ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 20

Download PDF of This Page (Size: 193K)

इन भारतीय रियासतों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंधों को निम्न अवस्थाओं में विश्लेषित किया जा सकता है।

भारतीय रियासतों से समानता का चरण (1740-1765)

यह चरण आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिदव्ंदिता से प्रारंभ हुआ, जब डूप्ले ने भारतीय रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की नीति अपनायी। अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिये अंग्रेजों ने भी डुप्ले की नीति का अनुसरण किया तथा अपनी राजनीतिक सत्ता को सिद्ध करने के लिये अर्काट का घेरा (1751) डाल दिया। प्लासी के युद्ध के पश्चात्‌ उसने बंगाल के नवाबों को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया। 1765 में मुगल बादशाह आलम दव्तीय से बंगाल, बिहार, एवं उड़ीसा की दीवानी का अधिकार प्राप्त होने पर कंपनी की स्थिति में अत्यधिक वृद्धि हुयी। इस अधिकार से कंपनी की स्थिति, राजस्व वसूल करने वाले अन्य मुगल गवर्नरों (राज्यपालों) के समान हो गयी तथा अब उसे अन्य भारतीय रियासतों के समान समानता का अधिकार प्राप्त हो गया।

घेरे की नीति (1765-1813)

वारेन हेस्टिंग्स ने मैसूर तथा मराठों के साथ युद्ध अपने राज्य के चारों ओर मध्य राज्य बनाने का प्रयत्न किया। कंपनी को इस समय मुख्य भय मराठों एवं अफगान आक्रांताओं के आक्रमण से था (इसलिए कंपनी ने बंगाल की रक्षा के निमित्त अवध की रक्षा व्यवस्था का दायित्व संभाल लिया) वेलेजली की सहायक संधि की नीति घेरे की नीति का ही विस्तार था, जिसका उद्देश्य भारतीय रियासतों को अपनी रक्षा के लिये कंपनी पर निर्भर करने के लिये बाध्य करना था। हैदराबाद, अवध एवं मैसूर जैसी विशाल रियासतों ने वेलेजनी की सहायक संधि को स्वीकार किया, जिससे अंग्रेजी प्रभुसत्ता की स्थापना की दिशा में काफी प्रगति हुई।

अधीनस्थ पार्थक्य की नीति (1813-1857)

वारेन हेस्टिंग्स की नीतियों के फलस्वरूप अंग्रेजो की साम्राज्यवादी भावनाएं जाग उठी तथा सर्वश्रेष्ठता का सिद्धांत विकसित होने लगा। अब अंग्रेजों दव्ारा भारतीय रियासतों से संबंधों का आधार अधीनस्थ सहयोग तथा कंपनी की सर्वश्रेष्ठता को स्वीकार करने की नीति थी न कि पारंपरिक समानता पर आधारित मैत्रीपूर्ण संबंध। इस नयी नीति के तहत रियासतों ने अपनी समस्त बाह्य संप्रभुता कंपनी के अधीन कर दी। हालांकि अपने आंतरिक मामलों में वे पूर्ण स्वतंत्र थीं। प्रारंभ में ब्रिटिश रेजीडेन्ट (निवासी) कंपनी (संघ), एवं भारतीय रियासतों के मध्य संपर्क सूत्र की भूमिका निभाता था। किन्तु धीरे-धीरे रियासतों के आंतरिक प्रशासन में उसके प्रभाव में वृद्धि होने लगी।

1833 के चार्टर (राज पत्र) एक्ट (अधिनियम) से कंपनी की समस्त व्यापारिक शक्तियां समाप्त हो गयीं तथा अब वह पूर्णरूपेण एक राजनीतिक शक्ति के रूप में कार्य करने लगी। रियासतों के प्रति कंपनी की नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह किया गया कि उत्तराधिकार के मसले पर अब उसे कंपनी की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक था। कालांतर में कंपनी ने उनके मंत्रियों तथा अधिकारियों की नियुक्ति में भी हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया।

1834 में कंपनी के निर्देशकों ने रियासतों के विलय संबंधी एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए, जिसके अनुसार ’अब कभी और जहां कही संभव हो’ रियासतों का कंपनी में विलय कर लिया जाए। लार्ड डलहौजी के विलय के सिद्धांत दव्ारा लगभग आधा दर्जन रियासतें अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर ली गयी, जिनमें सतारा एवं नागपुर जैसी बड़ी रियासतें भी सम्मिलित थीं। इन सभी का सम्मिश्रण ही कंपनी की सर्वश्रेष्ठता थी।

अधीनस्थ संघ की नीति (1857-1935)

1858 में ब्रिटिश ताज दव्ारा भारत का शासन कंपनी से अपने हाथों में लेने पर भारतीय रियासतों तथा सरकार के संबंधों की परिभाषा अधिक स्पष्ट हो गयी। 1857 के विद्रोह में भारतीय रियासतों की कंपनी के प्रति राजभक्ति एवं निष्ठा तथा भविष्य में किसी राजनीतिक आंदोलन को रोकने में उसकी शक्ति के उपयोग की संभावना के मद्देनजर रियासतों के विलय की नीति त्याग दी गयी। अब नयी नीति, शासक को कुशासन के लिये दंडित करने या आवश्यकता पड़े तो अपदस्थ करने की थी न कि पुरी रियासत को विलय करने की। 1858 के पश्चात्‌ का मुगल शासन भी समाप्त हो गया। अब ताज ही भारत की सर्वोच्च एवं असंदिग्ध शक्ति के रूप में भारत में उपस्थित था। अत: सभी उत्तराधिकारियों को ताज की स्वीकृति लेना आवश्यक था। अब गद्दी पर शासक का पैतृक अधिकार नहीं रह गया था, अपितु अब यह सर्वश्रेष्ठ शक्ति से एक उपहार के रूप में शासकों को मिलती थी। क्योंकि भारतीय राजाओं और ताज के बीच बराबरी की भावना सदा के लिये समाप्त हो गयी थी। 1776 में महारानी विक्टोरिया (भारत की महारानी) दव्ारा कैसर-ए-हिन्द की उपाधि धारण करने के बाद तो इस बात पर मुहर लग गयी कि अब भारतीय राज्यों की संप्रभुता समाप्त हो चुकी है तथा ब्रिटिश ताज ही भारत में सर्वश्रेष्ठ है। सर्वश्रेष्ठ अब न केवल एक ऐतिहासिक सत्य था अपितु एक कानूनी सिद्धांत था। अब सरकार को रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार भी मिल गया था, चाहे वह हस्तक्षेप महाराजा के हितों की रक्षा के लिये हो अथवा उसकी प्रजा के हित के लिये या अंग्रेजों के हितों के लिए।

आधुनिक संचार व्यवस्था, रेलवे, सड़के, टेलीग्राफ (विद्युत यंत्र), नहरें, पोस्ट (डाक), कार्यालय, प्रेस (मुद्रण यंत्र) तथा भारतीय जनमत ने भी अंग्रेजों को भारतीय रियासतों के मामलों में हस्तक्षेप करने तथा उनके अधिकार को कम करने में सहायक परिस्थितियों की भूमिका निभायी। भारत सरकार इन रियासतों के बाहरी और विदेशी संबंधों में भी पूर्ण नियंत्रण रखती थी। सरकार इनकी ओर से स्वयं युद्ध की घोषणा कर सकती थी, मध्यस्थता कर सकती थी एवं शांति संधि का प्रस्ताव पारित कर सकती थी। इस संबंध में बटलर आयोग ने 1927 में कहा कि ’अंतरराष्ट्रीय मामलों में रियासतों के प्रदेश अंग्रेजी भारत के प्रदेश हैं और रियासतों के नागरिक अंग्रेजी नागरिकों के समान हैं।’

बराबर के संघ की नीति (1935-1947)

1935 के भारत सरकार अधिनियम में, प्रस्तावित समस्त भारतीय संघ की संघीय विधानसभा में भारतीय नरेंद्रों को 375 में से 125 स्थान दिये गए तथा राज्य विधान परिषद के 260 स्थानों में से 104 स्थान उनके लिये सुरक्षित किए गए। योजना के अनुसार यह संघ तब अस्तित्व में आना था, जब परिषद् में आधे स्थानों वाली रियासतें तथा कम से कम आधी जनसंख्या प्रस्तावित संघ में सम्मिलित होने की स्वीकृति दें।’