राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति ब्रिटेन की प्रतिक्रिया (Britain's Reaction to the National Movement) Part 1

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भूमिका

1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। इसकी स्थापना में कई अंग्रेज अधिकारी भी शामिल थे। ए. ओ. ह्‌यूम की भूमिका तो इसमें सबसे अधिक थी। वे एक सेवानिवृत आई.सी.एस. अधिकारी थे। भारत राष्ट्रवादियों और ब्रिटिश सरकार के बीच ह्‌यूम ने एक कड़ी का काम किया। राष्ट्रीय कांग्रेस के आरंभिक दिनों के कार्यकलाप से ब्रिटिश सरकार काफी संतुष्ट थी। इस काल में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के प्रति कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया तथा संवैधानिक तरीकाेे के दव्ारा भारतीयों की मांगों की पूर्ति की चेष्टा की। इस प्रकार कांग्रेस ने आरंभिक दिनों में संविधान के दायरे में रहकर ही अपने उद्देश्यों की पूर्ति का प्रयास किया।

पर 1887 के बाद कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश नीति में एकाएक परिवर्तन आया। ब्रिटिश सरकार को अब यह लगने लगा था कि कांग्रेस राष्ट्रवादी मांगों की ओर बढ़ रही है और इस कारण वह जनता में अधिक लोकप्रिय होती जा रही है। डफरिन ने अब यह कहना शुरू किया कि कांग्रेस का झुकाव राजद्रोह की ओर है। यह एक ऐसे अल्पमत का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे सत्ता नहीं सौंपी जा सकती। ब्रिटिश सरकार की ओर से यह प्रचार किया जाने लगा कि कांग्रेस भारतीयों का सिर्फ नाम मात्र का प्रतिनिधित्व करती है।

1889 में कांग्रेस का अधिवेशन इलाहाबाद में हुआ। इस अधिवेशन में सरकार की ओर से काफी बाधाएं पहुंचाई गई। अधिवेशन में भााग लेनेवालों पर कड़ी निगरानी रखी गई। सरकारी कर्मचारियों को कांग्रेस के कार्यक्रम से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं रखने का आदेश दिया गया।

मुसलमानों को यह कहकर कांग्रेस से अलग रखने की कोशिश की गई कि कांग्रेस हिन्दुओं का संगठन है। सैयद अहमद और बनारस के राजा चैत सिंह ने मिलकर कांग्रेस के विरोध के लिए पैट्रियोटिक (देशभक्त) सोसायटी (समाज) की स्थापना की। सैयद अहमद खां दव्ारा चलाए गए आंदोलन के कारण मुसलमान गुमराह हुए और उनमें पृथकतावादी भावनाएं पनपने लगीं। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना भी हो गई।