कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 5

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क्रांतिकारियों के प्रति नीति

कांग्रेस आरंभ से ही एक उदारवादी और संविधानवादी पार्टी (दल) मानी जाती थी। वह संविधान के दायरे में रहकर ही लोकतांत्रिक सुधारों की मांग करती थी। कांग्रेस क्रांतिकारी बदलावों की तुलना में क्रमिक बदलाव में विश्वास करती थी। लोकतांत्रिक सुधारों के लिए वह सरकार के साथ सहयोग भी करती थी। आरंभिक राष्ट्रवादी ब्रिटिश सरकार को देश के हित में मानते थे जबकि क्रांतिकारी राष्ट्रवादी ब्रिटिश सरकार के विरोधी थे। वे उसे हिंसक तरीके अपना कर उखाड़ फेंकना चाहते थे। इस प्रकार विचारधारा एवं रणनीति के स्तर पर दोनों में काफी मतभेद थे। आरंभिक कांग्रेसी नेता इसी कारण क्रांतिकारियों से दूरी बनाए रखते थे। क्रांतिकारी नेता भी कांग्रेस की सुधारों की मांग की नीति को भिक्षावृत्ति कहकर उसकी खिल्ली उड़ाया करते थे। हालांकि लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक एवं विपीन चन्द्र पाल जैसे नेता उग्र विचारों के प्रति सहानुभूति रखते थे।

गांधी जैसे नेता के राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश के कारण कांग्रेस के आंदोलन ने पूरी तरह से अहिंसक रूप ले लिया। गांधी दक्षिण अफ्रीका में अपने अहिंसक आंदोलन की सफलता से काफी उत्साहित थे। वे इसका प्रयोग भारत में भी करना चाहते थे। उनका मानना था कि हिंसक आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार उससे भी बड़ी हिंसा का सहारा लेगी। ऐसी स्थिति में सरकारी हिंसा का मुकाबला आंदोलनकारी नहीं कर पाएंगे। गांधी जी जनता की प्रवृत्ति को भी अच्छी तरह समझते थे। वे मानते थे कि हिंसक आंदोलन में भारत की आम जनता, किसान एवं मजदूर तथा महिलाएं शामिल नहीं हो पाएंगे, ऐसे में कोई भी आंदोलन प्रभावी नहीं हो सकता। गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन को व्यापकता प्रदान करने के उद्देश्य से ही अहिंसक मार्ग को चुना। यही कारण है कि गांधी के आह्‌वान पर असहयोग आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। किसान, मजदूर, बुद्धिजीवी, महिलाएं एवं युवा भारी संख्या में इस आंदोलन में शरीक हुए। इसी बीच चौरी चौरा की घटना घटी। यहां जनता की उग्र भीड़ ने थाने में आग लगा दी एवं 21 पुलिस कर्मियों को जिंदा जला दिया। गांधी जी ने इस घटना के बाद आंदोलन को वापस ले लिया। गांधी जी के कई सहयोगियों ने इनके फैसले की आलोचना की। पर गांधी ने इसे सही निर्णय बताया। दरअसल गांधी जी आंदोलन को अहिंसक तरीके से चलाना चाहते थे। और उन्हें किसी प्रकार की हिंसा स्वीकार नहीं थी। उन्होंने सविनय अवज्ञा एवं भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान भी अहिंसक तरीके को चुना।

लाहौर षड़यंत्र प्रकरण के मुकदमें में भगत सिंह एवं राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। कुछ नेताओं का मानना था कि गांधी इरविन के सामने उनकी मुक्ति का प्रस्ताव रख सकते थे। पर गांधी ने ऐसा नहीं किया। गांधी जी भगत सिंह की राष्ट्रभक्ति से व्यक्तिगत तौर पर काफी प्रभावित थे। उन्होंने कई स्थलों पर उनकी तारीफ भी की थी। पर वे भगत सिंह की हिंसा की नीति से सहमत नहीं थे। यही कारण है कि उन्होंने इरविन के सामने भगत सिंह की मुक्ति का प्रस्ताव नहीं रखा।