Science and Technology: Role of Biotechnology in National Development

Doorsteptutor material for IAS is prepared by world's top subject experts: Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

राष्ट्र विकास में जैव प्रौद्योगिकी का भूमिका (Role of Biotechnology in National Development)

  • भारत जैसे विकासशील देशों में नई तकनीकों के प्रादूर्भाव एवं विकास ने उनकी संवृद्धि तथा सुदृढ़ीकरण में विशिष्ट भूमिका निभाई है। विशेष रूप से 1990 के दशक में उदारीकरण एवं भूमंडलीकरण की प्रक्रियाओं के प्रारंभ ने ऐसी तकनीकों के महत्व में अप्रत्याशित वृद्धि कर दी है। यद्यपि विकास के मार्ग को प्रशस्त बनाने के लिए कमोबेश सभी वैज्ञानिक विधाओं तथा तकनीकों की अनिवार्यता है, तथापि विस्तार एवं प्रभाव के दृष्टिकोण से जैव प्रौद्योगिकी का विशेष महत्व है। वस्तुत: भारत के संदर्भ में इस प्रौद्योगिकी ने सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय क्षेत्रों को सकारात्मक रूप से प्रभवित कर सभी विकासोन्मुखी कार्यक्रमों को त्वरित गति प्रदान करने मं अपनी सक्षमता सिद्ध की है। सामाजिक दृष्टिकोण से जैव प्रौद्योगिकी ने मुख्यत: स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है। मूलत: जैव प्रौद्योगिकी के अंतर्गत डी. एन. ए. पुनर्संयोजी तकनीक के प्रयोग से न केवल नये टीकों का निर्माण करने में सफलता प्राप्त हुई है, बल्कि कृत्रिम इन्सुलीन एवं अन्य हारमोनों के निर्माण ने कई रोगों के उपचार को भी सरल बनाया है। इसी क्रम में डी. एन. ए. के टीकों का निर्माण भी किया गया है, जिसके फलस्वरूप परंपरागत टीकों पर मानव प्रजाति की निर्भरता में कमी आई है। साथ ही ऐसे टीकों को लंबी अवधि तक सुरक्षित रखने के कार्य में भी सहायता प्राप्त हुई है।
  • हाल ही में विकसित नैनोतकनीक ने मानव जीनोम के अध्ययन के नये मार्ग प्रशस्त किये है।ं जिसके आधार पर मानव को रोग-मुक्त बनाये रखने की संकल्पना के सुदृढ़ीकरण में व्यापक सफलता प्राप्त होने की संभावना है। जैव प्रौद्योगिकी के एक अभिन्न अंग के रूप में निम्नतापी जैविकी ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांतिकरी परिवर्तन किये हैं। इसके तहत निम्नतापी शल्य चिकित्सा, संरक्षण तथा स्लश चिकित्सा का विशेष महत्व है।
  • इसके अतिरिक्त, जैव सूचना के क्षेत्र के प्रादुर्भाव के कारण मानव संसाधन के विकास कार्यक्रमों को भी बल प्रदान किया जा सका है, जो जैव प्रौद्योगिकी के उत्तरोतर विकास में भी सहायक सिद्ध होगी।
  • आर्थिक दृष्टिकोण जैव प्रौद्योगिकी निकटंबंध कृषि तथा उद्योग से पूर्णत: स्थापित है। कृषि के क्षेत्र में नई प्रजातियों के विकास के लिए प्रयुक्त ट्रांसजेनिक तथा जीन अभियांत्रिकी तकनीकों का विशेष महत्व है। हाल के वर्षों में बीटी फसलों की संकल्पना ने इस क्षेत्र में विकास की संभावनाओं को प्रबलता प्रदान की है। जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से उत्पादकता के दृष्टिकोण से उन्नत प्रजातियों के विकास के साथ कीट प्रतिरोधी प्रजातियों का भी विकास संभव हुआ है, जिसने भारत जैसे कृषि प्रधान देश में विभिन्न कार्यक्रमों को दृढ़ता प्रदान की है। इस कार्य में उत्तक संवर्द्धन तथा जैव उर्वरकों की तकनीक का प्रयोग भी विशष्ट है। जहांँ तक उद्योग का प्रश्न है, मूल रूप से जीवाणुओं तथा सूक्ष्म जीवों का प्रयोग कर चीनी से अधिक मीठे पदार्थों के निर्माण को बेहतर बनाया जा सका है। ऐसे पदार्थों का उपयोग विशेष रूप से यूरोपीय देश में किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, थॉमेटिन नामक पदार्थ को सुक्रोज से 3000 गुणा अधिक मीठा पाया गया है।
  • पर्यावरणीय क्षेत्र में प्रदूषण को कम करने तथा जैव विविधता संरक्षण में भी जैव प्रौद्योगिकी की विशेष भूमिका है। जीन संरक्षण के माध्यम से विलुप्त होने वाले जीवों का संरक्षण संभव हो रहा है। साथ ही, जैव उपचार जैसी तकनीकों को सुदृढ़ बनाकर पर्यावरणीय प्रदूषण कम करने में व्यापक सफलता अर्जित की जा सकती है। इसी प्रकार, जैव संवेदकों के प्रयोग ने भी पर्यावरण संरक्षण में विशेष योगदान दिया है।

रक्षा प्रौद्योगिकी (Defence Technology)

प्रक्षेपास्त्र विकास (Missile Development)

भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के रूप में वर्ष 1967 में प्रक्षेपास्त्र तकनीक का विकास शुरू किया गया था, लेकिन अंतरिक्ष सह-प्रक्षेपास्त्र तकनीक का पहला सफल परीक्षण एक दो -चरण और ठोस प्रणोदक का प्रयोग करने वाले साउंडिंग रॉकेट 560 के प्रक्षेपण के साथ किया गया। इस रॉकेट को 100 किलोग्राम के भार सहित 334 किलोमीट की ऊँचाई तक प्रक्षेपित किया गया था। वास्तविक रूप में इस क्षेत्र में विकास का कार्य रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation, DRDO) दव्ारा वर्ष 1983 में आरंभ किया गया था। इसके अंतर्गत समन्वित निर्देश्ति प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम (Integrated Guided Missile Development Programme, IGMDP) की शुरूआत की गई। कार्यक्रम के अंतर्गत निम्नांकित प्रक्षेपास्त्रों के विकास के लिए प्रयास आरंभ किये गये:

  • पृथ्वी (Prithvi) : सतह से सतह तक मार करने वाले परमाणु शक्ति संपन्न इस प्रक्षेपास्त्र का पहला परीक्षण 1988 में किया गया था। इसकी मारक क्षमता 40 - 250 किलोमीटर है। पृथ्वी का विकास संवर्द्धित उपग्रह प्रमोचक यान (Augmented Satellite Launch Vehicle, ASLV) की तकनीक पर किया गया है तथा इसमें कम्प्यूटर प्रणाली के अतिरिक्त एक विमान संचालन प्रणाली का भी उपयोग किया गया है।
  • अग्नि (Agni) : सतह से सतह तक मार करने वाले इस परमाणु शक्ति संपन्न प्रक्षेपास्त्र के तीन चरण हैं:- अग्नि I, II तथा III यह प्रक्षेपास्त्र पुर्नप्रवेश तकनीक (Recntry Technique) पर आधारित है जिसका तात्पर्य यह है कि पहले चरण में यह वायुमंडलीय सीमा में बाहर जाकर पुन: उसमें प्रवेश करता है जिससे उसकी तीक्ष्णता तथा विध्वसंकारी कार्यों में निपुणता आ जाती है। इसकी अधिकतम मारक क्षमता 3500 किलोमीटर है। इस प्रक्षेपास्त्र की एक विशेषता यह भी है कि इसमें वैश्विक अवस्थान प्रणाली (Global Positioning System, GPS) प्रयुक्त हुई है। साथ ही यह 5000 डिग्री सेल्सियस तक के तापान्तर को सहन कर सकता है क्योंकि इसमें कार्बन-कार्बन सम्मिश्र (Carbon-Carbon Composite) का प्रयोग किया गया हैं
    • अग्नि I: यह मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। अग्नि में ठोस प्रणोदन वर्धक का प्रयोग किया है साथ ही ऊपरी स्तर पर द्रव्य प्रणोदक वर्धक का प्रयोग किया गया ळे, जो पुर्नप्रवेश संरचना नियंत्रण एवं निर्देशन के लिए उपयोगी है।
    • अग्नि II: यह 200 किमी. से अधिक मारक क्षमता वाली प्रदर्शन और दोहरे मार्गदर्शन वाली मिसाइल हैं उपर्युक्त बहुस्तरीय नियंत्रण कौशल और उड़ान परीक्षण के साथ दिशानिर्देशन का अभिकल्पन और विकास, पुर्नप्रवेशन प्रौद्योगिकी इसे विशिष्ट बनाती है।
  • आकाश (Akash) : सतह से हवा में मार करने वाला मध्यम दूरी का यह प्रक्षेपास्त्र एक साथ 3 - 5 लक्ष्यों पर निगरानी रखने में सक्षम है। यह वाहक में रैम रॉकेट प्रणोदन और वर्धन के लिए उच्च उर्जित ठोस प्रणोदक का प्रयोग करता है। प्रणोदक प्रणाली पारंपरिक तरल, ठोस रॉकेट के मुकाबले न्यूनतम द्रव्यमान से ऊर्जा का उच्चस्तर उपलब्ध कराती है, जिससे मिसाल के न्यूनतम वजन में बेहतर प्रदर्शन होता है इसमें निर्देशन को दोहरी पद्यति है, प्रारंभ में युद्धार्थ रडार (राजेन्द्र) से कमांड पद्यपि पर और बाद में उच्च लक्ष्योमेदता के लिए विकसित विशिष्ट साफ्टवेयर के माध्यम से रडार लक्ष्य स्थानक निर्देशन पर यह प्रणाली उच्च गतिशील है और कमांड निर्देशन उपलब्ध कराते हुए कई उड़ान परीक्षणों से गुजरी है। इसमें एक अति विशिष्ट रडार प्रणाली राजेन्द्र का प्रयोग किया गया है। इसकी तुलना अमेरिका के पैट्रयॉट नामक प्रक्षेपास्त्र से की जाती है। इसकी मारक क्षमता 25 किलोमीटर है।
  • त्रिशुल (Trishul) : सतह से हवा में मार करने वाला यह प्रक्षेपास्त्र 5.5 किलोमीटर उच्च शक्ति वाले खंडित विस्फोटकों की सुपुर्दगी की क्षमता रखता है। इस प्रक्षेपास्त्र का नौसैनिक प्रतिरूप समुद्र में चौकसी के कार्य में भी सक्षम है। यह इस्पात प्रवाह प्रकोष्ठ (Maraging Steel flow chamber) में उच्च ऊर्जित प्रणोदक का प्रयोग कर दोहरे आघात प्रणोदक काल का प्रयोग करता है और कमांड निर्देशन पर कार्य करता है प्रारंभ में के-बैंड एकत्र करता है और फिर खोजी रडार को स्थानांतरित करता है। इसमें सभी ज्ञात जैमर के खिलाफ आवश्यक रूप से इलेक्ट्रानिक जवाबी उपाय होते हैं।

त्वरित प्रतिक्रिया समय, उच्च आवृत्ति परिचालन, उच्च युद्ध कौशल, उच्च प्रहार क्षमता और तीनों सेनाओं के लिए बहुभूमिका से लैस कलात्मक (State of the art) प्रणाली है जो सशस्त्र बलों के लिए प्रचुर लाभ उपलब्ध कराती है। एक रडार तथा ऊँचाई मापी यंत्र की सहायता से यह समुद्र से 2 से 5 मीटर की ऊँचाई पर उड़ान भरने में भी सक्षम है। लक्ष्य की पहचान के लिए इसमें अवरक्त विकिरणों की निर्देशन प्रणाली (Infrared Guiding System) का प्रयोग किया गया है। वर्ष 2006 में यह परियोजना बंद कर दी गई है।

  • नाग (Nag) : यह एक कवच-रोधी हथियार है जिसे 4 किलोमीटर तक निर्देशित किया जा सकता है।
  • धनुष (Dhanush) : पृथ्वी के नौकायन संस्करण को धनुष की संज्ञा दी गई। इसका पहला परीक्षण वर्ष 2000 में भारतीय पोत आई. एन. एस. सुभद्रा से किया गया था।
  • सागरिका (Sagarika) : भारतीय वैमानिकी विकास संस्थापन (Aeronautical Development Establishment, ADE) दव्ारा 300 किलोमीटर की मारक क्षमता वाले इस क्रूज प्रक्षेपास्त्र का विकास किया जाएगा। यह आशा व्यक्त की गई है कि रूस की सहायता से विकसित की जाने वाली परमाणु शक्ति संपन्न पनडुब्बियों में इसका प्रयोग किया जाएगा।
  • सूर्या (Surya) : भारत दव्ारा 5000 किलोमीटर की न्यूनतम मारक क्षमता वाले सूर्या नामक प्रक्षेपास्त्र का विकास किया जा रहा है। इसके एक चरण में द्रव प्रणोदक का प्रयोग किया जाएगा जो निम्नतापी ईंजन अथवा क्रायोजेनिक ईंजन तकनीक पर आधारित होगा। सूर्या के तीन संस्करण विकसित किये जाएगे तथा तीसरे संस्करण की मारक क्षमता 20,000 किलोमीटर होगी। सूर्या ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचक यान (Polar Satellite Launch Vehicle, PSLV) की तकनीक पर आधारित होगा।
  • बराक: इजराइल से प्राप्त बराक मिसाइल प्रणाली एक प्रक्षेपास्त्ररोणी प्रणाली है। इसकी मारक क्षमता 12 किमी. तक है। यह ध्वनि सबसे दोगुनी रफ्तार से आक्रमण करने में सक्षम है। यह प्रणाली युद्धपोतों को पनडुब्बियों से छोड़े जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों से बचाती है। लंबवत लांचर से छोड़ी जाने वाली यह मिसाइल 3600 तक घूम सकती है।
    • प्रक्षेपास्त्रों के विकास के क्रम में भारत दव्ारा नई तकनीकों, विशेषकर स्क्रैमजेट ईंजन तकनीक का भी विकास किया जा रहा है। इस तकनीक दव्ारा सुपर सॉनिक विमानों में ज्वलनशीलता को अधिक कार्यकुशल बनाया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त भारत दव्ारा एक हाइपर सॉनिक प्रक्षेपास्त्र प्रणाली (अवतार) का भी विकास किया जा सकता है। अवतार की विशेषता यह होगी कि यह सामान्य वायुयानों की तरह क्षैतिज उड़ान भरने में सक्षम है तथा इसे एक अंतरिक्ष शटल की भांति एक से अधिक बार प्रयोग में लाया जा सकेगा। इसकी गति मैक-7 होगी जो ध्वनि की गति से सात गुणा अधिक है। इसे 30,000 - 40000 किलोमीटर की दूरी तक प्रक्षेपित किया जा सकेगा। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के अनुसार, इस प्रकार के हथियार के निर्माण के लिए वायुगतिकी (Aerodynamics) तथा रैमजेट औ स्क्रैमजेट ईजनों का विस्तृत अध्ययन अनिवार्य है।

Developed by: