ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 4

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स्थानीय स्वशासन का विकास

आरंभ में स्वशासन संबंधी कार्य कुछ कामचलाऊ संस्थाओं के माध्यम से किए जा रहे थे। सन्‌ 1816 और 1819 में बंगाल में अधिनियम बनाए गए जिसके अंतर्गत स्वशासन को नौघाटों के रख रखाव, सड़कों के निर्माण एवं इसकी मरम्मत, पुलों एवं नालियों के निर्माण हेतु कर वसूलने का अधिकार दिया गया।

लॉर्ड मेयो ने 1870 में स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधार लाये। शिक्षा, सफाई, चिकित्सा सहायतार्थ तथा जन कार्य हेतु कोप के प्रबन्धन एवं देख-रेख के लिए अलग-अलग समिति के अंतर्गत सरकारी तथा गैर-सरकारी सदस्यों के अलावा एक सरकारी अध्यक्ष की नियुक्ति की व्यवस्था की गई। परन्तु, यह व्यवस्था सरकारी सदस्यों के प्रभुत्व में कार्य कर रही थी। लॉर्ड रिपन ने बाद में खुले व स्वतंत्र रूप से स्थानीय स्वशासन का रूप प्रस्तुत किया। इसके अंतर्गत 1882 के महत्वपूर्ण प्रस्ताव के तहत संपूर्ण देश के लिए स्थानीय परिषदों के तंत्र की व्यवस्था की गई, जिसमें गैर-सरकारी सदस्यों का बाहुल्य था। इन गैर-सरकारी सदस्यों का निर्वाचन होता था, जो सरकार की सहमति से अपने बीच से ही एक अध्यक्ष का चुनाव करते थे। प्रत्येक परिषद को एक छोटे क्षेत्र जैसे अनुमंडल या तालुके का क्षेत्राधिकार सौंपा गया। लापरवाही और दोष के मामलों में कुछ प्रावधानों के अंतर्गत सरकार इन परिषदों पर अपना नियंत्रण रखने का अधिकार रखती थी। दुर्भाग्य से नौकरशाही के प्रतिरोध के कारण इन प्रावधानों का कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं किया जा सकता।

सन्‌ 1908 में रॉयल (राजसी) कमीशन (आयोग) ने विकेन्द्रीकरण के आधार पर ग्राम पंचायतों तथा उप-जिला परिषदों के विकास पर जोर डाला। इस आयोग की सिफारिश के आधार पर ग्राम पंचायतों को अर्द्धन्यायिक तथा प्रबंधन से संबंधित अधिकार सौंपने की व्यवस्था की गई तथा पंचायतों को प्रबंधन से संबंधित खर्च के वहन के लिए कर लगाने के अधिकार दिए गए। यह व्यवस्था 1915 तक लागू रही जब लार्ड हार्डिंग ने स्थानीय संस्थाओं को निर्वाचित के बदले मनोनीत अध्यक्ष को ज्यादा उत्तरदायी बनाने का प्रस्ताव किया। 1919 के मान्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार ने स्थानीय स्वशासन को परिवर्तनीय विषय के रूप में रखा और मंत्रियों को नीतियों के व्यावहारिक क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी बनाया गया। परन्तु कोष के अभाव में भारतीय मंत्री ठीक तरह से कार्य नहीं कर सके क्योंकि उस समय ’वित्त’ एक कार्यकारी पार्षद के नियंत्रणाधीन ’सुरक्षित’ विषय के अंतर्गत था।

1935 के भारतीय शासन अधिनियम के प्रान्तीय स्वायत्तता के प्रावधान के दव्ारा स्थानीय संस्थाओं के विकास को प्रेरक शक्ति मिली। लोकप्रिय मंत्रालयों को वित्त के नियंत्रण का अधिकार दिया गया तो स्थानीय स्वशासन के अंगों को समुचित कोष सुनिश्चित कराते थे। व्यावहारिक तौर पर सभी प्रांतों में नए अधिनियम बनाए गए जिसमें स्थानीय स्वशासन के अंगों को ज्यादा जिम्मेवारी देने का प्रावधान था। लेकिन इन अंगों को भी धनाभाव का सामना करना पड़ता था।