कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 2

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मजदूर वर्ग के प्रति कांग्रेस की नीति

भारत में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण के साथ ही मजदूर वर्ग का उदय हुआ। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में मजदूरों के शोषण तथा पूंजीपति एवं श्रमिकों के हितों के परस्पर टकराव ने कांग्रेस के सामने एक दुविधा खड़ी कर दी। भारत में जिन नवीन उद्योगों की स्थापना हुई उनमें विदेशी के साथ देशी पूंजी भी लगी हुई थी। कांग्रेस विदेशी पूंजी के बढ़ते प्रभाव का तो विरोध करती थी पर आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए देशी पूंजी का समर्थन भी करती थी। कांग्रेस के सामने एक दुविधा यह भी थी कि राष्ट्रीय आंदोलन में वह पूंजीपति एवं श्रमिक दोनों वर्गों का समर्थन प्राप्त करना चाहती थीं। ऐसे में किसी एक के हितों का समर्थन दूसरे के हितों के विरुद्ध होता। फलत: कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सूझबूझ भरा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। कांग्रेस श्रमिकों के उचित मांगो, यथा कार्य के घंटो में कमी, साप्ताहिक छुट्‌टी एवं कारखाने में कार्य करते वक्त हुई घटनाओं का हर्जाना का तो समर्थन करती थी पर श्रमिकों के ऐसे किसी मांग का समर्थन नहीं करती थी, जिससे उत्पादन की प्रक्रिया एवं संपत्ति को क्षति हो।

कांग्रेस के नेता श्रमिकों के संगठन एवं आंदोलन से आरंभ से ही जुड़े रहे। श्रमिकों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। 1908 में बंबई में सूती मिल (कारखाना) में हड़ताल हुई। यह हड़ताल तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में किया गया था। एनी बेसेंट के नजदीकी सहायक बी.पी. वाडिया ने अप्रैल 1918 में मद्रास श्रमिक संघ की स्थापना की। यह भारत का पहला ट्रेड (व्यापार) यूनियन (संघ) था। 1920 ई. में गांधी जी ने मजदूर महाजन संघ की स्थापना की जिसमें मालिकों एवं श्रमिकों के बीच शांतिपूर्ण सहयोग स्थापित करने की बात कही गई थी। गांधी जी अहमदाबाद के मिल मजदूरों की मांग के समर्थन में हड़ताल में शामिल भी हुए थे। अंतत: मजदूरों की मांग स्वीकार कर ली गई।

अखिल भारतीय स्तर पर श्रमिकों के संघ बनाने की कोशिश का आरंभ राष्ट्रीय नेताओं दव्ारा ही हुआ। 1920 में बंबई में अखिल भारतीय ट्रेड (व्यापार) यूनियन (संघ) की स्थापना की गई। कांग्रेस के नेता लाला लाजपत राय ने इसके प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता की। इसमें मोती लाल नेहरू, एनी बेसेंट, सी. एफ. एन्डूज एवं बी.पी. वाडिया जैसे नेता शामिल हुए।

1937 में राज्यों में कांग्रेस की सरकार की स्थापना से श्रमिकों की प्रेरणा एवं आकांक्षा को प्रोत्साहन मिला। 1936 से 39 के बीच ट्रेड (व्यापार) यूनियन (संघ) की संख्या में दोगुनी वृद्धि हुई। 1944 में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की।