ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 7

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चार्ल्स वुड डिस्पैच

शिक्षा नीति के विकास में एक महत्वपूर्ण कार्य 1854 ई. के ’वुड डिस्पैच’ ने किया। सर चार्ल्स वुड उस समय बोर्ड (परिषद) ऑफ (के) कंट्रोल (नियंत्रण) का अध्यक्ष था। उस समय इंग्लैंड में ईसाई मिशनरियों का पक्ष काफी प्रभावशाली था। मिशनरियों दव्ारा बंगाल तथा अन्य प्रांतों में विभिन्न विद्यालय तथा महाविद्यालय का संचालन होता था। वे शिक्षा के प्रसार से भारतवासियों को अधिक संख्या में ईसाई बनाने की कल्पना करते थे। उन्हें इस कार्य के लिए धन की आवश्यकता थी। लंदन से विभिन्न ईसाई संस्थाएं धन भेजती थीं किन्तु वह अपर्याप्त होता था। इसलिए वे सरकार से निश्चित सहायता चाहते थे। सर चार्ल्स वुड ईसाई मिशनरियों के अतिरिक्त उच्च शिक्षा के समर्थकों को भी संतुष्ट करना चाहता था। इस डिस्पैच ने मुख्य रूप से निम्न व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयत्न किया।

  • शिक्षा प्रशासन के लिए एक पृथक विभाग की स्थापना की जाए। फलस्वरूप विभिन्न प्रांतों में डायरेक्टर (निर्देशक), पब्लिक (जनता) इंस्ट्रक्शन (नियम) की नियुक्ति की गई। उनकी सहायता के लिए विभिन्न इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए। इस प्रकार शिक्षा प्रसार प्रशासकों के अधीन हो गया।

  • तीनों प्रेसिडेंसियों (राष्ट्रपतियों) के मुख्य नगरों में विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए। इन विश्वविद्यालयों की स्थापना 1858 ई. में की गई। इन विश्वविद्यालयों को लंदन विश्वविद्यालय के आधार पर स्थापित करने का प्रयत्न किया गया। लंदन विश्वविद्यालय मुख्यत: परीक्षाए संचालित करता था। ये विश्वविद्यालय ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज के आधार पर स्थापित नहीं किए गए। डलहौजी ने इन विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों (प्राचार्यो) की नियुक्ति का विरोध किया था।

  • प्रशिक्षित अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण महाविद्यालय की स्थापना की जाए। नए माध्यमिक महाविद्यालय की स्थापना की जाए। सरकारी हाई (उच्च) विद्यालय और महाविद्यालयों को आवश्यकतानुसार बढ़ाया जाए।

  • प्रारंभिक शिक्षा और वर्नाक्यूलर विद्यालय पर अधिक ध्यान दिया जाए। स्त्री शिक्षा पर भी ध्यान देने की सिफारिश की गई।

  • शिक्षा संस्थाओं को ग्रांट-इन एड (अनुदान पद्धति) के आधार पर सहायकता दी जाए। इस सिद्धांत के लागू करने से धार्मिक भेदभाव समाप्त करने में मदद मिली। इसका स्पष्ट परिणाम यह हुआ कि ईसाई मिशनरियों के विद्यालय को अब सरकारी सहायता सरलता से उपलब्ध हो गई।

इस डिस्पैच (प्रेषण) के आधार पर कार्य 1858 ई. के पश्चात्‌ ही संभव हो सका क्योंकि 1855-56 ई. में डलहौजी अन्य राजनीतिक कार्यों में लगा रहा और 1857-58 ई. में व्यापक जन विप्लव के फलस्वरूप सामान्य प्रशासन में शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया जा सका।

1850 के पश्चात्‌ अधिक ध्यान माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के विकास पर दिया गया। 1870 ई. में वित्तीय विकेन्द्रीकरण के पश्चात्‌ शिक्षा का खर्च प्रांतों को हस्तांतरित कर दिया गया। इससे शिक्षा प्रसार के लिए उपलब्ध साधनों में कमी आ गई। कुछ प्रांतों में शिक्षांं पर कर लगाए गए अथवा सरकारी अनुदान प्राप्त करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयत्नों को प्रोत्साहन दिया गया। प्राइमरी (मुख्य) शिक्षा की ओर कम ध्यान दिए जाने का एक कारण यह भी था कि 1859 ई. में भारत सचिव ने सरकारी अनुदान को केवल माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के लिए ही निर्धारित कर दिया। वर्नाक्यूलर शिक्षा के लिए सरकारी अनुदान को अनुपयुक्त बताया गया। इसलिए प्राइमरी (मुख्य) और वर्नाक्यूलर शिक्षा विभिन्न प्रांतों में बहुत कम विकसित हुई।

प्राइमरी (मुख्य) शिक्षा के पिछड़े रहने के कुछ अन्य कारण थे। साधारण जनता के पास धन की कमी थी और गांवों तथा छोटे नगरों में श्रमिकों तथा कृषकों को अपने बालकों को छोटी आयु से ही काम पर भेजना पड़ता था। परंपरागत शिक्षा का महत्व भी अधिक समझा जाता था, इसलिए कुछ अक्षर ज्ञान ही पर्याप्त होता था। 1870 ई. के पश्चात्‌ कुछ उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय आई.सी.एस. की परीक्षाओं में सफल होने लगे। फलत: अंग्रेज सरकार ने एक ओर परीक्षाओं में बैठने की अधिकतम आयु कम कर दी, दूसरी ओर उच्च शिक्षा की अपेक्षा प्रारंभिक शिक्षा पर भी अधिक ध्यान देना आरंभ किया। सरकार का प्रारंभिक शिक्षा के अविकसित होने पर चिंता व्यक्त करना एक ओर जहां व्यर्थ की व्याख्या करना था। दूसरी ओर सरकार के उच्च शिक्षा पर खर्च किए जाने वाले धन को कम करने के मंतव्य को भी स्पष्ट करता था। लिटन के समय में दिल्ली महाविद्यालय को बंद कर दिया गया तथा यूरोपियन और एंग्लो-इंडियन (भारतीय) बालकों की शिक्षा के लिए अधिक धन खर्च किया गया। संयोगवश 1870 ई. में लिबरल मंत्रिमंडल ने अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा अधिनियम भी पास कर दिया। रिपन (जिसका 1870 ई. अधिनियम में योगदान उल्लेखनीय था) के भारत आगमन के पश्चात्‌ लिबरल विचारधारा और साम्राज्यवादियों की महत्वाकांक्षा एक ही दिशा में कार्य करने लगी।