ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 5

Download PDF of This Page (Size: 159K)

ब्रिटिश सैन्य नीति

1857 के पश्चात्‌ अंग्रेजों ने सेना का व्यवस्थित पुनर्गठन प्रारंभ किया। अंग्रेजों दव्ारा सेना के पुनर्गठन का मुख्य उद्देश्य 1857 के विद्रोह जैसी किसी घटना की पुनरावृत्ति को रोकना था। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार इस क्षेत्र में विश्व की अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों यथा रूस, जर्मनी, फ्रांस आदि से भी अपने उपनिवेशों की रक्षा के निमित भारतीय सेना का उपयोग करना चाहती थी। सरकार की नीति यह थी कि वह सेना की भारतीय शाखा का उपयोग एशिया एवं अफ्रीका में अपने उपनिवेशों के विस्तार में करेगी तथा सेना की ब्रिटिश शाखा का उपयोग भारत में अंग्रेजी शासन की पकड़ मजबूत करने तथा उसे स्थायित्व प्रदान करने में किया जाएगा।

सरकार की इस नीति के तहत सेना की भारतीय शाखा पर यूरोपीय शाखा की सर्वोच्चता सुनिश्चित की गयी। इस संबंध में 1859 एवं 1879 में गठित आयोगों ने सुझाव दिया कि अंग्रेजी सेना की संख्या कम से कम एक-तिहाई अवश्य होनी चाहिए। 1857 से पहले अंग्रेजी सेना की संख्या केवल 14 प्रतिशत थी। यूरोपीय सैनिकों की संख्या, जो 1857 से पूर्व 45 हजार थी अब बढ़ाकर 65 हजार कर दी गयी तथा भारतीय सैनिकों की संख्या 2 लाख 38 हजार से घटाकर 1 लाख 40 हजार कर दी गयी। बंगाल में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात 1:2 रखा गया, जबकि बंबई तथा म्रदास में यह अनुपात 1:3 का सुनिश्चित किया गया। संवदेनशील भौगोलिक क्षेत्रों तथा सेना के महत्वपूर्ण विभागों तथा तोपखाने, सिगनल्स (संकेत) तथा सशस्त्र बलों में कड़ाई से यूरोपियनों का एकाधिकार स्थापित किया गया। यहां तक कि सन्‌ 1900 तक भारतीय सैनिकों को दी जाने वाली बंदूके, यूरोपियनों की तुलना में घटिया किस्म की होती थी। तथा सेना के किसी महत्वपूर्ण विभाग में भारतीयों को कोई महत्वपूर्ण दायित्व नहीं सौपा जाता था। यह स्थिति दव्तीय विश्व युद्ध तक बनी रही। सेना में ऑफिसर (अधिकारी) रैंक (श्रेणी) के पद पर किसी भारतीय को नियुक्त किए जाने की अनुमति नहीं थी तथा 1914 तक सेन्य का सर्वोच्च पद, जहां कोई भारतीय पहुंच सकता था वह सूबेदार का था। 1918 के पश्चात्‌ ही भारतीयों को सेना में कमीशन (आयोग) रैंक (श्रेणी) दिया जाना प्रारंभ हुआ। 1926 के अंत में भारतीय सैंडहर्स्ट आयोग ने अनुमान लगाया कि 1952 तक सेना में अधिकारियों का केवल 50 प्रतिशत भारतीयकरण ही हो सकेगा।

संतुलन एवं प्रतिसंतुलन नीति के आधार पर सेना की भारतीय शाखा का पुनर्गठन किया गया। 1879 के सेना आयोग ने इस बात पर बल दिया कि सेना में भारतीयों को भारतीयों से संतुलित किया जाए तथा यूरोपियनों की सर्वोच्चता स्थापित की जाए। सन्‌ 1887 -1892 तक सेना के कमांडर (प्रधान सेनापति)-इन चीफ (मुखिया) रहे लार्ड रार्बट्‌स के काल में एक नयी विचारधारा का विकास हुआ। इसके अनुसार लड़ा जातियों एवं गैर-लड़ाकू जातियों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। इससे विशिष्ट समुदायों से सेना को अच्छी फौजी प्राप्त हो सके। कालांतर में इसी विचारधारा के तहत सिक्ख, गोरखा एवं पठानों को सेना में भर्ती किया गया तथा इनका प्रयोग भारतीयों दव्ारा किए जाने वाले विद्रोहों तथा राष्ट्रवादी आंदोलन स्वयमेव दुर्बल हो जाएगा।

1857 के विद्रोह में वे स्थान, जहां के सैनिकों ने विद्रोहियों का साथ दिया था, गैर लड़ाकू जाति के घोषित कर दिये गए। इन स्थानों में अवध, बिहार, मध्य भारत, एवं दक्षिण भारत प्रमुख थे। इससे भी अधिक, सेना की सभी रेजीमेंट्‌स (सेना) में जातीय एवं सांप्रदायिक कंपनी (संघ) का गठन किया गया तथा भारतीय शाखा में संतुलन के लिये विभिन्न सामाजिक जातीय तबको से युवाओं को सेना में भर्ती किया गया। सैनिकों में सांप्रदायिक, जातीय दलीय तथा क्षेत्रीय भावनाओं को उभारा गया। जिससे राष्ट्रवाद के विकास को रोका जा सकता था भारत सचिव चार्ल्स वुड ने घोषणा की कि उसकी इच्छा है कि सैनिकों में विद्रोह एवं प्रतिदव्ंदितापूर्ण भावनाओं का विकास किया जाए, जिससे आवश्यकता पड़ने पर सिक्ख, हिन्दू, गोरखा इत्यादि सभी एक दूसरे पर बिना किसी हिचकिचाहट के गोली चला सकते है।

ईस्ट (पूर्व) इंडिया (भारत) कंपनी (संघ) की सेना भी अंग्रेजी सेना में सम्मिलित कर ली गयी तथा यूरोपीय पदाति एवं घुड़सवार ब्रिटेन के पदातियों घुड़सवारों में सम्मिलित कर लिये गए। अंग्रेजी सेना के सैनिक तथा पदाधिकारी, भारत में सेवा करने तथा अनुभव प्राप्त करने के उद्देश्य से नियमित रूप से भारत भेजे जाने लगे। बंबई, मद्रास, तथा बंगाल के तोपखाने, शाही तोपखाने एवं शाही इंजीनियर्स (अभियंता) में सम्मिलित किये गए। पंजाब नेपाल तथा उत्तर पश्चिमी प्रांतों की जातियों को अच्छा फौजी मानकर उन्हें बहुसंख्या में सेना में भर्ती किया गया।

सेना के इस पुनर्गठन से रक्षा व्यय बहुत अधिक बढ़ गया, जिसका बोझ भारतीय जनता पर डाल दिया गया। यह कार्य वस्तुत: और लोलुपता के लिये था, भारत की रक्षा के लिए नहीं।

अंतत: सेना को समाज एवं देश की मुख्य धारा से बिल्कुल अलग कर देने का प्रयास किया गया जिससे देशप्रेम बिलकुल जागृत न हो सके। इसके लिये राष्ट्रवादी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं जर्नल्स से उन्हें दूर कर दिया गया तथा सैनिकों को उनकी गतिविधियों तक ही सीमित कर देने के उपाय किए गए।

इस प्रकार ब्रिटिश भारतीय सेना साम्राज्यवाद की रक्षा करने वाली एक मशीन (यंत्र) बनकर रह गयी।