Science and Technology: Information Technology: Telecommunication Media

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सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology)

दूरसंचार हेतु उपयोगी माध्यम (Telecommunication Media)

वस्तुत: संचार का ही विस्तृत रूप दूरसंचार है। जब संचार किन्हीं दो काफी दूर स्थित स्थानों के मध्य संचालित होता है तो यह ‘दूरसंचार’ कहलाता है, यह दूरी सैकड़ों या हजारों किमी. हो सकती है। दूरसंचार के लिए जिन संचार माध्यमों का उपयोग किया जाता है, उनमें प्रमुख हैं:

  • कॉपर केबल (Copper Cable)
  • प्रकाश हेतु (Optical Fibre)
  • रेडियो और माइक्रोवेव तरंगे
  • उपग्रह संचार प्रणाली।
  • जलगर्भीय संचार प्रणाली।
  • कॉपर केबल: यह सबसे दूरसंचार माध्यम है। इसमें विद्युत पल्स के माध्यम से संदेशों का संचरण होता है तथा इसकी क्षमता बहुत सीमित होती है। वास्तव में संचार प्रणाली ध्वनि तरंगों को विद्युत अथवा प्रकाश तरंगों को पुन: ध्वनि तरंगों में परिवर्तित कर लिया जाता है। कॉपर केबल के माध्यम से विद्युत तरंगों का प्रयोग होता है।
  • प्रकाश तंतु: संचार के क्षेत्र में ‘प्रकाश तरंगो’ का प्रयोग प्रारंभ होने से प्रकाशीय संचार की आधुनिक प्रौद्योगिकी का विकास संभव हुआ है। इसके अंतर्गत प्रकाश तुंतु संचार प्रणाली का प्रयोग करके मनुष्य की आवाज टेलीविजन के चित्रों तथा कम्यूटर के आंकड़ों को सरलता व सुविधापूर्वक संचालित एवं संग्रहित किया जा सकता है। इस आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने वाला भारत विकासशील देशों में प्रथम देश है।
    • प्रकाश तंतु या ऑप्टिकल फाइबर एक प्रकार की ‘सिलिका’ से बनी पतली बेलनाकार नलिकाएं होती है, जो प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के सिद्धांतों पर कार्य करती है, जिससे विद्युत ऊर्जा के विपरीत इन प्रकाश तंतुओं में प्रकाश ऊर्जा का किसी प्रकार का क्षय नहीं होता है। प्रकाश तंतु एवं शक्तिशाली प्रकाश पुंज (लेजर किरणें) से बनी केबल का प्रयोग करके ‘प्रकाश तुतु दूरसंचार सेवा’ की शुरूआत की गई।
  • रेडियो और माइक्रोवेव तरंगे: रेडियों संचार माध्यम का प्रयोग मुख्यत: समाचार संगीत और दूसरे संदेशों को दूरस्थ स्थानों तक भेजने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रम में ‘रेडियों तरंगो’ का प्रयोग किया जाता है। यह एक प्रकार की ‘विद्युत चुंबकीय तरंगे’ होती हैं। जो मूलरूप से एक विशेष परिपथ में उत्पन्न की जाती हैं। इन तरंगों को रेडियों सेटों में एरियल के माध्यम से ग्रहण किया जाता है तथा शक्तिशाली बनाने के लिए कई बार एम्पलीफाई किया जाता है। रेडियों संचार के लिए दो प्रकार के यंत्रों की आवश्यकता होती है- संचारक-रेडियो तरंगों को उत्पन्न कर रेडियों सेट तक भेजता है तथा रेडियों तरंगों को ध्वनि तरंगों में परिवर्तित करके वास्तविक आवाज पैदा करता है। उल्लेखनीय है कि रेडियो प्रसारण में प्रयोग होने वाली तरंगों की आवृत्ति 150 किलो हर्ट्‌ज से 30,000 मेगा हर्ट्‌ज तक होती है।
    • जिन तरंगों का तरंगदैर्ध्य बहुत कम होता है उन्हें सूक्ष्म तरंग कहते हैं। इन तरंगों की आवृत्ति स्पेक्ट्रम 1 गीगा हर्ट्‌ज से 1,000 गीगा हर्ट्‌ज तक लेते हैं। इन सूक्ष्म तरंग बैंडों में विद्युत चुंबकीय तरंग स्पेक्ट्रम का केवल वह भी भाग लेते हैं जो दूर संचार में उपयोगी होता है। वर्तमान में रेडियों तरंगों का प्रयोग मुख्यत: चलन्त संचार प्रणाली जैसे सेलुलर फोन, पेजर आदि तथा ग्रामीण इलाकों में दूरदराज के गांवों को टेलीफोन सुविधा प्रदान करने के लिए एम. एम. आर. आर. सिस्टम का उपयोग किया जाता है।
  • उपग्रह संचार प्रणाली: विश्व संचार परिदृश्य में कृत्रिम उपग्रहों के आविष्कार ने पूरे विश्व में एक संचार क्रांति ला दी है। भारत जैसी भौगोलिक संरचना वाले देशों में दूरस्थ एवं दुर्गम क्षेत्रों तक संचार माध्यम हेतु केबल लाइन ले जा पाना एक दुष्कर कार्य है, अत: ऐसी जगहों पर दूरसंचार की सुविधा उपलब्ध कराने में उपग्रह संचार प्रणाली की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
    • उपग्रह के माध्यम से संचार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला उपकरण ′ ट्रांसपोडर ′ है। यह ट्रांसपोंडर ′ विद्युत चुंबकीय तरंगों को प्राप्त करता है तथा उनका प्रसंस्करण करके आवृत्ति परिवर्तन करता है। इसके पश्चात ट्रांसपोंडर का कार्य इन डाउन लिंक तरंगों को पृथ्वी दिशा में संचालित करना है। उल्लेखनीय है कि तकनीकी कारणों से अप लिंक तरंगों की आवृत्ति क्षमता को डाउन लिंक तरंगों की आवृत्ति क्षमता से कम होना चाहिए।

भारत में उपयोग वाले ट्रांसपोंडर तीन प्रकार के हैं:

  • निम्न आवृत्ति का एस ट्रांसपोंडर (S Band Transponder)
  • मध्यम आवृत्ति का सी- ट्रांसपोंडर (C Bank Transponder)
  • उच्च आवृत्ति का केयू-बैंड ट्रांसपोंडर (KU Band Transponder)
    • एक तथा सी-बैंड का उपयोगग सभी भू-स्थैतिक उपग्रह में हुआ है। केयू-ट्रांसपोंडर का उपयोग इनसेट-2 सी से आरंभ हुआ है। केयू बैंड ट्रांसपोंडर का मुख्य उपयोग है, उपग्रह के माध्यम से समाचार एकत्र करना तथा दूरदराज के इलाकों में व्यावसायिक संचार सुविधा उपलब्ध करानी हैं। उपग्रह के माध्यम से अब सचल संचार भी उपलब्ध कराई जाती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सेवा देने के लिए कम ऊँचाई (500 किमी) के उपग्रहों का फुट प्रिंट अर्थात संचार की दृष्टि से उपग्रह दव्ारा घेरा गया क्षेत्र अपेक्षाकृत कम होता है। अत: पूरे विश्व को ऐसी सेवा के दायरे में लाने के लिए बहुत सारे उपग्रहों का उपयोग करना पड़ता है। ऐसी पहली परियोजना इरीडियम है, जो अमेरिकन कंपनी मोटरोला तथा उसकी सहयोगी कंपनी दव्ारा शुरू की गई है।
    • भारत दव्ारा उपग्रह आधारित मोबाइल संचार प्रणाली तथा व्यापारिक संचार प्रणाली की कार्य क्षमता की कार्य में पर्याप्त वृद्धि करने के उद्देश्य से मार्च, 2000 में इनसेट-3बी संचार उपग्रह का प्रक्षेपण किया है। इनसेट-3 बी में उपग्रह प्रसारण और दूरसंचार के लिए विशेष तौर पर कुछ अतिरिक्त उपकरण जैसे-12-बैंड ट्रांसपोंडर 3 केयू-बैंड ट्रांसपोंडर तथा एक मोबाइल ट्रांसपोंडर लगाए गए है।

जलगर्भीय संचार प्रणाली (Underwater Communication System)

  • अंतरराष्ट्रीय संचार क्षेत्र में उपग्रहों पर निर्भरता को कुछ कम करने के उद्देश्य से भारत ने 18 अक्टूबर, 1994 को हिन्द महासागर में प्रथम ‘जलगर्भीय संचार प्रणाली’ की शुरूआत की है। इस प्रणाली से तात्पर्य है समुद्र में जल के नीचे से प्रकाश तंतु केबल (अप्टिकल फाइबर केबल) को बिछाकर एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार प्रणाली का विकास करना। इसके अंतर्गत हिन्द महासागर के समुद्रतल में ऑप्टिकल फाइबर केबल को बिछाकर भारत की प्रथम जलगर्भीय संचार प्रणाली को तैयार किया गया है तथा इसे तीन महादव्ीपों (एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका) के 13 राष्ट्रों को एक साथ जोड़ने वाली विश्व की सबसे लंबी भूगर्भीय संचार प्रणाली से जोड़ा गया हैं। समुद्रतल में 18,190 किमी. तक फैलाव वाली तथा केवल सिंगापुर से मर्सिली (फ्रांस) के मध्य स्थित इस प्रणाली में अत्याधुनिक ऑप्टिकल फाइबर तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इस प्रणाली की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसके दव्ारा सुदूर देशों में आसानी से संदेशों का आदान-प्रदान करने के साथ-साथ कंप्यूटरों के आंकड़ों छाया चित्रों व वीडियों चित्रों का भी आपस में आदान-प्रदान किया जा सकता है। इन अतिरिक्त सुविधाओं के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया एवं पश्चिमी यूरोप-2 (एस. एम. वी. -2) नामक प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
  • जलगर्भीय संचार प्रणाली में प्रयुक्त आधुनिक ऑप्टिकल फाइबर प्रौद्योगिकी के तहत अधिक सूचनाओं का परीक्षण प्रत्येक फाइबर युगल में 5 मेगा बाइट प्रति सेकंड की गति से किया जा सकेगा, जिसकी आयु 25 वर्ष होगी। वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में जलगर्भीय संचार प्रणाली के माध्यम से प्रत्यक्ष डायलिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है। जलगर्भीय संचार प्रणाली का दूरसंचार के क्षेत्र में सस्ती और बहुपयोगी तकनीके होने के कारण सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नये युग की शुरूआत हुई है।

राष्ट्रीय दूरसंचार नीति (National Telecom Policy)

इस बात को महसूस करते हुए कि वर्ष 1994 की राष्ट्रीय दूरसंचार नीति से पर्याप्त सफलता नहीं मिल पाई, भारत सरकार ने वर्ष 1999 में नई दूरसंचार नीति की घोषणा की। इस नीति से यह आशा की गई थी कि इससे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स तथा मीडिया उद्योगों को भी विशेष लाभ होगा। इस नीति के तथ्यों में निम्नांकित प्रमुख हैं:

  • स्पेक्ट्रम प्रबंधन में पारदर्शिता तथा कार्यकुशलता सुनिश्चित करने का प्रयास।
  • देश की प्रतिरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता।
  • भारतीय दूरसंचार कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास।
  • एक निश्चित समयावधि में दूरसंचार क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में समायोजित करने का प्रयास।
  • दूरस्थ, पहाड़ी तथा जनजातीय क्षेत्रों में दूरसंचार की सुविधा का विस्तार।
  • आधुनिक एवं कार्यक्षेम दूरसंचार अवसंरचनाओं का निर्माण।
  • देश में अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहन तथा विश्व स्तरीय विनिर्माण की क्षमता का विकास।

ऊपर लिखे गये उद्देश्यों के संदर्भ में दूरसंचार नीति 1999 ने निम्नलिखित लक्ष्यों का निर्धारण किया है:

  • वर्ष 2002 तक टेलीफोन की मांग पूरा करना तथा 2005 तक टेली घनत्व को 7 तथा 2007 तक 15 करने का लक्ष्य।
  • ग्रामीण टेलीघनत्व को वर्तमान के 0.4 के स्तर से 2010 में 4 तक लाने का प्रयास।
  • वर्ष 2002 तक ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना एवं मीडिया का पर्याप्त विस्तार।
  • वर्ष 2002 तक 2 लाख की जनसंख्या वाले गांवों एवं नगरों तक सूचना सुविधा की उपलब्धता।
  • सभी सेवा दाताओं के लिए दर संरचना को तार्किक बनाने का प्रयास।

वर्ष 2005 में भारत सरकार दूरसंचार के क्षेत्र में विकास को गति प्रदान करने के लिए नई दूरसंचार नीति के निर्धारण का प्रस्ताव किया था। इस संबंध में राष्ट्रीय दूरसंचार नीति के प्रारूप निर्धारण का कार्य किया जा रहा है।

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