कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 4

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देसी रियासतों के प्रति कांग्रेस की नीति

जहाँ तक कांग्रेस का देसी रियासतों के आंदोलन में हस्तक्षेप का प्रश्न है, यह 1920 के नागपुर अधिवेशन से संभव हो सका। जिसमें रियासत के शासकों को यह कहा गया कि वे अविलंब वहाँ पर उत्तरदायी सरकार का गठन कर साथ ही रियासतों की जनता को कांग्रेस संगठन में सदस्य बनने की अनुमति दे दे। परन्तु इसके साथ ही यह भी कहा गया कि वे कांग्रेस के नाम पर रियासत में किसी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों का प्रारंभ नहीं कर सकते। ऐसा उन्होंने निम्न कारण से कहा-

  • ब्रिटिश भारत एवं रियासतों की स्थिति में अंतर था।

  • रियासतों के मध्य भी स्थिति अलग-अलग थी।

  • वहांँ की जनता दलित व पिछड़ी थी।

  • कानूनी तौर पर रियासतें स्वाधीन थीं।

रियासत की जनता को कांग्रेस के नाम पर किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं करने देने का उद्देश्य यह था कि वह स्वयं संघर्ष के लिये संगठित हो। 1927 में कांग्रेस ने 1920 वाली बात को ही दुहराया एवं 1929 के लाहौर अधिवेशन में नेहरू ने स्पष्ट कहा कि देसी रियासतें अब शेष भारत से अलग नहीं रह सकतीं एवं इन रियासतों के तकदीर का फैसला सिर्फ वहाँ की जनता ही कर सकती है। बाद के वर्षों में कांग्रेस ने राजाओं से रियासतों में मौलिक अधिकारों की बहाली की मांग की।

1935 के अधिनियम का रियासतों की जनता पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा। इस अधिनियम के अनुसार एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की व्यवस्था की गई, जिसमें रजवाड़ों को 23 प्रतिशत तक सीट (स्थान) आवंटित किया गया। इसका प्रभाव यह पड़ा कि पहले तो रजवाड़ों की जनता को लगा कि वे भारत के अंग है, एवं दूसरा यह कि कांग्रेस अंग्रेजों की इस चाल को भांप गए कि वे राष्ट्रीय ताकतों को तोड़ना चाहते हैं।

1937 के चुनावों के पश्चात्‌ कांग्रेस कई प्रांतों में सत्तासीन हुई, अब वह महज एक दल नहीं थी, अपितु शासक वर्ग भी थी, जो अपने शासित प्रांतों के पड़ोसी रियासतों पर प्रभाव डाल सकती थी। इसके शासन में आने का प्रभाव भी पड़ा। रियासतें नवीन सुधारों से अनुप्राणित हो, संघर्ष के लिये कसमकस हो उठी। अनेक रियासतों में जहाँ कोई संगठन नहीं था, बड़ी संख्या में प्रजामंडलों का गठन हुआ। हैदराबाद, मैसूर, ट्रावणकोर, जयपुर, कश्मीर आदि रियासतों में जन संघर्ष बृहत पैमाने पर प्रारंभ हुआ। इन संघर्षो में नेतृत्व देने वाले कतिपय नाम थे-शेख अब्दुल्ला, यू.एन. ढेबर, जमनालाल बजाज आदि।

अब इन नये घटनाक्रमों से प्रभावित होकर कांग्रेस ने भी अपना रूख बदला। 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में यह मानने वाली कांग्रेस कि रियासतों में किसी प्रकार का राजनीतिक आंदोलन कांग्रेस के नाम पर न हो, 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में इस बात को स्वीकार कर लिया कि अब कांग्रेस के नाम पर भी रियासतों में आंदोलन हो सकते हैं। इस नीति में परिवर्तन के मुख्य कारण निम्न थे-

  • अब रियासत की जनता संघर्ष पर उतारू थी।

  • वह राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुकी थी।

  • सोशलिस्टों (समाजवादी) एवं वामपंथियों का भी दबाव था।

  • अब रियासतों एवं ब्रिटिश भारत के मध्य के सारे अवरोध टूट चूके थे। गांधी के अनुसार अब कांग्रेस भी काफी सशक्त हो चुकी थी। ब्रिटिश शासन से अब डरने की बात नहीं थी।

1939 में ही लुधियाना के ऑल (पूरे) इंडिया (भारत) पीपुल्स (लोग) कांग्रेस में जवाहार लाल को अध्यक्ष चुना गया एवं ब्रिटिश भारत और देसी रियासतों में छिड़े आंदोलन अब खुले रूप में एक दूसरे से जुड़ गए।

सन्‌ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव देशव्यापी था। गांधी ने कहा था कि यह आंदोलन सिर्फ ब्रिटिश भारत का नही, बल्कि संपूर्ण भारत का आंदोलन है एवं सारे भारतवासी इसमें शरीक होंगे। फलत: रियासतों ने भी इस आंदोलन में अपना तीव्र तेवर दिखाया।

जब दव्तीय विश्व युद्ध एवं भारत छोड़ो आंदोलन के पश्चात्‌ सता हस्तांतरण की बात होने लगी तो विभिन्न रियासतों के भारत में विलय पर जोरदार संघर्ष प्रारंभ हुआ। इधर अंग्रेजों ने अपना पेंच लगा दिया एवं रियासतों को स्वाधीन रहने का अधिकार दे दिया गया, फलत: समस्या विकट हो गई।

स्वतंत्रता के पश्चात्‌ कई रियासतो के राजाओं ने अपनी तथा जनता की इच्छा के अनुसार भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये, परन्तु कुछ रियासतों ने स्वाधीन रहने की इच्छा प्रकट की, जैसे हैदराबाद, ट्रावणकोर, जूनागढ़, कश्मीर आदि। सभी रियासतें भारत में मिल गई। केवल हैदराबाद ने मिलने की इच्छा प्रकट नहीं की। 13 सितंबर, 1948 ई. को भारतीय सेना वहां प्रवेश कर गई और उसे भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया। भारतीय सेना का हैदराबाद रियासत की जनता ने जबरदस्त स्वागत किया।