कारगर हो सकती है।
  • अब अगर न्याय की बात की जाए तो सबसे महत्वपूर्ण वितरण न्याय है। इसका अर्थ यह है कि संसाधनों के आवंटन, उनके अनुप्रयोग तथा उनके संरक्षण में समतामूलक दृष्टिकोण का प्रयोग किया जाए।
  • एक व्यावहारिक चुनौती जो दिखाई देती है, वह है आर्थिक कार्यकुशलता और समता के बीच संतुलन की स्थापना। वस्तुत: आर्थिक कार्यकुशलता की माप सीमित संसाधनों के अधिकतम उपयोग के आधार पर की जाती है ताकि आय के स्तर में वृद्धि हो। लेकिन आय में इस तरीके से की गई वृद्धि विषमताओं को जन्म देती है। अत: आवश्यक है कि कार्यकुशलता तथा समता की अंत: क्रियाओं को संतुलित किया जाए।

सतत्‌ विकास का चतुष्कोणीय दृष्टिकोण (Quadrangle Approach to Sustainable Development)

  • यह विदित है कि सतत्‌ विकास पर्यावरण और विकासोन्मुखी नीतियों के समेकन की प्रक्रिया है। इसी कारण अलग-अलग दृष्टिकोणों से इसकी व्याख्या की जाती है। बर्टेलमस (Bartelmus) दव्ारा विकसित चतुष्कोणीय दृष्टिकोण में आर्थिक, पर्यावरणीय तथा सामाजिक पक्षों के साथ-साथ सतत्‌ विकास के संस्थागत पक्षों को भी शामिल किया गया है।
  • सतत्‌ विकास का मूल आधार पर्यावरण-अर्थव्यवस्था अंत: क्रिया है। ऐसी अंत: क्रिया पर्यावरणीय तथा सामाजिक-आर्थिक नीतियों के बीच सामंजस्य चाहती है। पर्यावरणीय अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों को मौद्रिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। पर्यावरण से संबंधित बाह्य कारकों जैसे प्रदूषण दूर करने के उपायों, प्राकृतिक परिसंपतियों आदि के मौद्रिक मूल्य का निर्धारण कर लोगों को भुगतान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि समष्टि आर्थिक नीतियां इस प्रकार बनाई जानी चाहिए कि उनका समायोजन पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से हो। तकनीकी रूप से यह कहा जा सकता है कि मात्रात्मक आर्थिक विकास के बदले गुणात्मक आर्थिक विकास की ओर उन्मुख नीतियां बननी चाहिए।
  • चतुष्कोणीय दृष्टिकोण के तहत आर्थिक सततता का अर्थ यह है कि उत्पादित और प्राकृतिक पूंजी का दीर्घकालिक संरक्षण करते हुए आय में वृद्धि के प्रयास किए जाने चाहिए।
  • दूसरी ओर, पारिस्थतिकीय सततता यह दर्शाती है कि किसी भी प्रकार प्राकृतिक संसाधन संरक्षित होने चाहिए। अब यदि दोनों ही प्रकार की सततता की तुलना की जाए तो यह स्पष्ट होगा कि जहांँ आर्थिक सततता यह मानती है कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों से आर्थिक विकास करना हमारी बाध्यता है, वहीं पारिस्थितिकीय सततता इस बात की द्योतक है कि प्राकृतिक संसाधन जीवन समर्थन प्रणालियों के रूप में कार्य करते हैं।
Quadrangle Approach to Sustainable Development
  • समाजिक सततता के अंतर्गत समता और न्याय के साथ-साथ उन सभी नीतियों को रखा जा सकता है जो गरीबी निवारण के लिए उत्तरदायी होती है। इन सभी प्रकार की नीतियों का प्रभावी रूप से कार्यान्वयन तभी संभव हो सकता है जब संस्थागत रूप से प्रणाली को सुदृढ़ बनाया जाए। संस्थागत समर्थन देने के लिए प्रशासन के विकेन्द्रीकरण के अलावा विभिन्न विधिक प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • इन दोनों ही प्रकार के दृष्टिकोणों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सतत्‌ विकास के दो सुदृढ़ आधार स्तंभ हैं। कार्यकुशलता (Efficiency) तथा समता (Equity) । यह कार्यकुशलता संसाधनों की गत्यात्मकता की है जबकि समता का अर्थ अंतरपीढ़ी समता से है।
  • स्साांधनों की गत्यात्मक कार्यकुशलता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब उनका विवेकपूर्ण अनुप्रयोग हो। यहीं पर संसाधनों को प्रभावी और निष्पादनकारी बनाने में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  • तकनीकी रूप से संसाधन वह है जिसमें किसी प्रकार की ऊर्जा संचित हो। पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले कुप्रभावों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि तकनीकों के माध्यम से ऐसे कुप्रभाव कम किए जा सकते है। वास्तव में ये कुप्रभाव या पदार्थों के जैव भौगोलिक चक्रों की अपूर्णता अथवा किसी पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह में मात्रात्मक कमी के प्रतिफल होते हैं। इन दोनों ही परिस्थितियों में वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पारितंत्र को संरक्षित कर विभिन्न विलुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा के लिए “इन-सीटू” अथवा “एक्स-सीटू” संरक्षण पद्धतियांँ प्रयोग में लाई जा सकती हैं।

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