कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 7

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कांग्रेस की आर्थिक नीति

19वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में बुद्धिजीवियों ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का समर्थन किया क्योंकि उनका मानना था कि अंग्रेज सरकार अत्याधुनिक तकनीक एवं पूंजीवादी आर्थिक संगठन दव्ारा देश का आधुनिकीकरण कर रही है। लेकिन 1860 के पश्चात्‌ भारतीयों में राजनीतिक चेतना का तेजी से प्रसार हुआ तथा ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का वास्तविक स्वरूप उनके सम्मुख उभरने लगा।

कुछ राष्ट्रवादी नेताओं ने इसी समय साम्राज्यवादी सरकार की आर्थिक शोषण की नीति को सार्वजनिक किया तथा लोगों के सामने यह स्पष्ट किया कि अंग्रेज सरकार एक सुविचारित योजना के तहत भारत को लूटने की प्रक्रिया में संलग्न है। इन राष्ट्रवादी आर्थिक विश्लेषकों में दादा भाई नौरोजी का नाम सबसे प्रमुख है, सर्वप्रथम इन्होंने ही ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का विश्लेषण किया। तथा अपनी पुस्तक, पावर्टी (गरीबी) एंड (और) अनब्रिटिश रूल (नियम) इन इंडिया (भारत में), में धन के निकास का सिद्धांत प्रस्तुत किया। दादा भाई नौरोजी के अतिरिक्त जस्टिस (न्याय) महादेव गोविंद रानाडे, रोमेश चंद्र दत्त, गोपाल कृष्ण गोखले भी भारत के प्रमुख आर्थिक विश्लेषकों में से थे। इन राष्ट्रवादी आर्थिक विश्लेषकों ने अपने अध्ययनों से यह सिद्ध किया कि किस प्रकार यह अनाज एवं कच्चे माल के रूप में भारत का धन इंग्लैंड भेजा जाता है, और किस प्रकार वह विनिर्मित उत्पादों का रूप लेकर भारतीय बाजार पर कब्जा करता है। इनके अनुसार भारतीय धन इंग्लैंड पहुंचकर वापस भारत आता है, तथा पुन: उसे यहां पूंजी के रूप में लगा दिया जाता है। इस प्रकार यह देश के शोषण का दुष्चक्र बन चुका है। इन प्रारंभिक राष्ट्रवादी अर्थशासित्रयों ने सरकार के इस अन्यायपूर्ण शोषण के विरुद्ध भारतीय बुद्धिजीवियों को संगठित करने का प्रयत्न किया तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को उपनिवेशी दासता से विमुक्त करने की मांग उठायी। इन्होंने सरकार से मांग की कि भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप भारतीय हितों के अनुरूप तय किया जाए, जिससे देश का समग्र एवं आधुनिक ढंग से विकास हो सके। इन राष्ट्रवादियों का मत था कि भारतीय अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र रूप से विकसित किया जाना चाहिए।

इन राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों के कारण भारत निर्धन से और निर्धन बनता जा रहा है। भारत की निर्धनता मानव निर्मित है तथा इसका स्पष्टीकरण करके इसे दूर किया जा सकता है, इस निर्धनता को एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। इससे समाज के सभी वर्ग के लोगों को यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि उनकी समस्त आर्थिक समस्याएं उपनिवेशी शासन की देन है।

इन राष्ट्रवादी चिंतकों ने भारत के औद्योगीकरण और विकास का भी तुलनात्मक अध्ययन किया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का औद्योगीकरण भारतीय धन पर ही आधारित है न कि ब्रिटेन के धन पर इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि जो धन भारत से बाहर जाता है, उसी धन को ब्रिटिश उद्योगपति पुन: यहां लगा देते हैं और उसी से मुनाफा कमाते हैं। इस प्रकार भारत का जो तथाकथित औद्योगीकरण हो रहा है, उसका आधार भारतीय संसाधन नही है न कि विदेशी धन। इस प्रक्रिया में भारत का धन निरंतर इंग्लैंड की ओर प्रवाहित हो रहा है, तथा इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर इंग्लैंड की पकड़ दिनोदिन मजबूत होती जा रही है। इन आलोचकों के अनुसार, भारत में विदेशी पूंजी निवेशक के प्रभाव अत्यंत घोतक हैं क्योंकि इससे राजनीतिक वशीकरण तथा विदेशी निवेशकों के हितों का पक्षपोषण होता है तथा भारत में विदेशी शासन की निरंतरता को गति मिलती है।

इन्होंने ब्रिटिश सरकार के इस वक्तत्व का खंडन किया कि भारत में विदेशी व्यापार के विकास एवं रेलवे की स्थापना से देश की प्रगति हुयी है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का विदेशी व्यापार देश के बिल्कुल प्रतिकूल है। इस व्यापार ने भारत को कृषिगत वस्तुओं एवं कच्चे माल का निर्यातक तथा तैयार माल का आयातक बना दिया है। इन आलोचकों ने तर्क दिया कि अंग्रेजों ने रेलवे का विकास अपने वाणिज्यिक हितों को पूरा करने के उद्देश्य से किया है न कि भारत को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने के लिये। रेलवे के विकास से भारत की औद्योगिक जरूरतों में समन्वय भी नहीं हो पा रहा है। अंग्रेजों दव्ारा रेलवे के विकास का उद्देश्य, भारत के दूर दराज के क्षेत्रों से कच्चे माल का दोहन एवं विनिर्मित सामान को उन क्षेत्रों में पहुंचाने की अभिलाषा है। इसमें भी अधिक इस्पात उद्योग को बढ़ाने एवं मशीनीकरण (यंत्र) करने का कार्य भी उपनिवेशी हितों को ध्यान में रखकर किया गया है। जी.बी. जोशी ने तर्क दिया कि रेलवे के विकास को ब्रिटिन के उद्योगों दव्ारा भारत के दिये गए अनुदान के रूप में देखा जाना चाहिए।

राष्ट्रवादी आलोचकों ने अंग्रेजों पर आरोप लगाया कि उनके दव्ारा अपनायी गयी एकमार्गी व्यापार नीतियां, भारत के हस्तशिल्प उद्योग का सर्वनाश कर रही है। वित्तीय क्षेत्र में दृष्टिपात करे तो हम पाते हैं कि कर के अत्यधिक बोझ से गरीब दबा हुआ है तथा ब्रिटिश पूंजीपति एवं नौकरशाह मालामाल हो रहे हैं। उन्होंने, भू-राजस्व में कमी करने, नमक कर का उन्मूलन करने, उच्च मध्यवर्गीय लोगों पर आयकर लगाने तथा इस वर्ग दव्ारा उपभोग की जा रही वस्तुओं पर उत्पाद कर लगाने की मांग सरकार से की। इन आलोचकों ने तर्क दिया कि सरकारी व्यय का उद्देश्य उपनिवेशी हितों की पूर्ति करना है, जबकि विकास एवं कल्याण जैसे मुद्दे बिल्कुल उपेक्षित कर दिये गए हैं। इन विदव्ानों ने विदेशी पूंजी के दुरुप्रयोग और कम उपयोग की ओर संकेत किया और यह स्पष्ट किया कि उपनिवेशी शासन जानबूझकर देश की कम विकास की ओर ले जा रहा है।

इन राष्ट्रवादी नेताओं दव्ारा आर्थिक विकास का सिद्धांत प्रस्तुत करने से देश के समक्ष साम्राज्यवादी शासकों की वास्तविक मंशा उजागर हो गयी तथा इस धारणा का खोखलापन सार्वजनिक हो गया कि विदेशी शासन, भारत के हित में है। इस प्रकार इस मिथक की नैतिक अवधारणा का पर्दाफाश हो गया इस सिद्धांत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत निर्धन है, क्योंकि वह उपनिवेशी हितों के अनुरूप शासित किया जा रहा है।