ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 11

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1904-1919 के मध्य शिक्षा का विकास

1901 ई. तक शिक्षा का प्रबंध गृह विभाग के अधीन था। उस वर्ष एक पृथक शिक्षा विभाग का गठन किया गया। 1913 ई. में भारत सरकार ने शिक्षा के संबंध में एक प्रस्ताव पास किया जिसमें इस बात पर बल दिया गया कि प्रत्येक विश्वविद्यालय का क्षेत्र निर्धारित कर लिया जाए। प्रत्येक प्रांत में एक विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए। साथ ही कुछ शिक्षण विश्वविद्यालयों की भी स्थापना की जाए। इसी प्रस्ताव में प्राइमरी और माध्यमिक विद्यालय के लिए अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए अधिक सुविधाएं उपलब्ध करने की बात कही गई। माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए निजी प्रयत्नों के महत्व पर बल दिया गया।

सैडलर आयोग

1917 ई. ने कलकत्ता विश्वविद्यालय कमीशन की नियुक्ति की गई। इसके अध्यक्ष सर माइकेल सैडलर थे। सैडलर ने अपना ध्यान केवल कलकत्ता विश्वविद्यालय तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि माध्यमिक और स्नातकोतर शिक्षा के प्रत्येक पक्ष पर बल दिया। इसकी प्रमुख सिफारिशें, जिन पर कालांतर में कार्य किया गया, अग्रंकित थीं:

  • इंटरमीडिएट (मध्यम) कक्षाओं को विश्वविद्यालयों के नियंत्रण से हटा दिया जाए। एक माध्यमिक बोर्ड (परिषद) बनाया जाए तो इंटरमीडिएट की परीक्षाओं का संचालन करे।

  • भारत सरकार के स्थान पर बंगाल सरकार का कलकत्ता विश्वविद्यालय पर नियंत्रण हो।

  • डिग्री (स्नातक) पाठयक्रम तीन वर्षो का होना चाहिए।

इन सुझावों को भारत सरकार ने शीघ्र ही मान लिया। सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश में एक बोर्ड (परिषद) ऑफ (के) सेकंडरी (माध्यमिक) एजुकेशन (शिक्षा) की स्थापना हुई। 1919 ई. के सुधारों में शिक्षा एक प्रांतीय विषय बन गया और विश्वविद्यालयों के संचालन का कार्य प्रांतीय सरकारों को मिला।

हार्टोग समिति

शिक्षण संस्थाओं की संख्या में अंधाधुंध वृद्धि के कारण शिक्षा के स्तर में गिरावट आने लगी। शिक्षा में हुए विकास के संदर्भ में रिपोर्ट (विवरण) देने के लिये वर्ष 1929 में सर फिलिफ हार्टोग की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्ति की गयी। इस समिति की प्रमुख सिफारिशें निम्न थी-

  • इसमें प्राथमिक शिक्षा की महत्ता पर बल दिया गया लेकिन अनिवार्यता या शीघ्र प्रसार को अनुचित बताया गया।

  • केवल समर्पित विद्यार्थियों को ही उत्तर माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के विद्यालयों में प्रवेश लेना चाहिए। जबकि सामान्य स्तर के विद्यार्थियों को 8वीं कक्षा के पश्चात्‌ व्यावसायिक पाठयक्रमों में दाखिला लेना चाहिए।

  • विश्वविद्यालयीय शिक्षा में सुधार के लिये, विश्वविद्यालयों में प्रवेश ंसबंधी नियम अत्यंत कड़े होने चाहिए।