Science and Technology: Type and Applications of Super Conductor

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अतिचालकों के प्रकार (Type of Super Conductor)

अत: टाइप-1 तथा टाइप-2 नामक दो प्रकार के अतिचालक होते है। सीसा, पारा एवं टिन टाईप-1 के अतिचालक हैं जबकि CU2O2 (YBCO) तथा Bi2 CaSR2 Cu2O3 टाप II अतिचालक के उदाहरण हैं। यह पाया गया है कि जब टाईप-1 के अतिचालकों एक बाहरी चुंबकीय क्षेत्र के अंतर्गत रखा जाता है जो जब तक पदार्थ अतिचालकता से सामान्य अवस्था में नहीं आता, ऐसे परिवर्तन के न होने तक अभिप्रेरित चुंबकीयता प्रायोगिक चुंबकीयता को रद्द नहीं करती। इस प्रकार के अतिचालक सामान्यत: धातुओं के होते हैं, तथापि सीसा सबसे मजबूत टाईप-1 अतिचालक माना जाता है। वास्तव में टाईप अतिचालकों को हाल खोजा गया है। इन्हें उच्च ताप अतिचालक या Perovskites भी कहते हैं। ये धातु आक्साइड के मिश्रण होते हैं, जो मृतिका के एवं भौतिक गुणों को दर्शातें हैं। इन पदार्थों के व्यवहार एवं गुण प्रभाव को स्पष्ट करते हैं। इन पदार्थों की एक अपूर्ण विशेषता यह है कि इनमें तांबा एवं आक्सीजन आपस में एक विशेष प्रकार के रासायनिक बंध से जुड़े हुए हैं। तांबे एवं सीजन के बीच विशेष रासायनिक बंध पदार्थों को विद्युत उत्पादन करने देता है। उदाहरणत: YBCO को आक्सीजन के प्रति एक अधिक संवेदी पदार्थ माना जाता है और यदि ऑक्सीजन के आयतन में परिवर्तन आता है तो यह अपनी संरचना के परिवर्तित हुए अर्द्धचालक से अतिचालक बन जाता है।

तापमान अतिचालकों की खोज 1986 में Bednor तथा (Mueller) दव्ारा की गई थी। उच्च तापमान अतिचालकों की श्रेणी में O तथा Ti एवं Hg आधारित प्रणालियां शामिल हैं। इनका क्रांतिक तापमान क्रमश: 90K, 120K एवं 160K होता है। इन उच्च अतिचालकों के कुछ प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं:

  • ये मृतिका एवं परिघीय आक्साईड हैंं।
  • कमरे के सामान्य ताप पर ये निकृष्ट धातु हैं।
  • सामान्य धातुओं की अपेक्षा इनमें कुछ आवेश वाहक भी होते हैं।
  • ये उच्च विद्युतीय तथा चुंबकीय गुणों को दर्शाते हैं जो आक्सीजन आयतन के लिए संवेदनशील होते हैं।

अतिचालन अवस्था को क्रांतिक क्षेत्र एवं क्रांतिक धारा घनत्व नामक तीन घटकों दव्ारा परिभाषित किया जाता है। अतिचालन की दशा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि चुंबकीय क्षेत्र, धारा घनत्व एवं ताप को क्रांतिक मान से कम रखा जाए। जहां तक उच्च ताप अतिचालकों के अनुप्रयोग का प्रश्न है, वे चुंबकीय रक्षण उपकरण, चिकित्सीय बिम्बन प्रणाली, अतिचालकता मात्रात्मक व्यतिकरण उपकरण (Superconducting Quantum Interference Device or SQUID) , अवरक्त सेंसर, संकेत संसाधन उपकरण तथा सूक्ष्मतम उपकरणों को तैयार करने में प्रयुक्त होते हैं।

अतिचालकों के अनुप्रयोग (Applications of Super Conductor)

  • अतिचालकों ने तकनीकी एवं औद्योगिक दोनों क्षेत्रों में अनुप्रयुक्त विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र विभिन्न स्तरों पर अतिचालकों के अनुप्रयोग से प्रभावित है। अतिचालकों के आगमन से अधिक संघनित चिपों को विकसित किया जा सकता है। 13 Pico second की तार्किक देरी एवं 9 Pico second के स्विच दबाने की देरी को सफलतापूर्वक प्रदर्शित करना इलेक्ट्रॉनिकी क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। SQUID सूक्ष्म तंरग संसूचक, चुंबकीयमापी आदि उपकरणों में Josephson जंक्शन का प्रयोग करते हुए विकसित किया जा सकता है। घूर्णन के क्षेत्र में अध्ययन अतिचालकों का प्रयोग कर किया जा सकता है। यह घूर्णिका में इकट्‌ठे किए गए द्रव्य में स्थिरता लाता है तथा विभिन्न द्रव्य प्रक्षालन तकनीकों की दक्षता को सफलतापूर्वक प्रदर्शित करता है। इन कनकों में एकत्रित द्रव्य का ऊष्मीय तापानुशीलन शामिल है। शक्ति उपकरण को उच्च ऊष्मीय एवं यांत्रिक दबाव से बचाने के लिए अतिचालक दोष धारा मर्यादक (Superconducting Fault Current Limiters) का प्रयोग होता हैं, जो उच्च शार्ट सर्किट करंट को स्वचालित रूप में उनकी अतिचालकता को सामान्य दशा में परिवर्तित कर सीमित करती है। इस प्रकार यह सामन्य संचालन के दौरान उच्च शार्ट सर्किट क्षमता और किसी प्रकार के दोष की दशा में शार्ट सर्किट करंट को नियंत्रित करती है। इस प्रकार की प्रणाली प्रतिरोधकता की अवधारणा पर आधारित होती है, जिसमें अतिचालक को सीधे उसी रेखा में रखा जाता है जिसे बचाव की आवश्यकता होती है। अतिचालक की अवस्था में परिवर्तन समस्या को कम करता है। इसके बाद लोहे के अभ्यंतर का प्रयोग करते हुए प्रेरक मर्यादक (Inductive Limiter) नामक एक अन्य अवधारणा को भी लागू किया जा सकता है। वर्तमान में अतिचालकों का प्रयोग अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भी हो रहा है। अंतरिक्ष का शून्य घनत्व विशेष मिश्रधातु कण एवं उपयुक्त गोला बनाना संभव करता है। परिवहन के क्षेत्र में द्रवीभूत हीलियम को प्रशीतक के रूप में प्रयोग करते हुए अतिचालक का प्रयोग चुंबकीय रूप से आकाशगामी वाहनों के लिए किया जाता है। अतिचालक चुंबकों का प्रयोग विशेषत: प्रकाशपुंज परिवहन तथा जहां वे स्थिर क्षेत्र से संचालित हुए हो वहां Bubble Chamber Magnet जैसे अनुप्रयोगों के लिए ही हो सकता है। त्वरित कण में चुंबकों का प्रयोग प्रकाशपुंज को मोड़ने एवं फोकस करने वाले कणों के त्वरण तथा कणों के आपसी व्यवहार के विश्लेषण करने के लिए भी किया जाता है। वास्तव में प्रकाशपुंज परिवहन चुंबकों के रूप में प्रयुक्त होने के लिए दव्ध्रुवीय चुंबकों को उपयुक्त पाया गया है। अधिकांश मामलों में इस उद्देश्य से NbTi का प्रयोग अतिचालक पदार्थ के रूप में हुआ है। हाल ही में Kasumov et. el. 2001 ने कहा है कि DNA अणु अनोखी अतिचालकता के गुणों से लैस होता है, जो कार्बन Nanotubes के समान हाेेते है। वैज्ञानिकों ने एक विशेष इलेक्ट्रोड का प्रयोग किया है तथा इलेक्ट्रोडों से 50 की दूरी के पार DNA अणु निक्षेप रखा गया। ऐसी दशा में अतिचालकता को कई स्तरों पर मापा गया। दूसरे अणुओं से अलग DNA ने निम्न ताप पर बढ़ी हुई चालकता को दर्शाया (यह पहले से ही माना जाता था कि सामान्यत: DNA एक अतिचालक नहीं है।) IK से भी कम ताप पर चुंबकीय क्षेत्र की पहचान हेतु अब तक का सर्वाधिक सवंदेनशील उपकरण SQUID है, जो परंपरागत निम्नताप अतिचालकों के लिए विकसित किया गया है जिनमें 4 Kelvin हीलियम द्रव्य के साथ शीतलन की आवश्यकता होती थी। जैव औषधि के क्षेत्र में SQUID का प्रयोग हृदय अथवा रक्त परिपथ समस्याओं के निदान के लिए किया जाता है।
  • इसके अतिरिक्त परंपरागत प्रणाली चक्र में अतिचालकों का प्रयोग करते हुए एक अन्य सुधार Magneto Cardiograms का प्रयोग है। गैर विनाशक परीक्षण के क्षेत्र में भी SQUID का प्रयोग हो रहा है। इस तकनीक का प्रयोग विशेषत: उन संरचनाओं जिनमें धातु शामिल हो, के आंतरिक दोषो एवं घिसावट का पता लगाने के लिए अथवा प्रणाली अथवा X-ray अल्ट्रासाउंड के एक विकल्प के रूप में किया जा सकता है।

भारत में अतिचालकता (Superconductivity in India)

भारत सरकार ने 1987 में अतिचालकता के क्षेत्र में अनुसंधानों की सफलता को सुनिश्चित करने की दृष्टि से कार्यक्रम प्रबंधन बोर्ड (Programme Management Board, PMB) की स्थापना की थी। 1991 से इस प्रकार के अनुसंधान कार्यक्रमों एवं उनके प्रभावी कार्यान्वयन की उन्नति के लिए राष्ट्रीय अतिचालकता कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत कई संस्थानों को एक दूसरे से जोड़ा गया है। इन संस्थानों में परमाणु ऊर्जा विभाग, विभिन्न भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तथा वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद शामिल हैं। राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रथम चरण (1989 - 91) में अतिचालकता से संबंधित 63 कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। दव्तीय चरण 1991 से 1995 तक क्रियान्वित किया गया, जिसमें 6 और कार्यक्रम प्रारंभ किए गए थे। वर्तमान में तीसरा चरण क्रियान्वित किया जा रहा हैं इसके अतिरिक्त, चेन्नई विश्वविद्यालय जैसे कई अन्य विश्वविद्यालय भी अतिचालकता पर अनुसंधान कर रहे है। हांलाकि वे राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ संयोजित हैं। अनुसंधान परियोजनाओं में उच्च ताप अतिचालकता के अनुप्रयोग भी शामिल हैं।

महासागरीय प्रौद्योगिकी (Ocean Technology)

महासागरीय नीति (Ocean Policy)

वर्ष 1982 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सामुद्रिक विधि सम्मेलन (UNCLOS) की सदस्यता ग्रहण की थी, जिसके आधार पर वर्ष 1982 में ही एक राष्ट्रीय महासागरीय नीति का निर्धारण किया गया। भारत दव्ारा स्वदेशी तकनीकियों की सहायता से महासागरीय विशिष्टताओं से संबंधित सूचनाएं एकत्र करने, विभिन्न प्रकार के पदार्थो एवं संसाधनों का विकास करने तथा क्षरण-निरोधक प्रयासों को प्रश्रय देने के उद्देश्य से विशेष कार्य किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय महासागरीय नीति के तथ्यों में निम्नांकित प्रमुख हैं:

  • महासागरीय संसाधनों का उपयोग, नियंत्रण एवं प्रबंधन।
  • नियंत्रण तथा प्रबंधन से संबंधित आधारभूत संरचनाओं का विकास।
  • मछली तथा अन्य महासागरीय जैव संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग।
  • हाईड्रोकार्बन तथा अन्य भारी संचित पदार्थों सहित सभी अजैव संसाधनों का संदोहन।
  • महासागरीय अवशिष्टों में नवीकरणीय संसाधनों से महासागरीय ऊर्जा प्राप्त करने, जल स्तंभों के तापमान में आये अंतर से लाभ प्राप्त करने, ज्वारभाटाओं की ऊंचाई, लवणता की प्रवणता तथा बहुधात्विक पिंडों से लाभ प्राप्त करने का प्रयास।
  • गहरे जल से मछलियों के संदोहन हेतु स्वदेशी तकनीकों के विकास पर विशेष बल।
  • महासागरीय तकनीकों के विकास के लिए ठोस प्रयास।
  • ऊर्जा के नये संसाधनों, खनिजों तथा खाद्य पदार्थों के नये स्रोतों का अन्वेषण।
  • महासागरीय पर्यावरण तथा संसाधनों के निरीक्षण एवं संरक्षण हेतु विशेष प्रयास।
  • विशिष्ट वैधानिक प्रावधानों के प्रभावशाली क्रियान्वयन पर विशेष बल।
  • महासागरीय विकास कार्यक्रमों से संबद्ध कार्यरत एजेंसियों का सुदृढ़ीकरण तथा आवश्यकतानुसार नये एजेंसियों तथा अभिकरणों का गठन।
  • महासागरीय विकास हेतु सूचनाओं का संकलन, परिकूलन तथा प्रसार।

राष्ट्रीय महासागरीय नीति के प्रावधानों के आधार पर भारत में पर्यावरण संबंधी सूचनाओं का संकलन तथा महासागरीय विशिष्टताओं के विश्लेषण का कार्य किया जा रहा है। साथ ही इन विषयों से संबंधित अनुसंधान तथा विकास कार्यक्रमों की कई विस्तृत श्रृंखलाएं भी प्रारंभ की गई है। महासागरीय तरंगों, जलधाराओं, उनके तापमान, दाब, लवणता जैविक गुण तथा पृथ्वी के चुंबकीय एवं गुरूत्वीय गुणों के अध्ययन हेतु विशेष रूप से निरूपित यंत्रों का उपयोग किया जाता है। इनके अतिरिक्त UNCLOS के प्रावधानों के अनुरूप समुद्री प्रदूषण तथा समुद्री जल के कचरा निस्तारण पर नियंत्रण रखने हेतु भी भारत कटिबद्ध है।

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