Science and Technology: Leprosy and National Leprosy Eradication Programme

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स्वास्थ्य (Health)

विभिन्न बीमारियाँ (Various Diseases)

कुष्ठ (Leprosy)

कुष्ठ माइकोबैक्टेरियम लेप्री और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमाटोसिस नामक जीवाणु से उत्पन्न होने वाला रोग है। इसे हैन्सन रोग भी कहा जाता है। लेप्रोमाटोसिस के प्रभाव से त्वचा पर घाव होने के कारण वहाँ के स्नायु तंतुओं पर भी कुप्रभाव पड़ता है।

संक्रमण के आधार पर दो प्रकार के कुष्ठ रोग की पहचान की गई है-

  • बार्डर लाइन
  • इन्डिटंरमिनेट प्रकार
  • रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु की उद्भवन अवधि (Incubation Period) 1 - 30 वर्ष की होती है। संक्रमण के लिए कोई निश्चित आयु निर्धारित नहीं होती। इस रोग की स्थिति में शरीर के चमड़े गलने लगते हैं, तंत्रिकाएँ नष्ट होने लगती हैं और मांसपेशियाँ कमजोर होने लगती हैं।
  • कुष्ठ पीड़ितों के सर्वाधिक मामले भारत में देखे गए हैं। इसके बाद ब्राजील और म्यांमार का स्थान आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इस रोग के उपचार हेतु बहु औषधि चिकित्सा के अंतर्गत रिफम्पिसीन, डैप्सोन, क्लोफाजाइमीन आदि दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है। यह भारत के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में उपलब्ध कराई जा रही है।
राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (National Leprosy Eradication Programme)
  • इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन वर्ष 1955 से किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में विश्व बैंक दव्ारा भी सहायता प्रदान की जा रही है। कार्यक्रम का क्रियान्वयन राज्य सरकारों, स्वयं सेवी संस्थाओं तथा जिला कुष्ठ पदाधिकारियों के माध्यम से किया जा रहा है।
  • इस कार्यक्रम का प्रमुख घटक मल्टी ड्रग थेरेपी (MDT) है। इस थेरेपी के जरिए इलाज कराने वाले रोगी एक वर्ष के अंदर स्वस्थ होने लगते हैं और कुष्ठ रोगाणुओं का संक्रमण बाधित होता है।
  • देश के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सरकारी अस्पतालों में मल्टी ड्रग थेरेपी सुविधा नि: शुल्क उपलब्ध करायी जा रही है।
  • देश के 32 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों ने कुष्ठ रोग उन्मूलन में सफलता पा ली है। परन्तु अभी भी 3 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों बिहार, छत्तीसगढ़ और दादरा एवं नागर हवेली में इस रोग का उन्मूलन बाकी है।

डेंगू (Dengue)

  • यह एक विषाणु जनित रोग है जो एडिस एजिप्टी नामक मच्छर से संवहित डेंगू विषाणु फ्लेवाई-वायरस के संक्रमण से होता है। इसे ‘ब्रेकबोन ज्वर’ भी कहते हैं। मच्छर के काटने के बाद 3 - 5 दिनों में इस ज्वर के लक्षण दिखते हैं। इसके लक्षण में निहित हैं-अचानक से ठंड लगना, सिरदर्द के साथ तेज ज्वर, मांसपेशी और जोड़ों का दर्द।
  • हाल के वर्षों में तीव्र नगरीकरण, अनियमित जल प्रबंधन, ग्रमाीण -शहरी क्षेत्रों में अनुपयुक्त जल भंडारण आदि के कारण डेंगू मच्छरों के प्रजनन में बढ़ोतरी हुई है। इस कारण इस रोग से निपटने की चुनौती बढ़ी है।
  • भारत में डेंगू नियंत्रण कार्यक्रम को संवर्द्धित मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम में समावेशित किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2009 में डेंगू ज्वर को दो प्रकारों में विभाजित किया-सामान्य और गंभीर।
  • डेंगू की गंभीर अवस्था में अत्यधिक रक्तस्राव होता है, अंग की कार्यक्षमता अत्यधिक दुष्प्रभावित होती है तथा प्लाज्मा का अत्यधिक रिसाव होता है।

इस रोग की रोकथाम के लिए निम्नलिखित कदमों पर ध्यान देना आवश्यक है-

  • रोग एवं इसके वाहक की निगरानी
  • पूर्व जाँच व्यवस्था
  • स्वच्छता को प्राथमिकता

कैंसर (Cancer)

  • कैंसर एक ऐसा रोग है जिसमें शरीर के किसी भाग में स्थित कोशिकाओं में अनियमित वृद्धि होती है। इसमें कोशिकाएँ विभाजित होकर अनियंत्रित रूप से बढ़ती जाती है और ट्‌यूमर बनाती हैं। यह शरीर के निकटवर्ती भाग को नुकसान भी पहुँचाती है।
  • कैंसर कोशिकाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान स्थानांतरित होने की क्षमता रखती हैं। कैंसर की पहचान विभिन्न माध्यमों से की जाती है- इसके लक्षण प्रारंभिक जाँच चिकित्सीय इमेजिंग।
  • विभिन्न तकनीकों जैसे-एक्स रे, अल्ट्रासाउंड, मैमोग्राफी, पापनीकोलु परीक्षण के दव्ारा इस रोग की पहचान की जाती है। कैंसर के कुल चार प्रकार होते हैं-कार्सी नोमास, सार्कोमास, ल्यूकोमियस तथा लिम्फोमास। कैंसर उन सभी अंगों में हो सकता है जिसकी कोशिकाएँ विभाजित होने की क्षमता से युक्त होती हैं।
  • सामान्य तौर पर मस्तिष्क और यकृत में कैंसर नहीं होती है क्योंकि वयस्क व्यक्ति के इन अंगों की कोशिकाओं में विभाजन होना बंद हो जाता है।
भारत में कैंसर चिकित्सा (Cancer Treatment in India)
  • आयुर्वेदिक विधि: गौ-मूत्र चिकित्सा के माध्यम से कैंसर की रोकथाम के प्रयास किये जा रहे हैं। इस चिकित्सा के प्रभाव स्वरूप कैंसर वृद्धि रूकती है। नियमित जाँच से रोग का असर कम होने लगता है। रोगी को असहनीय दर्द से छुटकारा मिलता है।
    • भारत सरकार के ‘आयुष’ विभाग के अंतर्गत सीसीआरएएस (द सेन्ट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक सांइसेज) ने पौधों में कैंसर रोधी शोध किया है। इन औषधीय पौधों को गौ-मूत्र के साथ मिलाकर कैंसर की दवा निर्माण की पहल की गयी है। विदित है कि गौ-मूत्र प्रति जैविक और प्रतिफूफंदी कारकों के सूक्ष्मजीव रोधी प्रभावों को उन्नत करता है।
  • साइबर नाइफ विधि: साइबर नाइफ एक रोबोटिक रेडियोसर्जरी प्रणाली है। इससे कैंसर के विभिन्न प्रकारों की चिकित्सा में लाभ मिल सकता है।
  • रैपिड आर्क लीनियर एक्सेलरेटर: देश के प्रमुख कैंसर चिकित्सा संस्थान टाटा मेमोरियल केन्द्र ने सर्विकल कैंसर की चिकित्सा के लिए एक नया मार्ग अपनाया है। ज्ञात हो कि भारत में विश्व स्तर पर सर्विकल कैंसर का 1/3 मामला पाया जाता है। यह बीमारी ह्यूमन पपीलोमा वायरस (HPV) के संक्रमण से होती है। इसके प्रारंभिक लक्षण नगण्य होते हैं और बाद में इसके गंभीर प्रभाव दिखते हैं।
    • सर्विकल कैंसर की जाँच के लिए भारत में रैपिड आर्क लीनियर एक्सेलरेटर नामक उपकरण का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें रेडियोथेरेपी माध्यम से रोगी का इलाज किया जाता है। इसके तहत वीआईए टेस्ट (VIA) किया जाता है। इसमें 4 प्रतिशत एसीटिक अम्ल के दव्ारा सर्विवक्स (Cervix) का निरीक्षण किया जाता है। यह जाँच सुरक्षित और सस्ता होता है। इस जाँच के जरिए सर्विकल कैंसर की रोकथाम में सहायता मिल सकती है।

राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम - इस कार्यक्रम का आरंभ 1975 - 76 में किया गया। इसके लक्ष्य और उद्देश्य हैं-

  • तंबाकू सेवन हानि के बारे में स्वास्थ्य शिक्षा और गर्भाशय कैंसर की रोकथाम के लिए कार्य।
  • मौजूदा कैंसर के इलाज की सुविधा को सुदृढ़ करना।
  • स्क्रीनिंग टेस्ट और स्वयं परीक्षा के तरीकों पर मरीजों की शिक्षा का प्रबंधन करना।

कार्यक्रम के तहत कोबाल्ट इकाई की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता पर बल दिया गया है। कैंसर उपचार सुविधाओं को मजबूत बनाने के लिए टेलीथेरेपी, ब्रैकीथेरेपी उपकरण आदि की खरीद के लिए धर्मार्थ संगठनों को 1 करोड़ रुपये तथा सरकारी संस्थाओं को 1.5 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

  • कैंसर की पहचान के लिए लेजर तकनीक भी प्रभावी रही है। इसके तहत उच्च तीव्रता वाले प्रकाश से ट्‌यूमर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। कुछेक रोगियों में तो लेजर कैंसर कोशिकाओं को पूरी तरह समाप्त कर देता है। कैंसर की परिपक्व अवस्था में यह तकनीक अधिक लाभकरी हो सकती है।
  • कुछ मामलों में ट्‌यूमर पर प्रकाश की चमक के प्रभाव से इसे नष्ट किया जाता है। इसे फोटोडायनेमिक लेज थेरेपी कहा जाता है।

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