Science and Technology: Nobel Prize-2011: Chemical Sector, Physics Field and Medical Scientific Field

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नोबेल पुरस्कार-2011 (Nobel Prize-2011)

रसायन क्षेत्र (Chemical Sector)

  • इस क्षेत्र में वर्ष 2011 का नोबल पुरस्कार ‘क्वासीक्रिस्टल’ की खोज के लिए इजरायल के वैज्ञानिक डेन शेकमैन को दिया गया।
  • शेकमैन ने अपनी खोज के दौरान पाया कि क्रिस्टल बनाने के लिए परमाणु जब नियमित ढांचे में एकत्रित होते हैं तब इन ढांचों की सदैव पुनरावृत्ति नहीं होती है। शेकमैन ने क्वासीक्रिस्टल की संरचना की तुलना अरबी मोसैक (Arabian Mosaics) में दिखने वाले गणितीय रूप से नियमित लेकिन थोड़े परिवर्तित ढांचे से की है। उल्लेखनीय है कि विगत 30 वर्षों से सैकड़ों क्वासीक्रिस्टलों का संश्लेषण किया गया है और नवीन मिश्रधातु बनाने से लेकर रसोई बरतनों में परत चढ़ाने के लिए इनका उपयोग किया जाता रहा है।
  • सामान्यत: रवेदार पदार्थ (Crystallised Materials) परमाणुओं की एकल कोशिकाओं से बने होते हैं और एकसमान संरचना के निर्माण में इनकी संरचनाओं की पुनरावृत्ति होती है। वैज्ञानिकी के अनुसार एक क्रिस्टलीय आकृति के लिए यह पुनरावृत्ति आवश्यक होती है। इस तरह की क्रिस्टलीय संरचना के कारण ही ग्रेफाइट अच्छे स्नेहक (Lubricant) होते हैं। परन्तु शेकमैन को अपने शोध के दौरान विचित्र क्रिया दिखी। त्वरित रूप से ठंडे किए गए धात्विक मिश्रधातु का प्रतिबिंब इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में अवलोकित करने पर उन्होंने पाया कि परमाणु इस प्रकार से संगठित हुए थे कि इनकी कोई भी पुनरावृत्ति नहीं बनी थी।
  • ऐसी संरचना को क्वासीक्रिस्टल की संज्ञा दी गई। इस संरचना में दरारनुमा समतल नहीं होता है। इस कारण ये कठोर होते हैं।
  • हालापकि क्वासीक्रिस्टल का अस्तित्व विवाद में रहा है लेकिन इसका अनुमान बहुत पहले ही किया गया था। शेकमैन ने पहली बार इस संरचना का अवलोकन किया। वस्तुत: 16वीं सदी के खगोलशास्त्रीय जोहान्स केपलर ने अपनी पुस्तक ‘मिस्टेरियम कॉस्मोग्रैफिकम’ में क्वासीक्रिस्टलनुमा संरचना निर्मित किया।
  • पुन: 1970 के दशक में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के गणितीय भौतिकविद सर रोजर पेनरोज ने भी ऐसी अनियिमित संरचना (Aperiodic Structure) बनाई जिनकी पुनरावृत्ति नहीं हुई थी।
  • क्वासीक्रिस्टल का उपयोग फ्रांइग पैन में परत चढ़ाने में किया जा रहा है। इन पदार्थो के गुण हैं- अत्यधिक कठोरता, सतह पर घर्षण की नगण्यता, किसी अन्य के साथ अभिक्रिया न करना, ऑक्सीकृत नहीं होना।
  • स्पेन में अल्हम्ब्र पैलेस और इरान में दर्ब-ए-इमाम दरगाह में उपयोग किए गए मध्यकालीन इस्लामी मोसैक में क्वासीक्रिस्टलीय संरचना के सदृश्य की संरचनाएप निर्मित है। इन संरचनाओं ने परमाण्विक स्तर पर क्वासीक्रिस्टलों की संरचना समझने में मदद की। वस्तुत: इन इस्लामी मोसैक आकृतियों मेंं भी गणितीय नियम से नियमित ढांचे बने हैं लेकिन किसी भी ढांचे की पुनरावृत्ति नहीं हुई हैं।
  • शेकमैन के क्वासीक्रिस्टल का उल्लेख करने के लिए वैज्ञानिकों ने गणित और कला से प्राप्त अवधारणा का उपयोग किया है। इसे गोल्डन रेशियों (Golden Ratio) कहा जाता है।

नोट: दो संख्याएं गोल्डन रेशियों में तब समझी जाती हैं जब उनका अनुपात उन संख्याओं और उनमें से बड़ी संख्या के अनुपात के बराबर होता है। उदाहरण के लिए दो संख्याओं (a) और (b) के लिए जबकि a > b

  • इस गोल्डन रेशियो को गोल्डन मीन (Golden Mean) भी कहा जाता है।
  • क्वासीक्रिस्टलों में भी विभिन्न परमाणुओं के मध्य विविध दूरियों का अनुपात गोल्डन मीन से संबंद्ध पाया गया है।
  • शेकमैन की खोज के आधार पर वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में क्वासीक्रिस्टलों के अन्य प्रकारों को निर्माण किया है और रूस की एक नदी से प्राप्त खनिज नमूने में भी प्राकृतिक रूप से पाए गए क्वासीक्रिस्टलों की पहचान की गई है। वर्तमान में फ्राइंग पैन और डीजल इंजनों में क्वासीक्रिस्टलों का अनुप्रयोग किया जा रहा है।

भौतिकी क्षेत्र (Physics Field)

  • इस क्षेत्र में वर्ष 2011 का नोबल पुरस्कार ‘दूरस्थ सुपरनोव के अवलोकन के जरिए ब्रह्यांड के त्वरित विस्तार की खोज’ के लिए सॉल पर्लमूटर, ब्राइन पी. शीमिट्‌ और एडम जी. रीस को प्रदान किया गया है।
  • इन वैज्ञानिकों ने सबसे दूरस्थ समझे जाने वाले ‘टाईप ला सुपरनावा’ का मानचित्र धरातलीय और अंतरिक्ष दूरबीनों की सहायता से तैयार किया। अपने अवलोकन में इन्होने पाया कि ये विस्फाटित तारे संभावित अनुमान से भी अधिक धुंधले दिख रहे थे।
  • टाईप ला का उपयोग मानक मोमबत्ती (Standard Candles) की भापति किया जाता है क्योंकि खगोलविदों को इनकी चमक (स्थिर प्रकृतियुक्त) की जानकारी है और इस चमक का उपयोग इन तारों की हमसे दूरी का आकलन करने में किया जाता हैं
  • परन्तु आपकड़ो ने यह दर्शाया है कि इन मानक मोमबत्तियों (अर्थात्‌ विस्फोटित तारे) में उपयुक्त चमक नहीं है और ये धुंधले होते जा रहे है।
  • आपकड़ो में यह पता चला है कि ये सुपरनोवा त्वरित दर से दूर होते जा रहे हैं। अत: यह आकलन किया गया है कि इस मद्देनजर कोई अन्य बल कार्य कर रहा है जो कि स्पष्ट नहीं हो सका है। इतना ज़रूर स्पष्ट हो गया है कि इससे ब्रम्हांड के 74 प्रतिशत भाग का निर्माण हुआ है। इसे ही डार्क एनर्जी की संज्ञा दी गई है।
  • यह समझा जा रहा है कि यदि ब्रम्हांड का त्वरित विस्तार होता रहे तो यह एक समय हिम में परिणत हो जाएगा। वस्तुत: एक त्वरणशील ब्रह्यांड से अभिप्राय है कि अंतरिक्ष में पदार्थ अत्यधिक दूरी पर प्रसारित होते जाएंगे और इस कारण ब्रह्यांड ठंडा होता जाएगा। इस त्वरण के पीछे कार्य कर रही अज्ञान ब्रंह्माडीय शक्ति को ही डार्क एनर्जी कहा गया है। यह एनर्जी गुरुत्व बल का विरोध करता हुआ ब्रह्माड को अधिक तीव्र दर से प्रसारित करता जा रहा है।

चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र (Medical Scientific Field)

  • इस क्षेत्र मे वर्ष 2011 को नोबल पुरस्कार स्वाभाविक रूप से प्रतिरक्षा को सक्रिय करने संबंधी खोज और द्रुमाकृतिक कोशिका (Dendritic Cell) एवं अनुकूलन योग्य प्रतिरक्षा में इनकी भूमिका की खोज के लिए बस ब्यूटलर जूल्स ए हॉफमैन और राल्फ एम स्टीनमैन को प्रदान किया गया है। इस खोजों में प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रियता के लिए प्रमुख सिद्धांतों का पता लगाया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि बीते कई वर्षां से वैज्ञानिक इस पड़ताल में लगे थे कि मनुष्य और जानवर जीवाणुओं और अन्य सूक्ष्म जीवों के प्रभाव से प्रतिरक्षा किस प्रकार कर पाते हैं। बूस ब्यूटलर और जूल्स हॉफमैन ने संग्राहक प्रोटीनों (Receptor Proteins) की खोज की। ये प्रोटीन शरीर पर आक्रमण करने वाले सूक्ष्म जीवों की पहचान कर सकते हैं। ये शरीर में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के आरंभिक चरण में स्वाभाविक प्रतिरक्षा को भी सक्रिय कर सकते हैं।
  • राल्फ स्टीनमैन ने प्रतिरक्षा तंत्र के द्रुमाकृतिक कोशकाओं की खोज की। राल्फ ने प्रतिरक्षा के बाद वाले चरण में (जबकि सूक्ष्मजीवों शरीर से समाप्त कर दिए जाते हैं) अनुकूलित प्रतिरक्षा व्यवस्था सक्रिय करने और उसका विनियमन करने के लिए द्रुमाकृतिक कोशिकाओं की विशिष्ट क्षमता की खोज भी की।
  • इन खोजों में स्पष्ट होता है कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वाभाविक और अनुकूलित चरण किस प्रकार सक्रिय होते हैं। इससे रोगी के बारे में व्यापक जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी। इन खोजों के आधार पर संक्रमण कैंसर और अन्य ग्रभीर बीमारियों की रोकथाम और इनके उपचार के नए आयाम विकसित किए जा सकते हैं।
  • उल्लेखनीय है कि जीवाणु, विषाणु, कवक, परजीवी जैसे रोगजनक सूक्ष्मजीव लगातार मानव शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकते है लेकिन हमारे शरीर में रक्षात्मक स्तर पर स्वाभाविक प्रतिरक्षा (Innate Immunity) पायी जाती है जे इनसे हमारी रक्षा करते हैं। यदि सूक्ष्मजीव इस रक्षात्मक स्तर को भेद देते हैं तब अनुकूलन योग्य प्रतिरक्षा (Adaptive Immunity) कार्यशील हो जाती है। T और B कोशिकाओं की सहायता से यह प्रतिजैविक अधिक घातक कोशिकाएप बनाता है जो कि आक्रमण करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देते हैं। अनुकूलनीय प्रतिरक्षा तंत्र इस दौरान प्रतिरक्षण स्मरण क्षमता विकसित कर लेते हैं ताकि भविष्य में यदि वही सूक्ष्मजीव आक्रमण करे तब शीघ्रता से कार्यवाही की जा सके। प्रतिरक्षा तंत्र के ये दोनों रक्षा व्यवस्थाएप (स्वाभाविक और अनुकूलनीय) संक्रमण से सुरक्षा तो प्रदान कर सकती हैं लेकिन इनके कारण जोखिम की संभावना भी रहती है। सक्रियता का प्रभाव कम करने या अन्तर्जात अणुओं दव्ारा प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय कर देने से रोग उत्पत्ति की संभावना भी हो सकती है।
  • नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों ने प्रतिरक्षा तंत्र के घटकों का विशष्टि अध्ययन कर उपरोक्त समस्या का समाधान निकाल लिया है। इन्होने पता लगाया है कि प्रतिजैविक किस प्रकार निर्मित होते हैं और T कोशिकाएप बाह्‌य पदार्थों की पहचान किस प्रकार कर लेती है।
  • जूल्स हॉफमैन ने 1996 में अपनी खोज के दौरान पाया कि फल मक्खियाप (Fruit Flies) किस प्रकार संक्रमण से लड़ सकती है। हॉफमैन ने जब जीवाणु या कवक का संक्रमण फल मक्खियों पर कराया तो उन्होने देखा कि Toll उत्परिवर्तकों (Toll mutants) की समाप्ति हो गई। प्रसंगवश, Toll एक प्रकार के उत्परिवर्तन जीन होते हैं जो भ्रूणीय विकास में अपनी भूमिका निभाते हैं। इन जीनों की समाप्ति इस कारण हुई कि इनमें प्रभावकारी रक्षा तंत्र की अनुपस्थिति थी।
  • उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि Toll जीन रोगजनक सूक्ष्मजीवों की पहचान कर सकते हैं और इन सूक्ष्मजीवों के विरुद्ध बेहतर रक्षा तंत्र विकसित करने के लिए Toll जीन को सक्रिय करने की आवश्यकता होगी।
  • ब्रूस ब्यूट्‌लर ऐसे संग्राहक की खोज कर रहे थे जो लीपोपॉलीसैकेराइड (LPS) नामक जीवाणु उत्पाद (Bacterial Product) को संगठित कर सकते हैं। प्रतिरक्षा तंत्र के अत्यधिक उत्प्रेरित हो जाने की स्थिति में LPS के कारण ही गंभीर संक्रमण की संभावना होती है।
  • 1998 में ब्यूट्‌लर ने खोज की कि LPS प्रतिरोधी एक चुहिये का ‘जीन’ फल मक्खी (Fruit Fly) के उत्परिवर्तित Toll जीन के समरूप ही उत्परिवर्तित हुआ था। इस Toll Like receptor (TLR) ‘जीन’ को LPS संग्राहक चिन्हित किया गया। जब यह LPS को संगठित करती है। तब ऐसे सिग्नल सक्रिय होते हैं जिसके कारण सूजन होता है और जब LPS की मात्रा अधिक हो जाती है तो गंभीर संक्रमण की स्थिति बन जाती है।
  • इन क्रियाविधियों से यह स्पष्ट हुआ कि स्तनधारी और फल मक्खियाप रोगजनक सूक्ष्मजीवों से लड़ने के दौरान प्राकृतिक प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करने के लिए एकसमान अणुओं का उपयोग करते हैं। इस प्रकार स्वाभाविक प्रतिरक्षा के सेंसरों की खोज कर ली गई थी। हॉफमैन और ब्यूटलर की खोजों से स्वाभाविक प्रतिरक्षा शोध में क्रांति हो गई। अभी तक मानव और चुहिये में लगभग विभिन्न TLR की पहचान की गई है।
  • राल्फ स्टीनमैन ने 1973 में कोशिका के एक नए प्रकार की खोज की जिसे द्रुमाकृतिक कोशिका कहा गया। उन्होंने दर्शाया कि यह कोशिका प्रतिरक्षा तंत्र के लिए उपयोगी हो सकती है। उन्होंने इस पर कार्य आरंभ किया कि “क्या द्रुमाकृतिक कोशिकाएप कोशिकाओं को सक्रिय कर सकती है।” अपनी खोज में उन्होंने स्पष्ट किया कि द्रुमाकृतिक कोशिकाओं में T कोशिकाओं को सक्रिय करने की विशिष्ट क्षमता होती है।

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