Science and Technology: World Intellectual Property Organization

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बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights)

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (World Intellectual Property Organization)

संयुक्त राष्ट्र संघ के 17 विशिष्ट एजेंसियों में से एक विश्व बौद्धिक संपदा संगठन है। इसका गठन 1967 में किया गया था। यह संगठन पूरे विश्व में बौद्धिक संपदा संरक्षण को प्रोत्साहित करने के प्रति उत्तरदायी है। इस संगठन का मुख्यालय जेनेवा में है। भारत वाइपो का सक्रिय सदस्य और भागीदार है।

वाइपो कन्वेंशन (WIPO Convention)

यह कन्वेंशन एक बहुपक्षीय संधि है जिसके तहत वाइपो की स्थापना की गई।

  • वाइपो मंच, 2013- वाइपो मंच का सम्मेलन इस वर्ष 24 सितंबर को जेनेवा में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में इस विषय पर चर्चा की गई कि पोषण, आश्रय स्थल और नए उपचार तकनीक के स्तर पर क्या पहल किए जाए ताकि भावी पीढ़ी को असुविधा का सामना न करना पड़े।
  • मराकस संधि 2013- वाइपो के वार्ताकारों ने मराकस (मोरक्को) में एक नवीन संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। इस संधि के तहत अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने महत्वपूर्ण समस्याओं का निदान निकालने की क्षमता भी निर्मित की है। संधि के तहत लेखकों और प्रकाशकों को आश्वस्त किया गया है कि उनकी कृतियों को निर्देशित किए गए लाभर्थियों के अतिरिक्त किसी दूसरे को वितरित नहीं किया जाएगा। संधि में सदस्य देशों से अपेक्षा की गई है कि वे प्रकाशित की गई कृतियों का फिर से निर्मित किए जाने, वितरण करने और उनकी उपलब्धता के लिए राष्ट्रीय कानून बनाएँ।

यह व्यवस्था भी की गई है कि जो संगठन दृष्दिहीनों, मंद दृष्टियुक्त लोगों और मुद्रित सामग्री पढ़ने में असमर्थ लोगों की सहायता करते हैं उन्हें सीमा पर सुलभ पाठ्‌य सामग्रियों के आदान-प्रदान की सुविधा देता है। इस आदान-प्रदान से जहाँ एक ओर उपलब्ध कृतियों की संख्या में बढ़ोतरी होगी वहीं कृतियों की डुप्लीकेट प्रति इस्तेमाल किए जाने में कमी आएगी।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलू (Some Other Important Aspects)

  • भारत ने अमेरिकी पेटेन्ट और ट्रेडमार्क कार्यालय दव्ारा हल्दी तथा बासमती चावल का पेटेंट अधिकार किए जाने और यूरोपीय पेटेंट कार्यालय दव्ारा नीम का पेटेंट किए जाने के विरुद्ध की गई चुनौती में जीत हासिल कर वर्ष 2001 में ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) के निर्माण का प्रोजेक्ट प्रारंभ किया। इस लाइब्रेरी को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी स्वीकृति दी है।
  • इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस (IPA) ने अमेरिका दव्ारा गत अगस्त माह में लगाए गए इस आरोप को खारीज किया है कि भारतीय पेटेंट कानून विभेदकारी है। IPA ने यह भी चुनौती दी है कि अमेरिका इस मामले को विश्व व्यापार संगठन के विवाद निवारण तंत्र के पास ले जा सकता है। IPA के अनुसार वर्ष 2005 में भारत दव्ारा पेटेंट कानून में किए गए संशोधन के बाद अमेरिकी कंपनियों के राजस्व और बाजार पूंजी में बढ़ोतरी हुई है।
  • उल्लेखनीय है कि कुछ अमेरिकी कानूनविदों और दवा उद्योगों ने भारतीय पेटेंट कानून के उपखंड 3 (d) के प्रावधान पर चिंता व्यक्त की है। इसके तहत ज्ञात दवाओं का पेटेंट तब नहीं किया जा सकता है जब तक कि उस दवा का यह पेटेंट अपने प्रभाव के स्तर पर उत्कृष्ट (Superior) न हो।
  • IPA के महासचिव डीजी शाह ने स्पष्ट कहा है कि भारत नवाचार के मूल्य (Value) बौद्धक संपदा की भूमिका और विधि का शासन के महत्व के प्रति स्पष्ट अभिमत रखता है।

देशज रूप से प्रौद्योगिकी विकास (Indigenization of Technological Development)

  • देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास से सरल तात्पर्य है कि किसी क्षेत्र में ऐसी प्रौद्योगिकी का सृजन और विकास किया जाना जो देशज (घरेलू स्तर) स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से निर्मित हो। उदाहरण स्वरूप खेती में उन्नत के लिए भारत में विभिन्न क्षेत्रों में देशज स्तर पर प्रौद्योगिकियाँ विकसित की जा रही हैं।
  • देशज रूप से प्रौद्योगिकी विकास में व्यक्ति के मौलिक चिंतन और शोध का विशेष महत्व रहता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 में जारी की गई फोर्ब्स सूची में भारत के उन देशज वैज्ञानिक आविष्कारकों को शामिल किया गया था, जिन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के बावजूद ऐसी अनूठी तकनीकें व उपकरण खोले हैं, जिन्हें अपनाने से देशभर के लोगों के जीवन में बदलाव आ सके। ध्यातव्य है कि इनमें से ज्यादातर लोगों ने प्राथमिक स्तर की भी शिक्षा नहीं पायी है। यह सत्य है कि भारत ने विज्ञान प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सराहनीय विकास किया है। परन्तु यह भी सत्य है कि व्यावहारिक जीवन में अभी भी भारत विज्ञान प्रौद्योगिकी का वांछित उपयोग नहीं कर सकता है। यहाँ अभी भी भूख और कुपोषण की स्थिति बनी हुई है। किसानों की आत्महत्या और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं।
  • यह देखा जा रहा है कि भारत में विज्ञान-प्रौद्योगिकी विकास के लिए निजीकरण पर विचार किया जा रहा है। इन्हीं कारणों से 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंतिम वर्ष तक वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास पर खर्च की बढ़ाकर दोगुना करने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि निजी स्तर पर उपस्थित औद्योगिक घराने देशज वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने लग जाएं तो कई तकनीकी आविष्कार देश के विकास में सहायक होंगे।
  • फोर्ब्स दव्ारा जारी देशज आविष्कारकों और आविष्कारों की जानकारी से इस बात की पुष्टि हुई हैं कि देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है।
  • सूची में दर्ज मनसुख भाई जगनी ने मोटर साइकिल आधारित ट्रैक्टर विकसित किया है इसकी कीमत 20000 रुपये है। केवल दो लीटर ईंधन से ट्रैक्टर आधा घंटे के भीतर एक एकड़ भूमि जोतने की क्षमता रखता है। इसी प्रकार मनसुख भाई प्रजापति ने मिट्‌टी से बना रेफ्रिजरेटर तैयार किया है। यह फ्रिज उन लोगों के लिए वरदान है जो फ्रिज नहीं खरीद सकते अथवा बिजली की सुविधा से वंचित हैं।
  • इसी तरह मदनलाल कुमावत ने ईंधन की कम खपत वाला थ्रेसर विकसित किया है। यह कई फसलों की थ्रेसिंग करने में सक्षम है।
  • अत: आवश्यक है कि देश में नवाचार के प्रयोगों को प्रोत्साहित किया जाए। इन देशज उपकरणों की मदद से भारत खाद्यान्न क्षेत्र में तो आत्मनिर्भर हो ही सकता है, किसान और ग्रामीण को स्वावलंबी बनाने की दिशा में भी कदम उठाया जा सकता है।
  • प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिक नवाचार के लिए बजट प्रावधान दोगुना करने का तो प्रस्ताव रखा है परन्तु उसमें देशज वैज्ञानिकों को भी प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान देने की शर्त रख दी जाए तो भारत चीन से भी आगे निकल सकता है। विदित हो कि चीन वैज्ञानिक नवाचार का एक हिस्सा देशज वैज्ञानिकों पर भी खर्च करता है और उनके अनुसंधानों की जानकारी मिलने पर उन्हें सीधे विश्वविद्यालयीय अनुसंधानों से जोड़ता है। यही कारण है कि चीन स्थानीय स्तर पर सस्ते उपकरण का आविष्कार करने में लगातार सफलता पाता रहा है।

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