Science and Technology: Fast Breeder Reactor and Nuclear Waste Management

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द्रुत प्रजनक रिएक्टर (Fast Breeder Reactor)

नाम के अनुरूप इस प्रकार के रिएक्टर ईंधन का प्रजनन करते है। तात्विक रूप से ईंधन, शीतलक और नियंत्रण अथवा अवशोषक छड़े शामिल होती हैं। श्रृंखलाबद्ध अभिक्रिया रिएक्टर के अभयंतर (Core) में होती है जहां ईंधन में 12 से 30 प्रतिशत तक विखंडय सामग्री (Fissile Material) मिलाई जाती है। ऐेसे रिएक्टरों में कैडमियम अथवा ग्रेफाइट की छड़ों का प्रयोग किया जाता है जो अतिरिक्त न्यूट्रॉनों का अवशोषण करते हैं। अभिक्रिया के समय इन छड़ों को हटा लिया जाता है ताकि न्यूट्रॉनों का अवशोषण होता रहे और अभिक्रिया भी चलती रहे।

ऐसे रिएक्टरों से कई प्रकार के लाभ हैं। इनमें निम्नांकित उल्लेखनीय हैं:

  • द्रुत प्रजनक रिएक्टर में अन्य प्रकार के रिएक्टरों की तुलना में अधिक ऊर्जा मुक्त होती है।
  • इसमें प्रयुक्त ईंधन में एक उर्वरक सामग्री होती है, जो अभिक्रिया के दौरान उत्पन्न होती है। एक बार विखंडित कर उपभोग होने के उपरांत उत्पन्न होने वाले ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है।

कामिनी (KAMINI: Kalpakkam MINI Reactor)

  • भारत में कामिनी एक आदि प्रारूप द्रुत प्रजनक रिएक्टर (Prototype Fast Breeder Reactor) है, जिसका निर्माण तमिलनाडु के कलापाक्कम में किया गया है। कामिनी में प्लूटोनियम-239 तथा यूरेनियम कार्बाइड ईंधन के अनोखे सम्मिश्रिण का प्रयोग होता है। इसका प्रयोग विश्व में पहली बार किया गया है। कामिनी फ्रांस के रैप्सडी (Rhapsody) नामक रिएक्टर के डिजाइन पर निर्मित है। इस रिएक्टर में द्रवीभूत सोडियम का प्रयोग शीतलक के रूप में तथा कैडमियम छड़़ों का न्यूट्रॉन अवशोषक के रूप में किया जाता है। चूँकि द्रुत प्रजनक रिएक्टरों में तीव्र गति वाले न्यूट्रॉनो की आवश्यकता होती है अत: इनमें मंदक का प्रयोग नहीं होता।
  • कामिनी को शून्य -शक्ति रिएक्टर (Zero Power Reactor) भी कहते हैं क्योंकि इसे प्राप्त होने वाली 40 मेगावाट ऊर्जा की खपत अनुसंधान कार्यों में हो जाती है तथा व्यावसायिक ऊर्जा का उत्पादन नहीं होता।

परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन (Nuclear Waste Management)

खनन से ऊर्जा उत्पादन तक के चरणों में परमाणु अपशिष्टों का निर्माण होता है। यह एक सिद्ध तथ्य है कि सभी परमाणु अपशिष्टों की रेडियोधर्मिता समय के साथ-साथ घटती जाती है। लोगों और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए उनका सुरक्षित समापन और प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यद्यपि अपशिष्ट में सभी रेडियो नाभिक का जीवनकाल आधा होता है, जिसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक रेडियो नाभिक की रेडियोधर्मिता आधी होने में कुछ समय लगता है। जैसा कि ऊपर कहा गया है इस प्रकार के अपशिष्टों के समापन का आधारभूत लक्ष्य लोगों और पर्यावरण का बचाव करना है। अत: यह आवश्यक है कि रेडियोनाभिकों को अपशिष्टों से अलग कर किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर उनका निस्तारण किया जाए। रेडियोधर्मी अपशिष्टों के तीन प्रकार हैं:-

  • निम्न स्तरीय अपशिष्ट (Low Level Waste) : कागज, चिथड़े, औजार आदि जो औद्योगिक संस्थापनों, अस्पतालों और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से मुक्त होते हैं, अधिक रेडियोधर्मी नहीं होते। अत: उनके परिरक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती। ऐसे अपशिष्टों को निम्न स्तरीय अपशिष्ट कहते हैं।
  • मध्यम स्तरीय अपशिष्ट (Medium Level Waste) : ये ईंधन के पुनर्चक्रण के बाद उत्पन्न होते हैं तथा अधिकांशत: इनमें रेजीन और रासायनिक कचरा शामिल होता है। अत्यधिक रेडियोधर्मिता के कारण इन अपशिष्टों के परिरक्षण अथवा ठोस व्यवस्था में निस्तारण अनिवार्य है।
  • उच्चस्तरीय अपशिष्ट (High Level Waste) : परमाणु रिएक्टरों के उत्पादन का अभ्यंतर उच्च स्तरीय अपशिष्टों का उत्पादन करता है, जिसमें लगभग 95 प्रतिशत तक रेडियोधर्मिता होती हैं। इस कारण इनका निस्तारण अनिवार्य है।

उच्च स्तरीय अपशिष्टों का प्रबंधन और ईंधन पुर्नप्रसंस्करण (Management of High Level Waste & Fuel Reprocessing)

ज्वलित ईंधन में उच्च स्तरीय अपशिष्टों की प्रचुरता होती है, जो पुर्नप्रसंस्करण के अभाव में मानव और पर्यावरण पर व्यापक प्रभाव डालते हैं। वस्तुत: ज्वलित ईंधन में कुछ अंश यूरेनिम-235 तथा प्लूटोनियम के शेष रह जाते है। ईंधन पुर्नप्रसंस्करण के लिए भारत को बंद ईंधन चक्र (Closed Fuel Cycle) की अवधारणा का अनुसरण करना चाहिए। सर्वप्रथम भारत में ट्रॉम्बे में गर्म कोशिकीय तकनीक (Hot Cell Technique) पर आधारित पुर्नप्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किया गया था। दूसरी ओर, कलापाक्कम स्थित पुर्नप्रसंस्करण संयंत्र में भारत थोरियम छड़ों की सहायता से यू-235 को अलग करने में सफल हो गया है। जैसा कि ऊपर वर्णित है, निम्न स्तरीय तथा मध्यम स्तरीय अपशिष्ट का विषय गंभीर नहीं है क्योंकि उनका समापन पर्यावरण मित्र ढंग से किया जाना संभव है। परन्तु पूरा यूरेनियम तथा विखंडय सामग्री में उच्च स्तरीय अपशिष्ट की श्रेणी को कांचित करना अनिवार्य है। कांचन (Vitrification) एक प्रक्रिया है जिसमें अपशिष्ट को बोरोसिलिकेट के सांचे में गतिहीन कर लगभग 1.3 मीटर ऊँचे लोहे के घन में रखकर समापन के लिए मैदान में गहरे गड्‌ढे में डाल दिया जाता है। ईंधन के पुर्नप्रसंस्करण के दौरान प्लूटोनियम, जो यद्यपि प्रयुक्त ईंधन का लगभग 1 प्रतिशत होता है, मिश्रित ऑक्साइड से उसे पुन: प्रसंस्कृत किया जाता है। मिश्रित ऑक्साइड ईंधन असेम्बली तथा निर्माण संयंत्र तारापुर में स्थापित किया गया है। इस प्रौद्योगिकी के आधार पर दो अपशिष्ट निश्चलन संयंत्र ट्रांबे और तारापुर में काम कर रहे हैं। सीमेंट मैट्रिक्स ने अपशिष्ट को दबा देने की एक सुविधा कलपक्कम में प्रारंभ की गई है। बार्क जूल मेल्टर प्रौद्योगिकी के आधार पर तारापुर में उच्च-स्तरीय अपशिष्ट को निरस्त करने के लिए एक आधुनिक (उन्नत) वीट्रिफिकेशन प्रणाली का निर्माण कर रहा है। भारत विश्व के उन 6 देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने जूल हीटेड सिरैमिक मिक्सर बना लिया है और उच्च स्तरीय अपशिष्ट के वीट्रिफिकेशन के लिए ऐसे संयंत्र लगाए है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की अपशिष्ट प्रबंधन समिति के अनुसार, परमाणु ऊर्जा ने देश को परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन संबंधी निम्नलिखित पहलूओं पर बल देने का सुझाव दिया है:

  • उच्च स्तरीय रेडियोधर्मी अपशिष्ट पदार्थ के दीर्घकालीन प्रबंधन की रणनीति का निर्धारण।
  • जैवमंडल को जोखिम से बचाने के लिए अपशिष्टों के भूवैज्ञानिक निस्तारण को प्राथमिकता।
  • नीतिपूरक तथा पर्यावरणीय मामलों पर बल।
  • निस्तारित अपशिष्टों पर पूर्ण और पर्याप्त निगरानी।

भारत के अनुसंधान रिएक्टर (Indian Research Reactors)

  • अप्सरा (Apsara) : स्वीमिंग पूल के आकार का अप्सरा नामक रिएक्टर वर्ष 1956 में स्थापित किया गया था। इस रिएक्टर ने 4 अगस्त, 1957 से कार्य करना आरंभ किया है। इसमें यूरेनियम-अल्युमिनिम मिश्रधातु से निर्मित वक्र प्लेटों का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। ईधन का कुल भार 3 किलोग्राम तथा रिएक्टर की ऊर्जा उत्पादन की अधिकतम क्षमता 1 मेगावाट है। इस रिएक्टर में सामान्य जल का प्रयोग मंदक और शीतलक के रूप में किया जाता है, जबकि कैडमियम का प्रयोग नियंत्रक छड़ों के रूप में होता हैं। अप्सरा के मुख्य उद्देश्यों में परिरक्षण परीक्षण, आधारभूत अनुसंधान तथा समस्थानिकों का उत्पादन सम्मिलित है।
  • सायरस (CIRUS = Canada-India Reactor Utility Service) : टैंक के प्रकार का यह रिएक्टर कनाडा के सहयोग से निर्मित है। 10 जुलाई, 1960 से इसने कार्य करना आंरभ किया है। इसमें ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम, मंदक के रूप में भारी जल तथा शीतलक के रूप में सामान्य जल प्रयुक्त होता है। नियंत्रक छड़ों के रूप में बोरोन-कैडमियम का प्रयोग किया जाता हैं। इसने यूरेनियम-233 और प्लूटोनियम-239 का उत्पादन करने में सफलता प्राप्त की है, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इसकी उत्पादन क्षमता 40 मेगावाट है। 31 दिसंबर, 2010 से इसे बंद कर दिया गया है।
  • जरलीना (ZERLINA) : जीरो एनर्जी लैटिस इन्वेस्टिगेटिंग असेम्बली नामक यह रिएक्टर 14 जनवरी, 1961 से कार्य कर रहा है। संजाल अध्ययन (Lattice Studies) के उद्देश्य से रिएक्टर में प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन के रूप में तथा भारी जल मंदक और शीतलक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त, कैडमियक का प्रयोग नियंत्रक छड़ों के रूप में किया जाता है। इसकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता केवल 100 वाट है।
  • ध्रुव (Dhruva) : टैंक के प्रकार का यह रिएक्टर 8 अगस्त, 1985 से कार्य कर रहा है। इसकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता 100 मेगावाट है। इसमें प्राकृतिक यूरेनियम का प्रयोग ईंधन के रूप में, भारी जल का मंदक और शीतलक तथा कैडमियम का नियंत्रक छड़ों के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके निर्माण का उद्देश्य आधारभूत अनुसंधान, समस्थानिकों का उत्पादन, प्रशिक्षण तथा रिएक्टर तकनीक का विकास है।
  • पूर्णिमा-1 (Purnima-1) : यह भी टैंक के प्रकार का ही एक रिएक्टर है जो 18 मई, 1972 से कार्य कर रहा है। इसमें प्लूटोनियम का ईंधन के रूप में और वायु का शीतलक के रूप में प्रयोग किया जाता है। केवल 1 वाट के ऊर्जा उत्पादन के साथ यह रिएक्टर मंदक का प्रयोग नहीं करता है। लेकिन नियंत्रक छड़ के रूप में मॉलिब्डेनम का प्रयोग करता है। इसका एकमात्र लक्ष्य-U-233 रिएक्टरों की भौतिकी का अध्ययन है।
  • पूर्णिमा-2 (Purnima-II) : यह भी टैंक के प्रकार का ही रिएक्टर है जिसने 10 मई, 1974 से कार्य करना आरंभ किया है। इसकी उत्पादन क्षमता 10 मेगावाट है तथा इसमें ईंधन के रूप में यू-233 और मंदक तथा शीतलक के रूप में सामान्य जल का प्रयोग किया जाता है। कैडमियम की छड़ों का प्रयोग यह नियंत्रक छड़ों के रूप में करता है।
  • पूर्णिमा-3 (Purnima-III) : टैंक के प्रकार वाले इस रिएक्टर की उत्पादन क्षमता एक वाट है। इसने 9 नवंबर, 1990 से कार्य आरंभ किया है। इसका ईंधन यूरेनियम-237 और अल्युमिनियम है। सामान्य जल का प्रयोग मंदक और शीलतक के रूप में तथा कैडमियम छड़ों का प्रयोग नियंत्रक छड़ों के रूप में किया जाता है।

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