ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 16

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समाचार-पत्रों का विकास एवं नीतियां

19वीं सदी के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता समाचार पत्रों का विकास है। 18वीं सदी के अंत तक इंग्लैंड में भी समाचार पत्रों का महत्व तथा प्रभाव अधिक नहीं था। भारत में सबसे पहले छापेखाने की स्थापना 1550 ई. में पुर्तगालियों ने की थी, लेकिन उसमें केवल धार्मिक पुस्तकें ही छपती थीं। 18वीं सदी में कई समाचार पत्र प्रकाशित होने आरंभ हो गए। 1780 ई. में जे.ए. व्हिक्की ने ’बंगाल गजट’ प्रकाशित करना आरंभ किया।

भारतीयों दव्ारा पहला अंग्रेजी समाचार पत्र 1816 में कलकत्ता से प्रकाशित किया गया। गंगाधर भट्‌टाचार्य ने ’बंगाल गजट’ नाम से एक साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित करना आरंभ किया। इसकी प्रतियां अब उपलब्ध नहीं है न ही इसके संपादक के विषय में अधिक ज्ञान है।

19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में भारतीय समाचार-पत्र सामान्यत: सरकार की आलोचना कम करते थे। इनकी वितरण संख्या में कम थी। जमींदार वर्ग इस ओर ध्यान नहीं देता था। साधारण जनता राजनीतिक विषयों में अनभिज्ञ थी। प्रशासक वर्ग इन अखबारों की परवाह नहीं करता था क्योंकि वह जानता था कि इसका जनमत पर प्रभाव कम था। फारसी और अन्य भारतीय भाषायी समाचार-पत्रों में प्रजातीय विभेद, धर्म हस्तक्षेप अथवा अंग्रेजी न्यायालयों में प्रचलित अन्याय पर अवश्य कुछ तीव्र आलोचना होती थी, लेकिन राजनीतिक विषयों पर चर्चा कम थी। इस अर्द्धशताब्दी में सामाजिक और धार्मिक तथा सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय प्रेस और जनमत के विकास में योगदान दिया।

19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ’टाइम्स ऑफ (का) इंडिया (भारत)’ (जिसमें बांबे टाइम्स, बांबे स्टैंडर्ड तथा दो अन्य को मिलाया गया) बंबई से 1861 ई. में प्रकाशित होना आरंभ हुआ। कलकत्ता से ’स्टेटसमैन (राजनेता)’ इंग्लिशमैन (अंग्रेज)’ और ’फ्रेंड (मित्र) ऑफ इंडिया (भारत)’, मद्रास से ’मद्रास मेल’, इलाहाबाद से ’पायनियर’, लाहौर से ’सिविल (नागरिक) एंड (और) ’मिलिटरी (सैन्य) गजट’ प्रकाशित होते थे। इन एंग्लो इंडियन (भारतीय) पत्रों में भी ’इंग्लिशमैन’ विशेषकर रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी था।

भारतीयों दव्ारा अंग्रेजी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में विभिन्न समाचार-पत्रों का प्रकाशन आरंभ हुआ। इन समाचार-पत्रों में भी एक नया दृष्टिकोण देखने को मिलता है। राष्ट्रीय तथा राजनीतिक प्रश्नों पर चर्चा तथा प्रशासनिक नीतियों की आलोचना पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र होने लगी। आरंभ में बांग्लाभाषी समाचार-पत्रों में ’अमृत बाजार पत्रिका’ (जो 1878 ई. में अंग्रेजी में निकलने लगा) ’बंगवासी’ ’सजीवनी’ प्रमुख थे। वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (अधिनियम) के पश्चात्‌ मद्रास प्रांत में अंग्रेजी में ’हिन्दू’ पत्र आरंभ किया गया। यह आरंभ में साप्ताहिक था, लेकिन 1889 ई. में दैनिक पत्र बन गया। 1881 ई. में बंबई प्रांत में दो समाचार-पत्र (जो बाद में बहुत प्रसिद्ध हुए) ’केसरी’ मराठी भाषा में और ’मराठा’ अंग्रेजी भाषा में आरंभ हुए। इन पत्रों के संचालन का श्रेय बालगंगाधर तिलक और उनके कुछ मित्रों को है। आरंभ में अगरकर ने -’केसरी’ और केलकर ने ’मराठा’ का संपादन किया लेकिन बाद में इन दोनों पत्रों के संपादन तथा स्वामित्व का उत्तरदायित्व तिलक पर आ पड़ा।

1880 ई. के पश्चात्‌ भारतीय समाचार-पत्रों का कार्य उसी भांति था जैसा संसदीय पद्धति में विरोधी दल का होता है अर्थात्‌ अंग्रेजी सरकार की नीतियों का निरन्तर मूल्यांकन करते रहना। यह कार्य समाचार-पत्रों पर इसलिए और अधिक पड़ गया था क्योंकि लेजिस्लेटिव (विधायी) कौंसिलों (परिषद) के भारतीय सदस्यों को बहुत कम अधिकार थे। सार्वजनिक खर्च में कमी, भारतीयों की उच्च प्रशासनिक पदों पर नियुक्त करना, न्याय प्रशासन में सुधार, प्रजातीय विभेद और कुछ प्रमुख प्रश्न थे जिन पर चर्चा होती थी। इंडियन (भारतीय) नेशनल (राष्ट्रीय) कांग्रेस की स्थापना के पश्चात्‌ राजनीतिक शिक्षा का प्रसार इन पत्रों का मुख्य लक्ष्य हो गया। कांग्रेस की ’नरम’ नीति तक ही सीमित न रहकर बहुत से पत्र सरकार की कड़ी आलोचना करते थे। इस आलोचनात्मक दृष्टिकोण को विकसित करने में एंग्लो इंडियन समाचार-पत्रों का काफी योगदान था। वे कांग्रेस की नीति की तीव्र आलोचना करते थे।

भारतीय-पत्रों में धन के निष्कासन और अंग्रेजों दव्ारा प्रजातीय विभेद की नीति की आलोचना की जाती थी। ये दोनों विषय ऐसे थे जिनसे अंग्रेजों के वायदे, उनकी न्यायप्रियता और देश के आर्थिक विकास के तर्क खोखले पड़ जाते थे। इसलिए 19वीं सदी के अंत तक आते-आते अंग्रेज प्रशासक भारतीय समाचार-पत्रों से काफी असंतुष्ट हो गए। डफरिन (लिबरल दल का प्रतिनिध) और कर्जन (कंजर्वेटिव दल का प्रतिनिधि) दोनों ही भारतीय समाचार-पत्रों की आलोचना से क्रुद्ध थे। बंगाल के समाचार-पत्रों में अधिक कटु भाषा का प्रयोग होता था लेकिन बंबई प्रदेश के प्रभावशाली समाचार-पत्रों ’केसरी’, मराठा आदि में राजनीति प्रचार अधिक होता था। और भाषा अपेक्षाकृत कम कटु होती थी। इसी प्रकार मद्रास और उत्तर-पश्चिमी प्रांत के समाचार-पत्रों में भी भाषा कम आलोचनात्मक और कटु होती थी।

भारतीय समाचार-पत्रों के विकास में 1905 ई. के बंगाल विभाजन का काफी योगदान हैं। इस घटना का समाचार-पत्रों ने काफी विरोध किया किन्तु फिर भी कर्जन ने प्रांत का विभाजन कर दिया। इस प्रकार सरकार और समाचार-पत्रों में स्पष्ट संघर्ष आरंभ हुआ। इस संघर्ष ने यह चुनौती प्रस्तुत की कि समाचार-पत्र किस सीमा तक जनमत का प्रतिनिधित्व करते थे। 1911 ई. में विभाजन रद्द करने से पत्रों में इस प्रकार का आत्मविश्वास पैदा हुआ। इस घटना को पत्रकारिता और पत्रों के प्रभावों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

1919 ई. के पश्चात्‌ महात्मा गांधी का नेतृत्व भारतीय रंगमंच पर अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया। राष्ट्रीय आंदोलन उत्तरोत्तर लोकप्रिय होता गया इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन और समाचार-पत्रों में परस्पर समर्थक और सहायक का संबंध होता गया। समाचार-पत्रों ने न केवल राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न प्रेरणाओं को प्रेरित किया बल्कि स्वयं भी राष्ट्रीय आंदोलन की घटनाओं से प्रेरणा ली। अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना जागृत करने तथा अंग्रेजी शोषण की व्यापक चर्चा फैलाने में प्रेस (मुद्रण यंत्र) का विशेष योगदान रहा। यह स्वाभाविक ही था कि अलग-अलग समाचार-पत्र विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के प्रभाव में रहे। अंग्रेजी साम्राज्यवादी प्रशासकों के दृष्टिकोण भी समाचार-पत्रों के विचारों से बहुत प्रभावित रहे।

इस काल में एंग्लो-इंडियन (भारतीय) समाचार-पत्रों का दृष्टिकोण उभरकर अधिक स्पष्ट हुआ। अंग्रेजी साम्राज्य के समर्थ अब केवल वे ही रह गए। इन समाचार-पत्रों के समर्थन में कुछ आंशिक अंतर होता था लेकिन कोई मौलिक भेद नहीं था। कलकत्ता से निकलने वाला ’स्टेट्‌समैन’ (राजनेता) बंबई से ’टाइम्स ऑफ (का) इंडिया (भारत)’ लाहौर से सिविल (नागरिक) एंड (और) मिलिटरी (सैन्य) गजट’ आदि ऐसे प्रमुख अखबार थे।

अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय समाचार-पत्रों को कुचलने के लिए विभिन्न संपादकों को जेल भेजा अथवा उनके समाचार-पत्रों को बंद करवा दिया। 1918-19 ई. की घटनाओं ने जनरल डायर और जलियावाला बाग-भारतीय और एंग्लो-इंडियन पत्रों के अंतर को भली-भांति स्पष्ट कर दिया। पंजाब सरकार के प्रेस पर अत्यधिक नियंत्रण होते हुए भी जलियांबाला बाग और जनता पर अत्याचार की कुछ सूचना भारतीय अखबारों में छप जाती थी। इसके विपरीत अंग्रेजी अखबारों ने जनरल डायर की प्रशंसा की और उसे निर्दोष घोषित कर दिया। ’बंबई क्रॉनिकल’ ’अमृत बाजार पत्रिका’ ट्रिब्यून’ ’हिन्दू’ आदि कितने ही अखबारों की जमानत जब्त कर ली गई। कई संपादकों को जेल में भी डाल दिया गया।

1920 ई. के पश्चात्‌ राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों ने गांधी जी के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय संघर्ष का समर्थन किया। दूसरी ओर अंग्रेजी सरकार ने एंग्लों इंडियन, मुस्लिम तथा अन्य सांप्रदायिक और रूढ़िवादी समाचार-पत्रों को प्रश्रय देना आरंभ किया तथा दलित एवं पिछड़े वर्गो, मुसलमानों, गैर ब्राह्यणों तथा अन्य अल्पसंख्यक वर्गों की मांग को अत्यधिक बढ़ावा दिया। सरकार ने अखबारों की स्वतंत्र विचारधारा को नियंत्रित करने के विभिन्न प्रयत्न किए। एक ओर विचारों की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए, दूसरी ओर सरकारी प्रभाव का प्रयोग करके गुप्त रूप से राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों के संपादकों की नीतियों को बदलने का प्रयत्न किया गया। इस समय दो नए साप्ताहिक पत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली बने। गुजराती में ’नवजीवन’ तथा अंग्रेजी में ’यंग (युवा) इंडिया (भारत)’। दोनों का संपादन तथा संचालन महात्मा गांधी करते थे। कुछ पत्रों ने गांधी जी के कार्यक्रम की आलोचना की लेकिन अन्य ने उनका समर्थन किया। 1923 ई. में ’हिन्दुस्तान टाइम्स’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। 1923 ई. में ही मद्रास में ’स्वराज्य’ पत्र आरंभ किया गया जो गांधी जी का समर्थक था। 1940-47 ई. के मध्य कई उच्च कोटि के राष्ट्रीय समाचार-पत्र प्रकाशित हुए।

समाचार-पत्रों का आधुनिक भारत के इतिहास में राष्ट्रीय विचारों के फैलाने तथा अंग्रेजी साम्रज्यवादी नीति की वास्तविकता को स्पष्ट करने में उल्लेखनीय योगदान रहा। यह भी सही है कि कुछ सांपद्रायिक और सकींर्ण दृष्टिकोण के समाचार-पत्र प्रकाशित होते थे लेकिन उनकी वास्तविकता बड़ी सरलता से स्स्पष्ट हो जाती थी और उनका प्रभाव बहुत कम होता था।