ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 15

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मुसलमानों का अंग्रेजी शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण

मुसलमानों का अंग्रेजी शिक्षा के प्रति आकर्षण कम था। उन्हें अंग्रेजी शिक्षा से इस्लाम धर्म के प्रति अरुचि पैदा होने की आशंका रहती थी तथा मुसलमान विद्यार्थी कुछ विषयों-गणित तथा अंग्रेजी में पिछड़ जाते थे। 1871 ई. में भारत सरकार ने विभिन्न प्रांतीय सरकारों से पूछा कि मुसलमानों का शिक्षा में पिछड़ापन किस प्रकार दूर किया जा सकता है? सभी प्रांतीय सरकारों ने उत्तर दिया कि जनसंख्या के अनुपात में मुसलमान अधिक शिक्षित थे। पर इतना अवश्य था कि अंग्रेजी शिक्षा में हिन्दुओं की अपेक्षा पिछड़े हुए थे। सर सैयद अहमद मुसलमानों की सांसारिक प्रतिष्ठा को बढ़ाना चाहते थे। उनके अनुसार इसका एकमात्र साधन उच्च अंग्रेजी शिक्षा थी। इसलिए वह चाहते थे कि मुसलमान अधिकाधिक संख्या में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करें। उन्होंने मुसलमानों के लिए अलीगढ़ में मोहमडन एंग्लो-ओरिएंटल (पूरबीवासी) महाविद्यालय की स्थापना की और मुसलमानों की प्रगति के लिए इसे एकमात्र साधन बताया।

सर सैयद अहमद ने इस बात पर अत्यधिक बल दिया कि मुसलमान अपनी शिक्षा अलीगढ़ महाविद्यालय से प्राप्त करे। वह एक विशिष्ट प्रकार का मुस्लिम शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहते थे जो मुस्लिम संप्रदाय के हितों को बढ़ाने की भावना से प्रेरित हो। वह यह भी चाहते थे कि कुलीन वर्ग के मुसलमान युवक अलीगढ़ में ही अपनी शिक्षा प्राप्त करें। उनका लक्ष्य अंग्रेजों और मुसलमानों में सामाजिक संपर्क स्थापित करना था। यह संपर्क कुलीन मुसलमानों और अंग्रेजों में समानता के आधार पर सरलता से बढ़ सकता था। कुलीन शिक्षित वर्ग मुस्लिम समाज का भी नेतृत्व कर सकता था। अलीगढ़ महाविद्यालय में मुसलमानों की शिक्षा पर बल देने में सर सैयद का वास्तविक मंतव्य भारत के विभिन्न भागों के कुलीन मुसलमान परिवारों के लड़कों को अलीगढ़ में शिक्षा देना था जिससे अलीगढ़ महाविद्यालय का प्रभाव सारे भारत में फैल सके।

अलीगढ़ महाविद्यालय को मुसलमानों का शिक्षा केन्द्र बनाने के लिए सर सैयद ने विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों के लिए उच्च विद्यालय खोलने का विरोध भी किया। वह समझते थे कि मुस्लिम संप्रदाय आर्थिक दृष्टि से कमजोर था। इसलिए उसे अपने साधनों को विभिन्न स्थानों पर फैलाने के बजाए एक स्थान पर ही लगाना चाहिए। यह अलीगढ़ महाविद्यालय के लिए धन उपलब्ध कराने में सहायक तो अवश्य हुआ लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों में जो उत्साह शिक्षा के प्रति जागृत हुआ था, वह शीघ्र ही शिथिल पड़ गया। उस समय बहुत से विद्यालय केवल विद्यार्थियों की फीस (शुल्क) और सरकारी अनुदान के सहारे चलते थे। यदि अधिक विद्यालय उस समय स्थापित हो जाते तो वे कालांतर में मुसलमानों की शिक्षा संबंधी आवश्यकता को पूरा कर सकते थे।