भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 1for Competitive Exams

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कांग्रेस के प्रारम्भिक लक्ष्य-

  • देशवासियों में व्यक्तिगत घनिष्टता और मैत्री को बढ़ावा देना।

  • जाति, धर्म या प्रांतों से संबंधित सभी संभावित पूर्वाग्रहों का उन्मूलन।

  • राष्ट्रीय एकता की भावनाओं को सुदृढ़ करना।

  • समकालीन विकट समस्याओं के संबंध में शिक्षित वर्गों की सहमति प्राप्त करना।

  • लोकहित में भावी कार्य-दिशा का निर्धारण।

उदारवादी राजनीति का चरण

कांग्रेस के नेतृत्व में ही भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात हुआ, जिसका उद्देश्य भारत को विदेशी शासन से मुक्त करना था। कांग्रेस की स्थापना के साथ ही इस पर उदारवादी राष्ट्रीय नेताओं का वर्चस्व हो गया। प्रारंभ में यह भारत के शिक्षित तथा अभिजात वर्ग के लोगों की एक संस्था थी। यह सही मायने में भारत की प्रतिनिधि सभा नहीं थी। इसके सदस्य नरम राष्ट्रीयता के पोषक थे और विनम्र शब्दों में सरकारी कार्यो की आलोचना कर उनमें सुधार के सुझाव देते थे। कांग्रेस का उद्देश्य प्रारंभ में भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना नहीं था। कांग्रेस के अधिवेशन में पास प्रस्ताव बड़े विनम्र शब्दों में होते थे और सरकार के प्रति किसी प्रकार के विद्रोह का लक्ष्य नहीं रखते थे। चूँकि सरकार से कांग्रेस का कोई विरोध नहीं था इसलिए भारतीय तथा अंग्रेज कर्मचारी भी इसके कार्यों में भाग लेते थे। लार्ड डफरिन तथा मद्रास के गवर्नर (राज्यपाल) ने क्रमश: इसके दूसरे तथा तीसरे अधिवेशन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को सरकारी भवन में प्रतिभोज दिया था।

नरम राष्ट्रवादियों की अंग्रेजों की न्यायप्रियता में दृढ़ आस्था थी। उनका प्रमुख ध्येय था भारतीय शासन का प्रजातंत्रीकरण तथा विधानसभाओं में भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि। वे ब्रिटिश सम्राट के प्रति राजभक्ति दिखाते थे और राजनीतिक जागरण के लिए अपने को अंग्रेजों का कृतज्ञ मानते थे। कांग्रेस के 12वें अधिवेशन में रहमतुल्ला ने कहा था- ’अंग्रेजों से अधिक ईमानदार और शक्तिसंपन्न जाति सूर्य के नीचे और कोई नहीं है।’ चूंकि उदारवादियों का अंग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था इसलिए वे वैधानिक आंदोलन दव्ारा ही अपनी मांगो की पूर्ति करने का प्रयास करते थे। उदारवादी युग में कांग्रेस दव्ारा कई राजनीतिक माँगे पेश की गई थी-

  • धारा- सभा का विस्तार हो और इसके सदस्य जनता दव्ारा निर्वाचित हों।

  • केन्द्रीय तथा प्रांतीय धारा-सभाओं में भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि लाई जाए।

  • न्याय- व्यवस्था में जूरी का प्रयोग हो।

  • परिषदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू में तथा उच्च नौकरियों में भारतीयों के स्थान मिले तथा भारतीयों को उच्च सैनिक शिक्षा दी जाए।

  • शस्त्र कानून में संशोधन लाया जाए।

  • 1905 ई. में गोखले ने ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वायत्त शासन की मांग की। 1906 ई. में इसी मांग को दादा भाई नवरोजी ने दोहराया। कांग्रेस ने सामाजिक और आर्थिक जीवन के क्षेत्र में आवश्यक सुधार लाने के लिए कुछ मांगे रखी थी-

  • भूमि कर में कमी की जाए।

  • सिंचाई की व्यवस्था हो।

  • भारतीय उद्योग-धंधों को प्रोत्साहित किया जाए एवं उसका आधुनिकीकरण किया जाए।

  • भारत से बाहर भेजे जाने वाले अनाज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाए।

  • शासन के व्यय में कमी की जाए।

  • नमक-कर को समाप्त किया जाए।

1887 में दादाभाई नवरोजी इंग्लैंड में भारतीय सुधार समिति की स्थापना की। 1889 में कांग्रेस की ब्रिटिश समिति बनी जिसने इंडिया (भारत) नाम की एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। इसके माध्यम से इंग्लैंड के नागरिकों को भारत की यथास्थिति से परिचित कराया जाता था। कांग्रेस ने भारतीयों की समस्याओं के निवारण हेतु समय-समय पर अपना प्रतिनिधि मंडल ब्रिटेन भेजा। इन समस्त प्रयासों का प्रतिफल यह रहा कि इंग्लैंड में भारतीय जनमानस की समस्याओं के प्रति सहानुभूति रखने वाले एक गुट का निर्माण हुआ। नि:संदेह यह कहा जा सकता है कि उदारवादियो ने सर्वप्रथम भारत में राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा दी और कांग्रेस के मंच से ही भारतीयों की राजनीतिक शिक्षा दी जा सकी।

आरंभ में कांग्रेस की स्थापना को ब्रिटिश कूटनीति की महान विजय समझा जाता था परन्तु सरकार और कांग्रेस के बीच यह मधुर संबंध अधिक समय तक कायम नहीं रह सका। 1888 ई. से सरकार की कांग्रेस संबंधी नीति में परिवर्तन हुआ। डफरिन ने एक भोज के अवसर पर कहा-अब कांग्रेस का झुकाव राजद्रोह की ओर हो गया है और यह शिक्षित भारतीयों का नाममात्र का प्रतिनिधित्व करती है। 1890 ई. में सरकार ने एक विज्ञप्ति निकाली जिसके अनुसार सरकारी कर्मचारियों को इस संगठन में भाग लेने की मनाही की गई। मुसलमानों को भी कांग्रेस के कार्यो से अलग रखने की चेष्टा होने लगी। सरकार के इस बदलते रूख के बावजूद कांग्रेस अपने रास्ते में चलती रही। कांग्रेस की ओर देश के विभिन्न भागों में सभाएँ की जाने लगीं और राष्ट्रीय माँगों की पूर्ति के लिए प्रस्ताव पारित होने लगे। किन्तु, अब भी कांग्रेसी नेताओं का अंग्रेजों में विश्वास था। ब्रिटिश संसद के सदस्य चार्ल्स ब्रेडले और सर वेडरबर्न के प्रयत्नों के फलस्वरूप 1892 में इंडियन (भारतीय) कौंसिल (परिषद) एक्ट (अधिनियम) पास हुआ, जिससे भारतीय विधानमंडल में कुछ सुधार हुए। पर भारतीयों को जो थोड़े-बहुत राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए थे उन पर भी कुठाराघात होने लगा। 1898 में एक कानून पारित हुआ जिसके अनुसार अंग्रेजी शासन की आलोचना करना अपराध माना गया। 1899 में कलकत्ता कॉरपोरेशन (निगम) के भारतीय सदस्यों की संख्या को कम कर दिया गया। 1904 में प्रेस (मुद्रण यंत्र) की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई इससे उदारवादियों में असंतोष बढ़ने लगा। कांग्रेस के कुछ सदस्यों को विश्वास हो गया कि केवल प्रस्ताव पारित करने से उद्देश्य सिद्धि नहीं होगा, इसके लिए कुछ अधिक ठोस कदम उठाने होंगे।

उदारवादियों के समय ही भारतीय राजनीतिक रंगमंच पर बाल गंगाधर तिलक का पदार्पण हुआ। उनका कहना था कि कांग्रेस की नरमी और राजभक्ति स्वतंत्रता प्राप्त करने में बाधक है। केवल प्रस्ताव पास करने तथा अंग्रेजों के सामने हाथ पसारने से राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होगे, बल्कि उनके लिए आंदोलन करना होगा। उनका दृढ़ विश्वास था कि ब्रिटिश शासन के अंत के बिना देश का कल्याण संभव नहीं हैं। उन्होंने गणपति समारोह और शिवाजी समारोह का आयोजन कर लोगों की धार्मिक भावना को जगाया तथा उनमें राष्ट्र के प्रति भक्ति पैदा की। उन्होंने विद्यार्थी के लिए अनुशासन एवं स्वास्थ्य पर भी अधिक जोर दिया ताकि युवकों में साहस का विकास हो और वे निर्भीक होकर राष्ट्रीय आंदोलन में भाग ले सके। तिलक, जिन्हें अंग्रेज ’भारतीय अशांति का जनक’ कहकर पुकारते थे, 1897 में राजद्रोह के अपराध में गिरफ्तार कर लिये गए और उन्हें 18 माह के कारावास की सजा दी गई। तिलक की गिरफ्तारी से भारतवासी क्षुब्ध हो उठे और देश में घोर असंतोष फैल गया नि:संदेह कुछ समय के लिये राष्ट्रीय प्रगति रूक गई थी और भारत के राजनीतिक गगन में शांति कायम हो गई थी किन्तु यह शांति आने वाले झंझावत का द्योतक थी, जो 1905 में फूट पड़ी।

1905 ई. तक कांग्रेस पूर्णतया उदारवादियों तथा नरम दलीय नेताओं के प्रभाव में थी, जो अंग्रेजों की न्यायशीलता तथा सच्चाई में विश्वास करते थे। वे शासन में किसी महत्वपूर्ण या मूलभूत परिवर्तन के समर्थक नहीं थे, अपितु परिषदों, सरकारी सेवाओं, स्थानीय संस्थाओं और रक्षा सेवाओं में क्रमिक सुधार की मांग करते रहें। दादाभाई नवरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोज शाह मेहता, महादेव गोविन्द रानाडे प्रमुख उदारवादी नेता थे। राष्ट्रीयवादी लेखक गुरूमुख निहालसिंह के शब्दों में -आरंभ में कांग्रेस दव्ारा राजभक्ति की प्रतिज्ञा, नरम नीति, आवेदन की नहीं वरन भिक्षावृत्ति की नीति अपनाने पर भी उसने यह समय राष्ट्रीय जागृति राजनीतिक शिक्षा तथा भारतीयों को एक सूत्र में बांधने और उनमें सामान्य भारतीय राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने में लगाया।

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