Science and Technology: Health: Physical and Mental Health

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स्वास्थ्य (Health)

  • स्वास्थ्य मूल रूप से जीवित व्यक्तियों की कार्यात्मक एवं उपापचयी क्षमता दर्शाता है। यह व्यक्ति के शरीर और मन की एक सामान्य दशा है जो बीमारी, चोट और दर्द से रहित होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1946 में स्वास्थ्य की विस्तृत परिभाषा दी। इस परिभाषा के अनुसार स्वास्थ्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुख की वह दिशा है जो रोग या रुग्णता से मुक्त रहे। इस परिभाषा के अनुसार, किसी व्यक्ति का स्वस्थ होना केवल उसके शारीरिक स्वस्थता पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि उसके मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहने पर भी निर्भर करता है।
  • स्वास्थ्य की यह व्यापकता प्रचलित धारणा ‘स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है’ को पुष्ट करती है। इस प्रकार व्यापक अर्थ में स्वास्थ्य से आशय शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य से है।

स्वास्थ्य के दो अवयव हैं:

  • दैहिक स्वास्थ्य (Physical Health)
  • मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)

Explanation:

  • दैहिक स्वास्थ्य (Physical Health) :- दैहिक स्वास्थ्य से तात्पर्य स्वस्थ शरीर से होता है। यह शारीरिक अभ्यास, अच्छे आहार और पर्याप्त आराम करने से विकसित होता है। शारीरिक स्वास्थ्य व्यक्ति दव्ारा सभी कार्य करने का आधार है। शारीरिक स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए उचित पोषण, शारीरिक वजन नियंत्रण, मादक द्रव आदि व्यवसन से दूर रहना तथा पर्याप्त नींद लेना आदि कारक महत्वपूर्ण होते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) :- मानसिक स्वास्थ्य मानसिक और संवेगात्मक रूप से स्वस्थ रहने की दशा है। अच्छे मानसिक स्वास्थ्य वाले व्यक्ति में मानसिक बीमारियाँ नहीं होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ‘मानसिक स्वास्थ्य’ वैयक्तिक रूप से सुख की ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं को अनुभव करता है। वह अपने दैनिक जीवन के तनावों का सामना करने की क्षमता रखता है।

यहाँ पर महत्वपूर्ण है कि मानसिक बीमारियों से मुक्ति मात्र ही अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का सूचक नहीं होता बल्कि यह व्यक्ति दव्ारा प्रसन्नतापूर्वक जीवन जीने, जीवन की प्रतिकूल स्थिति से निकलने, अपनी उपलब्धि, प्ररेणा को उन्नत करने, परिस्थितियों के साथ समायोजन करने की क्षमता का भी सूचक होता है।

  • समग्र रूप से किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य उसके शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक जीवन क्षमता की सामान्य स्थिति है। अच्छे स्वास्थ्य की स्थिति में हम व्यक्ति के रूप में समाज तथा राष्ट्र के रूप में अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम उपयोग कर सकते है।
  • परन्तु विभिन्न आंतरिक बाह्‌य कारणों का प्रभाव भी हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। शारीरिक -मानसिक विकृतियाँ जन्म लेती हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या, घनी आबादी क्षेत्रों में रहन-सहन व्यवस्था, पर्यावरणीय समस्याओं व प्रदूषण के कारण स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक वातावरण बनाए रखना एक गंभीर समस्या है।
  • इन समस्याओं का हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न प्रयास किए जाते हैं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुई तकनीकी प्रगति एवं विकास कार्यो को समझने से पहले स्वास्थ्य के कुछ मूलभूत अवयवों की समझ इस पूरे विषय को समझने में सहायक होगी।

  • पोषण (Nutrition) : भोजन के रूप में आवश्यक अवयवों की पूर्ति प्रक्रिया को पोषण की संज्ञा दी जाती है। इन आवश्यक अवयवों में विटामिन, वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, रेशे, खनिज, जल आदि को सम्मिलित किया जाता है।
  • कुपोषण (Malnutrition) : जीव में पोषक पदार्थों का अपर्याप्त, अत्यधिक या असंतुलित उपभोग की स्थिति कुपोषण कहलाती है। पोषक पदार्थों की न्यूनता या अधिकता के कारण विभिन्न प्रकार के रोग होते हैं।
  • विटामिन (Vitamin) : मानव शरीर में विटामिन की आपूर्ति भोजन के माध्यम से होती है। छह प्रकार के विटामिनों की खोज अभी तक वैज्ञानिकों ने की है, ये हैं- विटामिन A, B, C, D, E तथा विटामिन K । इन विटामिनों में से विटामिन B कई विटामिनों का समूह होता है, जिस कारण इसे विटामिन B Complex कहते हैं। विटामिन C और B जल में घुलनशील हैं, जबकि विटामिन A, D तथा E और K वसा में घुलनशील होते हैं।
  • प्रोटीन (Protein) : प्रोटीन शरीर निर्माण के लिए एक अत्यावश्यक तत्व है। भोजन में वसा कार्बोहाइड्रेट की कमी होने पर ऊर्जा उत्पादन में प्रोटीन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हड्‌िडयों के निर्माण और उनकी मजबूती में प्रोटीन का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
  • वसा (Fat) : शर्करा वर्ग के पदार्थो के कुछ भाग शरीर में वसा के रूप में एकत्रित हो जाते हैं तथा भोजन न प्राप्त होने की स्थिति में शरीर को पोषण प्रदान करते हैं। वसा से शरीर को ऊर्जा एवं ऊष्मा दोनों ही एक साथ प्राप्त होते हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) : मानव शरीर को काबोडहाइड्रेट चावल, गेहूँ, जौ, मक्का विभिन्न तरह के मीठे फल तथा चीनी एवं शकरकंद से प्राप्त होता है। शरीर में काबोडहाइड्रेट का कुछ भाग वसा में परिवर्तित हो जाता है जो आहार प्राप्त न होने की स्थिति में शरीर को भोजन उपलब्ध कराता है।
  • प्रतिरक्षा तंत्र (Immunisation) : मानव शरीर प्रतिदिन असंख्य रोगाणुओं के संपर्क में आता है। इन रोगाणुओं से शरीर की रक्षा करने के लिए मानव का प्रतिरक्षा तंत्र कार्यरत रहता है। मानव का प्रतिरक्षा तंत्र के दो अवयव हैं-
    • सहज प्रतिरक्षा (Innate Immunity) : यह प्रतिरक्षा प्रणाली मानव शरीर को जन्म के साथ स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है, त्वचा, आँखों की पलकें, आँख के आँसू आदि मानव शरीर के सहज प्रतिरक्षा तंत्र का ही हिस्सा हैं।
    • उपर्जित प्रतिरक्षा (Acquired Immunity) : शरीर पर किसी जीवाणु दव्ारा हमले की स्थिति में हमारे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उस जीवाणु या रोगाणु के विरुद्ध प्रतिक्रिया करता है। यह प्रतिक्रिया हमारे शरीर में विद्यमान दो लसिकाणुओं दव्ारा होता है, जिनमें एक बी-लसिकाणु तथा दूसरी टी-लसिकाणु है। जहाँ बी-लसिकाणु जीवाणु या रोगाणु दव्ारा हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप शरीर में तेजी से प्रोटीन उत्पादन प्रारंभ कर देती हैं, वहीं टी-लसिकाणु, बी-लसिकाणु के इस कार्य में सहायक की भूमिका निभाती हैं।
  • विषाणु (Virus) : ये अकोशिकीय अतिसूक्ष्म जीव हैं जो नाभिकीय अम्ल और प्रोटीन से मिलकर गठित होते हैं, ये केवल जीवित कोशिक में ही वंश वद्धि कर सकते हैं। शरीर के बाहर ये मृत समान होते हैं परन्तु शरीर के अंदर जीवित हो सकते हैं। एक विषाणु बिना किसी सजीव माध्यम के जीता है। इन्हें क्रिस्टल के रूप में इकट्‌ठा किया जा सकता है। यह सैकड़ों वर्षों तक सुसप्तावस्था में रह सकते हैं और जब भी किसी जीवित माध्यम या धारक के संपर्क में आते हैं तो उस जीव की कोशिका को भेद कर उसे आच्छादित कर देते हैं और जीव बीमार हो जाता है। एक बार जब विषाणु जीवित कोशिका में प्रवेश कर जाता है, वह कोशिका के मूल आर. एन. ए. एवं डी. एन. ए. की आनुवांशिक संरचना को अपनी आनुवांशिक संरचना से बदल देता है और संक्रमित कोशिका अपने जैसी संक्रमित कोशिकाओं का पुनरुत्पादन शुरू कर देती है।
  • जीवाणु (Bacteria) : यह एककोशिकीय जीव है। इसका आकार कुछ मिलीमीटर तक ही होता है। ये प्रोकैरियोटिक, भित्तियुक्त, एककोशिकीय सरल जीव हैं जो प्राय: सर्वत्र पाये जाते हैं। ये पृथ्वी पर मिट्‌टी में, अम्लीय गर्म जल-धाराओं में, नाभिकीय पदार्थों में, जल में, भू-पर्पटी में, यहां तक कि कार्बनिक पदार्थों में तथा पौधों एवं जन्तुओं के शरीर के भीतर भी पाये जाते हैं।
  • आमेगा-3वसा अम्ल (Omega-3 Fatty Acid) : इसे w-3 वसा अम्ल या n-3 वसा अम्ल भी कहा जाता है। यह वसा अम्ल तीन वसाओं ALAC (पादप तेल में उपलब्ध) , EPA और DHA (सामुद्रिक तेल: Marine Oil में उपलब्ध) का संयुक्त रूप् होता है।
    • जन्तु ओमेगा- 3 वसा अम्ल के स्रोत हैं- मछली के तेल, शैवाल तेल, स्क्विड तेल, क्रिल का तेल। कुछ पादप तेलों जैसे सी वकथोर्न के बीज (Seabyckthon Seeds) और बरी के तेल, फ्लैक्स सीड के तेल (Flaxseed Oil) में ओमेगा-3 ALA वसा अम्ल पाया जाता है।
    • ओमेगा -3- वसा अम्ल भूख बढ़ाने, वजन बढ़ाने में सहयोगी होता है। सामुद्रिक ओमेगा-3 का उपयोग स्तन कैंसर की संभावना को कम करता है।
    • ओमेगा-3 बच्चों में ADHD विकृति (Attention Deficiency Hyperactivity Disorder) और उनके विकास में रुकावट को कम करने तथा इन विकृतियों की चिकित्सा में सहायक होता है। ADHD विकृति में मछली का तेल अधिक उपयोगी होता है।
    • ओमेगा-3 बच्चों की शैक्षणिक और व्यावहारक कुशलता में भी सहयोगी होता है।
    • हालांकि शोध से यह भी जानकारी मिलती है कि यदि प्रति दिन 3 ग्राम से अधिक ओमेगा-3 का सेवा किया जाए तो इसका शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जैसे-रक्तस्राव में बढ़ोत्तरी, मस्तिष्क से रक्त स्राव, मधुमेह पीड़ितों में ग्लाइसेमिक नियंत्रण (Glycemic Control) में कमी आदि।
  • संक्रमण (Infection) : जब रोगाणु हमारे शरीर के उत्तकों को क्षति पहुँचाते हैं तो यह स्थिति संक्रमण कहलाती है। संक्रमण के मुख्य कारक तत्व हैं- विषाणु, प्रॉयन्स (Prions) , जीवाणु, वाइरॉयड्‌स (Viroids) , परजीवी और फंफूदी।
    • संक्रमण को इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है-
    • प्राथमिक संक्रमण, दव्तीयक संक्रमण और गुप्त/अदृश्य संक्रमण।
  • विषाणु संक्रमण (Virus Infection) : यह संक्रमण शरीर के विभिन्न अंगों या विभिन्न शारीरिक तंत्रों में एक ही साथ हो सकता है। इसके उदाहरण हैं- नाक से पानी आना, साइनस, खाँसी, बदन दर्द आदि। कभी-कभी शरीर के किसी निश्चित स्थान पर विषाणु संक्रमण होता है जैसे नेत्र-शोथ (Conjunctivitis) में।
  • जीवाणु संक्रमण (Bacterial Infection) : जीवाणु संक्रमण के सामान्य लक्षण हैं- शरीर कि किसी भाग पर लाल चकते पड़ना, जलन, सूजन और दर्द। जीवाणु संक्रमण का सामान्य उदाहरण है- शरीर के किसी अंग में दर्द होना, जैसे -कान में दर्द, गले के एक भाग में दर्द।
  • स्वास्थ्य के निर्धारक (Determinants of Health) : विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, निम्नलिखित कारक हमारे स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को प्रभावित करते हैं-
    • निवास स्थान
    • आस-पास का वातावरण
    • आनुवांशिक स्थिति
    • आय
    • शिक्षा स्तर
    • मित्रों एवं परिवार के साथ हमारा संबंध
  • हेल्थ ट्रैंगल (Health Triangle) : स्वस्थ रहने और स्वास्थ्य को उन्नत करने के लिए शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य का संयोग महत्वपूर्ण होता है। इसे सम्मिलित रूप में हेल्थ ट्रेंगल कहा जाता है।
  • बीमारी/रोग (Disease) : बीमारी/रोग वह प्रतिकूल स्थिति है जो जीव के शरीर को प्रभावित करता है। बाह्य कारकों (जैसे संक्रमणकारी रोग) या आंतरिक स्तर पर कार्यात्मक कमियों के कारण रोग उत्पन्न होता है।
  • विकृति (Disorder) : चिकित्सा क्षेत्र में, विकृति एक प्रकार्यात्मक अनियमितता है। चिकित्सकीय विकृति निम्न रूपों में श्रेणीबद्ध की जा सकती है-
    • मानसिक विकृति (Mental Disorder) , शारीरिक विकृति (Physical Disorder) , आनुवांशिक विकृति (Genetic Disorder) , भावनात्मक और व्यवहारात्मक विकृति (Emotional and Behavioural Disorder) तथा प्रकार्यात्मक विकृति (Functional Disorder) ।
  • चिकित्सीय स्थिति (Medical Condition) - इसमें सभी रोग एवं विकृतियाँ निहित हैं। सामान्यत: इसमें मानसिक विकृतियों और मानसिक रोगों को सम्मिलित नहीं किया जाता है।
  • रुग्णता (Morbidity) : किसी कारणवश रोगजनक अवस्था, असमर्थता या खराब रुग्णता का द्योतक है। गंभीर रूप से बीमार रोगियों में रुग्णता का स्तर आई. सी. यू. स्कोरिंग प्रणाली (ICU Scoring System) दव्ारा माना जाता है। दो या अधिक चिकित्सीय स्थिति में सहरुग्णता (Co morbidity) देखी जाती है।
  • सिन्ड्रोम (Syndrome) : चिकित्सीय प्रतीकों, लक्षणों और अन्य संबंद्ध विशेषताओं को एक साथ सिन्ड्रोम की संज्ञा दी जाती है। सिन्ड्रोम के उदाहरण हैं- डाउन सिन्ड्रोम और पार्किसन सिन्ड्रोम।

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