1857 के बाद भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India after 1857) Part 1

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1858 का भारत शासन अधिनियम

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को अपने शासन संबंधी नीति के मूल्यांकन पर मजबूर होना पड़ा। इस मूल्यांकन के अंतर्गत बड़े-बड़े नीतिगत परिवर्तन किए गए। 1858 का अधिनियम इन्हीं परिवर्तनों को दृष्टिगत करता हैं:-

  • प्रशासनिक एवं सैन्य संगठन में भारी परिवर्तन किए गए और उन्हें ब्रिटिश सत्ता के ज्यादा अनुकूल बनाया गया।

  • पार्मस्टन स्टैनली आदि के प्रयास से 1858 ई. को भारत शासन अधिनियम पारित हुआ और सत्ता कंपनी (संघ) से क्राउन के पास चली गई।

  • इंग्लैंड के प्रमुख राज्य मंत्री को भारत सचिव बनाकर 15 सदस्यीय भारत परषिद् के सहयोग से उसे भारतीय शासन का उत्तरदायित्व सौंप दिया गया।

  • नियंत्रण मंडल एवं निर्देशक मंडल समाप्त कर दिए गए।

  • गवर्नर (राज्यपाल) जनरल एवं गवर्नरों की नियुक्ति का अधिकार क्रांउन के हाथों में चला गया।

  • भारत में संपूर्ण प्रशासनिक शक्तियाँ गवर्नर जनरल के पास आ गई जो अब से वायसराय कहलाने लगा।

  • भारतीय परिषद् के निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाने थे, लेकिन भारत सचिव अपनी कौंसिल (परिषद) के बहुमत के विरुद्ध भी निर्णय ले सकता था। भारत सचिव एवं उसकी कौंसिल का खर्च भारतीय राजकोष पर डाल दिया गया।

इस अधिनियम के लागू होने से 1784 के पिटस इंडिया (भारत) एक्ट (अधिनियम) दव्ारा स्थापित दव्ैध शासन व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो गई। देशी राजाओं का क्राउन के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्थापित हो गया और डलहौसी की हड़प नीति निष्प्रभावी हो गई।

1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम

1858 के अधिनियम के दव्ारा भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का सीधा शासन स्थापित हो गया, लेकिन भारत की आंतरिक शासन व्यवस्था लगभग उसी प्रकार की थी। साथ ही केन्द्रीय विधान परिषद में भी अनेक प्रकार के दोष थे, उसका संगठन न तो संतोषजनक था और न ही उसकी शक्तियाँ निश्चित थी। सभी महत्वपूर्ण समस्याएँ केन्द्रीय विधान परिषद् के लिए रखी जाती थी। ब्रिटिश सरकार एवं गवर्नर जनरल के बीच पत्र-व्यवहार भी बहुत बढ़ गया था। अत: इन सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए 1861 में भारतीय विधान परिषद् अधिनियम बनाया गया जिसके प्रावधान निम्न थे-

  • इस अधिनियम दव्ारा गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों की संख्या 4 से बढ़ाकर 5 कर दी गई।

  • लार्ड कैनिंग ने इस अधिनियम के तहत कार्य प्रणाली में सुविधा के लिए ’विभागीय प्रणाली’ शुरू की।

  • वायसराय को सौंपे गए मामले-नए प्रांतों के निर्माण, उप-गवर्नरों की नियुक्ति, आदि से संबंधित थे।

  • गवर्नर जनरल को परिषद् के किसी भी प्रस्ताव को अस्वीकृत करने का अनन्य अधिकार था। गवर्नर जनरल सिर्फ भारत सचिव के प्रति उत्तरदायी था।

  • इस अधिनियम के तहत 1862 ई. में बंगाल में, 1882 ई. में उत्तर-पश्चिमी प्रांत में तथा 1897 ई. में पंजाब में विधान परिषदों का गठन किया गया।

  • इस अधिनियम दव्ारा गवर्नर जनरल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार मिला।

  • मद्रास एवं बंबई के गवर्नर एवं उप-गवर्नर को असाधारण तथा अतिरिक्त सदस्यों के रूप में सर्वोच्च विधान परिषद् की स्थानीय बैठकों में भाग लेने का अधिकार मिला।

इस अधिनियम के दव्ारा भारतीयों में असंतोष बढ़ा। भारतीय जनता को वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं प्राप्त हो सका और विधान परिषद् के अधिकार अत्यंत सीमित हो गए। विधान परिषदों में राजा, महाराजा एवं जमींदारों की ही नियुक्ति की जाती थी। इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके दव्ारा विकेंद्रीकरण की नीति को प्रोत्साहन मिला। भारतीय इसकी मांग काफी समय से करते आ रहे थे। इसने भावी विकास एवं संवैधानिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया।

1892 का भारतीय परिषद् अधिनियम

कांग्रेस की स्थापना के पश्चात्‌ ब्रिटिश सरकार दव्ारा किया गया यह पहला संवैधानिक सुधार का प्रयास था जिसके अंतर्गत निम्न बिन्दु थे:-

  • इस अधिनियम दव्ारा गवर्नर जनरल के विधान-परिषद् तथा प्रांतीय गवर्नरों के परिषदों गैर सरकारी सदस्यों की संख्या में वृद्धि कर दी गई।

  • इस अधिनियम के दव्ारा ही सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने तथा प्रश्नों दव्ारा सूचनाएँ प्राप्त करने का अधिकार मिला।

  • अप्रत्यक्ष रूप से इस अधिनियम दव्ारा निर्वाचन-सिद्धांत को स्वीकार करता था और विधान परिषद को कार्यकारिणी पर कुछ नियंत्रण प्रदान कर भारत में प्रतिनिधि सरकार की स्थापना का मार्ग प्रशस्त्र किया।

  • इस अधिनियम के दव्ारा वित्तीय विकेन्द्रीकरण पर भी जोर दिया गया।

  • राष्ट्रीय कांग्रेस के उदारवादी सदस्य इससे संतुष्ट थे और यह दावा करते थे कि प्रारंभिक कांग्रेस के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। परन्तु उग्रवादी सदस्य इससे असंतुष्ट थे और इसकी कटु आलोचना की।

परिषद् के अतिरिक्त सदस्यों में से 2/5 सदस्य गैर-सरकारी होने थे। ये सदस्य भारतीय समाज के विभिन्न वर्गो, जातियों व विशिष्ट हितों के आधार पर नियुक्त किए गए। यह परंपरा कालांतर में भारतीय राष्ट्रीय एकता के विकास में बाधक बनी।

इस अधिनियम दव्ारा एक ओर जहां संसदीय प्रणाली का रास्ता खुला एवं भारतीयों को कौंसिल में अधिक स्थान मिला, वहीं दूसरी ओर चुनाव पद्धति एवं गैर-सदस्यों की संख्या में वृद्धि ने असंतोष पैदा किया।