Science & Technology: Meaning of Living Transformed Organisms

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अद्यतन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (Latest Development in Science & Technology)

जैव सुरक्षा (Bio Safety)

बड़े पैमाने पर जैविक संसाधनों के क्षरण को रोकने वाली संकल्पना जैव सुरक्षा कहलाती है। यह संकल्पना परिस्थितिकी एवं मानव स्वास्थ्य पर बल देती है। आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से विकसित जीवित रूपांतरित जीवों (Living Modified Organisms - LMOs) से जैव विविधता पर उत्पन्न होने वाले जोखिम से सुरक्षा इसका उद्देश्य है। जैव सुरक्षा पर कार्टाजिना प्रोटोकाल के अनुसार नई तकनीकों से विकसित होने वाले उत्पाद सुरक्षात्मक सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए साथ ही विकासशील राष्ट्रों को अनुमति होनी चाहिए कि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य को आर्थिक लाभ के ऊपर वरीयता दे सकें। यह प्रोटोकॉल 11 सितंबर, 2003 से प्रभावी है।

जीवित रूपांतरित जीवों का अर्थ (Meaning of Living Transformed Organisms)

  • आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से विकसित ऐसे जीव व्यापक स्तर पर आनुवांशिक रूप से रूपांतरित जीवों के लगभग समान होते हैं। दोनों के मध्यम अंतर यह है कि जहाँ जीवित रूपांतरित जीव (LMOs) विकास में सक्षम होते हैं एवं शस्य फसलों से संबंधित होते हैं वहीं आनुवांशिक रूप से रूपांतरित जीव (GMOs) की संकल्पना में जीवित रूपांतरित जीवों के अतिरिक्त मृत जीव भी शामिल होते हैं।
  • आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी इस रूप में परिभाषित है कि इसमें प्रयोगशाला मं नाभिकीय अम्ल तकनीकों का प्रयोग अथवा वर्गीकृत परिवारों के बाहर कोशिकाओं का संल्लयन होता है ताकि प्राकृतिक शरीर क्रिया विज्ञान, प्रजनन अथवा पुनर्संयोजन के अवरोधो को दूर किया जा सके। ऐसे तकनीके का चुनाव तथा प्रजनन की परंपरागत तकनीकों से भिन्न होती हैं।

एल. ई. डी. परियोजना का प्रस्ताव (Proposal of LED Project)

  • हाल ही में तेल एवं प्राकृति गैस निगम ने प्रकाश उत्सर्जित करने वाले डायोड (Light Emitting diode, L. E. D.) की एक परियोजना के आरंभ का प्रस्ताव किया है। एल. ए. डी. प्रकाश का एक अर्द्धचालक स्रोत है जिसका उपयोग कई उपकरणों में संकेतक लैम्पों के रूप में तथा प्रकाश व्यवस्था (मुख्यत: सड़कों के किनारे) में अधिकांशत: किया जाता है। व्यवहारिक इलेक्ट्रानिक अवयवों के रूप में ऐसे डायोड का सर्वप्रथम 1962 में विकास किया गया था। आरंभिक चरणों में ऐसे डायोड निम्न तीव्रता वाले लाल प्रकाश के उत्सर्जन में सक्षम थे। लेकिन वर्तमान में इनके दव्ारा दृश्य प्रकाश, पराबैंगनी तथा अवरक्त जैसे तरंग दैर्ध्य भी उत्सर्जित किए जाते है, जिनकी तीव्रता अपेक्षाकृत अधिक होती है।
  • वैज्ञानिक रूप से जब किसी एल. ई. डी. को स्विच आन (चालू) किया जाता है तब इलेक्ट्रान पुनर्संयोजन के योग्य हो जाते हैं। ऐसा पुनर्संयोजन उपकरणों में उपस्थित छिद्रों में होता है। पुनर्संयोजित होने वाले इलेक्ट्रानों दव्ारा फोटान के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित की जाती है। इस प्रभाव को वैद्युत प्रदीप्ति कहते हैं। इसके तहत प्रकाश का रंग फोटान के रूप में उत्सर्जित ऊर्जा के सापेक्ष तथा अर्द्धचालक के ऊर्जा अंतराल दव्ारा निर्धारित होता है।
  • प्रदीप्ति ऊर्जा स्रोतों की तुलना में एल. ई. डी. से कई लाभ प्राप्त होते हैं जैसे- ऊर्जा की खपत में कमी, दीर्घ जीवन, अधिक मजबूती, छोटा आकार तथा विश्वसनीयता प्रमुख हैं। इस प्रकार एल. ई. डी. के उपयोग से प्रकाश व्यवस्था में प्रयोग की जाने वाली ऊर्जा की मात्रा को घटाकर उसके दसवें भाग तक लाया जा सकता है। वास्तव में एक एल. ई. डी. परंपरागत प्रदीप्ति लैंप की तुलना में प्रति वाट प्रकाश का उत्सर्जन दस गुना अधिक जबकि ऊर्जा कार्य कुशल सी. एफ. एल. से दो गुना प्रकाश अधिक उत्सर्जित करता है।
  • उल्लेखनीय है कि 23 राज्यों में ग्रामीण स्तर पर एल. ई. डी. की प्रदर्शन परियोजना चलाई जा रही है। इसी प्रकार 32 राज्यों/संघ शासित राज्यों में सड़क पर प्रकाश व्यवस्था हेतु ऊर्जा कार्यकुशलता ब्यूरों (BEE) दव्ारा एल. ई. डी. परियोजना चलाई जा रही है।

समुद्री अम्लीकरण (Ocean Acidification)

  • समुद्र के पी. एच. मान में कमी होना समुद्री अम्लीकरण कहलाता है। यह मुख्यत: वायुमंडल दव्ारा कार्बन डाई आक्साइड के अवशोषण से होता है। सन्‌ 1751 से 1994 के मध्य समुद्र तक के पी. एच. मान में लगभग 8.179 से 8.104 की कमी का आकलन किया गया। पी. एच. मान में -0.075 की कमी से समुद्री जल में 18.9 प्रतिशत आयन की सांद्रता बढ़ गई। 21वीं शताब्दी के प्रथम दशक में समुद्र के पी. एच. मान में -0.11 का परिवर्तन आया। इससे वैश्विक स्तर पर समुद्र की अम्लीयता में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • कार्बन चक्र की संकल्पना का समुद्री अम्लीकरण में विशेष महत्व हैं क्योंकि कार्बन चक्र समुद्र, स्थलीय बायोस्फीयर, भूपृष्ठ तथा वायुमंडल के मध्य कार्बन डाई आक्साइड के परिवर्तन का वर्णन करता है। विभिन्न मानवीय गतिविधियों जैसे भूमि उपयोग में परिवर्तन, जीवाश्म ईंधन के दहन तथा सीमेंट के उत्पादन आदि के परिणामस्वरूप वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा और भी बढ़ गई है। इस कार्बन डाई आक्साइड की कुछ मात्रा वायुमंडल में शेष रह जाती हैं, कुछ स्थलीय पौधें के दव्ारा प्रयोग कर ली जाती है तथा कुछ समुद्र दव्ारा अवशोषित कर ली जाती है।
  • कार्बन चक्र दो रूपों में सामने आता हैं-कार्बनिक कार्बन चक्र एवं अकार्बनिक कार्बन चक्र। समुद्री अम्लीकरण में अकार्बनिक कार्बन चक्र का विशेष महत्व है। समुद्री अम्लीकरण के अंतर्गत पृथ्वी के समुद्र में विभिन्न रूपों में घुलित कार्बन डाई आक्साइड शामिल है।
  • जब कार्बन डाई आक्साइड समुद्री जल में घुलती है तो यह जल से क्रिया करके आयनीकृत एवं गैर आयनीकृत पदार्थों के बीच एक संतुलन का निर्माण करती है जैसे घुलित मुक्त हुई आक्साइड, कार्बोनिक अम्ल, बाईकार्बाेेनेट एवं कार्बन आदि का निर्माण। इन पदार्थों का अनुपात समुद्री तल के ताप तथा क्षारीयता जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
  • समुद्री जल में कार्बन डाई आक्साइड के घुलने से समुद्री जल में हाइड्रोजन आयन (H +) की सांद्रता बढ़ने लगती है एवं इस प्रकार समुद्री जल का पी. एच. मान घटने लगता है।

समुद्री अम्लीकरण के संभावित प्रभाव (Potential Effects of Ocean Acidification)

  • यद्यपि समुद्री जल दव्ारा प्राकृतिक CO2 का अवशोषण, मानवीय गतिविधियों दव्ारा उत्सर्जित CO2 से उत्पन्न जलवायु प्रभाव को कम करता है परन्तु ऐसा माना जाता है कि इसके परिणामस्वरूप समुद्री जल के पी. एच. मान में कमी होने से इसका नकारात्मक प्रभाव प्राथमिक रूप से कैल्शियम का निर्माण करने वाले समुद्री जीवों पर पड़ेगा। इसमें समपोषी एवं विषमपोषी के मध्य खाद्य श्रृंखला खतरे से कोशिका को सुरक्षा प्रदान करने के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं।
  • क्योंकि ये जीवाणु स्वयं, विकसित एवं मरम्मत कर सकने में सक्षम होते हैं। अत: अनुसंधानकर्ताओं में यह आशा है कि इलेक्ट्रान उपकरणों पर प्रकाश संश्लेषण जीवाणुओं के आवरण के निर्माण में इस खोज का योगदान किया जा सकेगा। इनसे उनकी ऊर्जा निर्गम परंपरागत वैद्युत परिपथ का भाग बनाई जा सकती है जो विभिन्न तीव्रता वाले प्रकाश के साथ सौर्य पैनल के अनूकुलन को दिशा दे सकता है।

हरिकेन (चक्रवात) की भविष्यवाणी हेतु कम्प्यूटर मॉडल (Computer Model for Prediction of Hurricane (Cyclone) )

एक अदव्तीय (विलक्षण) कम्प्यूटर माडल को फ्लोरिड़ा स्थित ओशन एटमोस्फियरिक प्रिडिक्शन स्टडीज सेन्टर (COAPS) के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है जो दक्षता से हरिकेन (चक्रवातों) का अद्भुत सटीकता के साथ भविष्यवाणी करता है। वर्ष 1995 से 2009 के दौरान उपरोक्त माडल ने 13.7 माध्य वाले नामित चक्रवातों का पूर्वानुमान किया था, जिसमें से 7.8 माध्य वाले हरिकेन थे। वास्तविकता में इस अवधि में औसतन 18.8 नामि चक्रवातों में से 7.9 हरिकेन थे। यह मॉडल विश्व स्तर पर बनाए गए कई गणितीय मॉडलों में से एक है जो चक्रवातों की मौसमी गतिविधियों का अध्ययन करत हैं लेकिन अन्य की तुलना में यह मॉडल अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ। मॉडल दव्ारा उच्च कार्य निष्पादन करने वाले कम्प्यूटर का प्रयोग कर वायुमंडलीय, महासागरीय एवं स्थलीय सूचनाओं का विश्लेषण किया जाता है। इस मॉडल का एक महत्वपूर्ण अवयव सागरीय सतह के तापक्रम का पूर्वानुमान करना भी है।

आकाशगंगाओं का (WISE) के माध्यम से अध्ययन (Study of the Milky Way (WISE) )

  • वाइड-फील्ड इंफ्रारेड सर्वे एक्सप्लोरर (WISE) एक अवरक्त तरंग दैर्ध्य वाली अंतरिक्ष वेधशाला है। यह नासा (NASA) के दव्ारा खोजी गई थी और इसे 14 दिसंबर, 2009 को प्रक्षेपित किया गया था। पृथ्वी की कक्षा में भ्रमण करने वाला उपग्रह अपने साथ यह 40 सेमी. व्यास वाली अवरक्त किरण संवेदनशील वेधशाला को ले गया जो 3 - 25 माइक्रान की तरंगदैर्ध्य वाले चित्रों के माध्यम से 6 महीने तक संपूर्ण आकाश का सर्वेक्षण करेगा। वेधशाला का आकृति संसूचक (Image Detector) इस प्रकार निर्मित किया गया है जो आकाश के अवरक्त प्रदर्शन (लक्षण) हेतु पूर्ववर्ती प्रक्षेपित अवरक्त अंतरिक्ष सर्वेक्षण वेधशालाओं जैसे अतिरिक्त अंतरिक्ष उपग्रह आदि (IRAS) , AKARI, COBE से कम से कम 1000 गुना अधिक संवेदनशील है। इस वैधशाला की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि यह वैधशाला प्रत्येक दिन दर्जनों अज्ञात छुदग्रह को खोज रही है।
  • यह संपूर्ण मिशन आकाश के लगभग 99 प्रतिशत भाग का बढ़ी हुई सटीकता के आधार पर, आकाश की प्रत्येक स्थिति से, कम से कम 8 चित्रों को बनाएगा। अंतरिक्षयानको 524 किमी. ऊँचाई पर वृत्तीय, ध्रुवीय एवं सूर्य-समस्थितिक (SUN-SYNCHRONOUS) कक्षा में 10 महीने की अवधि के लिए स्थपित किया जाएगा। इस दौरान यह प्रति 11 सेकंड चित्र की दर से 1.5 लाख चित्रों को खीचेगा। प्रत्येक चित्र लगभग 47 आर्कमिनट (ARCMINUTE) क्षेत्र की जानकारी देगा। आकाश के प्रत्येक क्षेत्र का 10 बार सूक्ष्मता से परीक्षण किया जाएगा।
  • स्थानीय सौर्य प्रणाली, मंदाकिनी आकाशंगा और ब्रह्यांड से संबंधित आंकड़ों को रखेगा। वाइज (WISE) के उद्देश्यों मेंं क्षुद्र ग्रहों, शीत तारों जैसे कि भूरे वामन (Brown dwarfs) और सर्वाधिक उद्दीपन अवरक्त आकाशगंगाओं का अध्ययन शामिल है। WISE मार्च, 2009 में प्रक्षेपित वाइड फील्ड इंफ्रारेड एक्सप्लोरर (WISE) जो अपनी कक्षा में पहुंचने के एक घंटे के अंदर नष्ट हो गया था, के प्रतिस्थापन के रूप में भी कार्य करेगा।