ब्रिटिश प्रशासक एवं उनकी नीतियाँ (British Administrators and Their Policies) Part 4

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लार्ड इरविन

एडवर्ड फ्रेडरिक लिंडले वुड के नाम से जाने वाले व्यक्ति की ख्याति बैरेन इरविन के रूप में हुई। वह 1930 के दशक में ब्रिटेन की कंजरवेटिव (अपरिवर्तनवादी) पार्टी (दल) का एक प्रमुख नेता था। दव्तीय विश्व युद्ध काल में उसे तुष्टिकरण की नीति का प्रमुख प्रवक्ता माना जाता है। इस दरम्यान वह मंत्रिमंडल के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहा। 1938 के म्युनिख समझौते के समय वह ब्रिटेन का विदेश सचिव था। अप्रैल, 1926 में वह भारत का वायसराय बना। उसने वाशिंगटन में ब्रिटिश राजदूत के रूप में भी कार्य किया।

वह अपने पिता की तरह धार्मिक प्रवृत्ति का था। विंस्टन चर्चिल ने उसे होली फैक्स का नाम दिया। उसे एक समर्पित एंग्लो-कैथेलिक के रूप में जाना जाता है। ऑक्सफोर्ड के एटन तथा क्राइस्ट चर्च में उसने शिक्षा ग्रहण की।

1926 में लिंडले वुड भारत का वायसराय बनकर आया। भारत में इरविन का काल राजनीतिक उथल-पुथल का काल माना जाता है। भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देने की जांच के लिए गठित साइमन कमीशन (आयोग) में किसी भी भारतीय को शामिल न किए जाने के कारण हिंसा भड़क उठी। साइमन कमीशन के भारत आने पर सर्वत्र उसका विरोध किया गया। साइमन कमीशन के रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद भारत में सर्वत्र निराशा व्याप्त थी। फलत: भारतीयों ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन का फैसला किया। गांधी जी दव्ारा 12 मार्च, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किया गया। लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद चरमपंथी नेताओं ने केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंका। 1929 में प्रसिद्ध लाहौर षडयंत्र की घटना हुई एवं जतिनदास की 64 दिन के भूख-हड़ताल के बाद जेल में ही मृत्यु हो गई।

इरविन के प्रयासों से गांधी जी और इरविन के बीच एक समझौता हुआ। इरविन ने गांधी जी की कई मांगे स्वीकार कर ली। गांधी जी भी सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेने के लिए सहमत हो गए। गांधी जी कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में दव्तीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए। यद्यपि सम्मेलन सफल नहीं हुआ, पर इरविन अपनी सरकार का विश्वास प्राप्त करने में सफल रहा। गांधी-इरविन समझौते के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्थगन इरविन की कूटनीतिक विजय के रूप में देखा जाता है तो सविनय अवज्ञा आंदोलन को उसके प्रारंभिक दिनों में ही न कुचल देना इरविन की कूटनीतिक विफलता मानी जाती है।