कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 3

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किसानों के प्रति कांग्रेस की नीति

भारत में ब्रिटिश सरकार ने एक नवीन प्रकार की कृषि पद्धति का आरंभ किया। इसके अंतर्गत भूमि का स्वामित्व जमींदार नामक एक मध्यस्थ वर्ग को सौंप दिया गया। परंपरागत भूमि व्यवस्था में किसान ही भूमि का स्वामी समझा जाता था। इस प्रकार नई व्यवस्था में किसान अपनी भूमि से वंचित कर दिया गया। उनसे भूमि पर कृषि कार्य के बदले लगान वसूल किया जाता था। लगान की दर काफी अधिक होती थी। जमींदार किसानों से बेगार भी कराता था। किसानों को भूमि पर खास किस्म की फसल उपजाने के लिए भी दबाव डाला जाता था। किसान इस व्यवस्था से खासे नाराज थे और वे शोषण से मुक्ति चाहते थे। वे जमींदारी व्यवस्था के भी खिलाफ थे।

किसानों ने इस शोषण के खिलाफ संघर्ष भी किया। बंगाल के स्थानीय कांग्रेसी नेता किसानों की इन मांगों से सहानुभूति रखते थे। पर राष्ट्रीय स्तर के नेता इनमें अधिक रुचि नहीं रखते थे। 1917 में पहली बार गांधी के नेतृत्व में चंपारण में निलहे किसानों का आंदोलन हुआ। सरकार को किसानों की मांग माननी पड़ी एवं तीन कठिया भूमि व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। किसानों से वसूल किए जाने वाले कर में भी एक चौथाई की कमी कर दी गई। इस आंदोलन से किसान राष्ट्रीय आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ गए।

कांग्रेस ने किसान सभाओं के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। होमरूल लीग की गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश में किसान सभा का गठन हुआ। 1918 में गौरी शंकर मिश्र तथा इंद्र नारायण दव्वेदी ने उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किया। इस कार्य में मदन मोहन मालवीय ने सराहनीय योगदान किया।

असहयोग आंदोलन के दौरान जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के कई गांवों का दौरा किया। उन्होंने किसानों की समस्याओं को भी करीब से देखा। विश्व व्यापी आर्थिक मंदी एवं बढ़ते कृषक शोषण के खिलाफ किसानों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया। इस आंदोलन ने देश के बहुत बड़े हिस्से में कर और लगान न देने के अभियान का रूप ले लिया।

1936 में कांग्रेस एवं किसान सभा का सम्मेलन साथ-साथ लखनऊ में हुआ। लखनऊ में ही अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ। कांग्रेस के कई नेता किसानों के सम्मेलन में शामिल हुए। किसान सभा ने पहली बार इसी सम्मेलन में जमींदारी उन्मूलन का प्रस्ताव पास किया। कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया। 1937 के चुनावी घोषणा पत्र में कांग्रेस ने किसानों की कई मांंगों को शामिल कर लिया। इस चरण में किसानों की जो तात्कालिक मांगे थी- उनमें कर में कटौती, सामंतों की गैर कानूनी वसूलियां, बेगार की समाप्ति, ऋण के बोझ में कमी तथा गैर कानूनी तरीके से ली गई भूमि की वापसी आदि प्रमुख थी। 1937-39 के कांग्रेसी शासन के दौरान किसान आंदोलन अपने उत्कर्ष पर पहुँच गया। एक तो इस काल में आंदोलन के लिए नागरिक स्वतंत्रता अधिक मिली। दूसरे, कांग्रेसी सरकारों ने कृषि कानून में सुधार के लिए कई ठोस कदम भी उठाए।