ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 13

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राधाकृष्णन आयोग

नवंबर, 1948 में राधाकृष्णन आयोग का गठन देश में विश्वविद्यालय शिक्षा के संबंध में रिपोर्ट (विवरण) देने हेतु किया गया। स्वतंत्र भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में इस आयोग की रिपोर्ट का अत्यंत महत्व है। इस आयोग ने निम्न सिफारिशें की थी-

  • विश्वविद्यालय पूर्व 12 वर्ष का अध्ययन होना चाहिए।

  • प्रशासनिक सेवाओं के लिये विश्वविद्यालय की स्नातक उपाधि आवश्यक नहीं होनी चाहिए।

  • शांति निकेतन एवं जामिया मिलिया की तर्ज पर ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना की जानी चाहिए।

  • विश्वविद्यालयों के दव्ारा आयोजित की जाने वाली परीक्षा के स्तर में सुधार लाया जाए तथा विश्वविद्यालय शिक्षा को समवर्ती सूची में सम्मिलित किया जाए।

  • देश में विश्वविद्यालय शिक्षा की देख-रेख के लिये एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन किया जाए।

  • उच्च शिक्षा में अंग्रेजी माध्यम को जल्दबाजी में न हटाया जाए।

  • विश्वविद्यालयों में कम से कम 180 दिनों का अध्ययन अनिवार्य किया जाए।

  • जहां राज्यों की भाषा एवं मातृभाषा का माध्यम समान न हो वहां संघीय भाषा अर्थात राज्यों की भाषा में शिक्षा देने को प्राथमिकता दी जाए। जहां राज्यों की भाषा एवं स्थानीय भाषा समान हो वहां छात्रों को परपंरागत या आधुनिक भारतीय भाषाओं का चयन करना चाहिए।

इन्हीं सिफारिशों के आधार पर 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन किया गया तथा 1956 में संसद दव्ारा कानून बनाकर इसे स्वायत्तशासी निकाये का दर्जा दे दिया गया। इस आयोग का कार्य विश्वविद्यालय शिक्षा की देखरेख करना, विश्वविद्यालयों में शिक्षा एवं शोध संबंधी सुविधाओं के स्तर की जांच करना तथा उनमें समन्वय स्थापित करना है। सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के लिये पर्याप्त धन की व्यवस्था करती है। तदुपरांत आयोग देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों को धन आवंटित करने का सुझाव देता है तथा विश्वविद्यालय शिक्षा से संबंधित विभिन्न विकास योजनाओं को क्रियान्वित करता है।