कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 1 for Competitive Exams

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पूंजीपति वर्ग के प्रति कांग्रेस की नीति

1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद से वह लगातार अपने जनाधार का विस्तार करती रही। इस क्रम में वह समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का प्रयास कर रही थीं। कांग्रेस की स्थापना में भी पूंजीपति वर्ग ने अपना सहयोग प्रदान किया था। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कांग्रेस की स्थापना पूंजीपति वर्ग के संरक्षण के लिए हुआ था। लेकिन यह दृष्टिकोण प्रामाणिक तौर पर आज स्वीकार नहीं किया जाता। फिर भी इससे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि कांग्रेस और पूंजीपतियों के हित परस्पर संबद्ध थे।

कांग्रेस के आरंभिक नेताओं ने भारत के आर्थिक शोषण की तीव्र भर्त्सना की एवं भारत की समृद्धि के लिए देशी उद्योगों की स्थापना एवं प्रोत्साहन की मांग की। इन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी कंपनियों (संघ) एवं पूंजी के वर्चस्व की आलोचना की। वे एक ऐसे आर्थिक तंत्र की स्थापना के पक्षधर थे जिसमें देशी पूंजी एवं उद्योगों को बढ़ावा मिलें। आरंभिक राष्ट्रवादियों की यह नीति प्रत्यक्षत: एवं परोक्षत: भारतीय पूंजी एवं पूंजीपति वर्ग को प्रोत्साहित करता था। कांग्रेस के स्वदेशी के नारे ने भी देशी उत्पादन पद्धति को बढ़ावा दिया।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारत में देशी उद्योगों की स्थापना एवं उत्पादन को बढ़ावा मिला। इसका मुख्य कारण यह था कि युद्धकाल के दौरान देश में आयातित वस्तुओं की कमी हो गई। साथ ही युद्ध सामग्री की मांग में वृद्धि के कारण ब्रिटिश सरकार ने भारतीय उद्योगों में उत्पादन को बढ़ावा दिया। पर युद्ध की समाप्ति के बाद स्थिति बदल गई। अब विदेशी वस्तुओं का आयात पुन: आरंभ हुआ। इससे देशी उद्योगों को संकट का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने इन उद्योगों के लिए संरक्षण की मांग की ताकि वे विदेशी वस्तुओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।

भारत में देशीय पूंजी के विकास एवं उद्योगों की स्थापना के साथ श्रमिकों का एक वर्ग भी उभर कर सामने आया। इससे पूंजीपति एवं श्रमिक वर्ग के बीच टकराव आरंभ हुआ। कांग्रेस के अनेक नेता श्रमिकों की न्यायोचित मांगों का समर्थन करते थे। पर उन्होंने पूंजीपति वर्ग के खिलाफ सीधे आंदोलन में इन श्रमिकों का साथ नहीं दिया। इसका मुख्य कारण यह था कि कांग्रेस राष्ट्रीय आंदोलन में पूंजीपति एवं श्रमिक दोनों वर्गो का समर्थन प्राप्त करना चाहती थी।

गांधी जी यद्यपि कुटीर उद्योग के समर्थक थे पर उन्होंने देशी पूंजी दव्ारा स्थापित बड़े उद्योगों का पक्ष लिया। गांधी के स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता के नारे ने देशी पूंजी से स्थापित उद्योगों को प्रश्रय दिया। गांधी जी की कई भारतीय उद्योगपतियों से घनिष्ठ मित्रता थी। कई औद्योगिक घराने कांग्रेस को सक्रिय आर्थिक सहयोग देते थे। गांधी जी ने इरविन के सामने जो 11 सूत्री मांग रखी थी, उनमें चार का संबंध उद्योगपति वर्ग से था। इनमें सबसे प्रमुख और विवादित था-तटकर की कटौती।

जवाहरलाल नेहरू यद्यपि समाजवादी विचारों से प्रभावित थे, फिर भी उन्होंने समग्र राष्ट्रीयकरण का समर्थन नहीं किया। वे एक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए पूंजी का समर्थन करते थे। यही कारण है कि देश की आजादी के बाद जब वे प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने बड़े उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहित किया एवं मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया।

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