भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 11

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क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा चरण

1922 ई. में असहयोग आंदोलन के स्थगन के चलते सारे देश में निराशा की लहर छा गई और यह क्रांतिकारी घटनाओं के लिए अनुकूल साबित हुई। 1924 ई. में एक लंबे अरसे के बाद लखनऊ में क्रांतिकारीयों की एक सभा हुई, जिसमें ’हिन्दुस्तान रिपब्लिक (गणतंत्र) एसोसिएशन (सम्मेलन)’ का गठन किया गया। राम प्रसाद बिस्मिल इसके अध्यक्ष थे।

राष्ट्रीय मंचों पर इस काल में समाजवादी विचारधारा मुखर हो रही थी। क्रांतिकारियों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। धीरे-धीरे क्रांतिकारी में समाजवादी विचारधारा बढ़ी। सितंबर, 1928 ई. में भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, भगवती चरण बोहरा, सुखदेव आदि ने मिलने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में सभा आयोजित की और ’हिन्दुस्तान सोशलिस्ट (समाजवादी) रिपब्लिकन (गणतंत्र) एसोसिएशन (सम्मेलन)’ की स्थापना व इसमें संगठित क्रांतिकारी कार्यवाही में विश्वास व्यक्त किए जाने के साथ-साथ समाजवाद की स्थापना किए जाने के लिए लक्ष्य निर्धारित किया गया।

इस काल में क्रांतिकारीयों ने बहुत सी घटनाओं को अंजाम दिया, जिनमें कुछ निम्न महत्वपूर्ण हैं-

  • काकोरी स्टेशन (उत्तर प्रदेश) पर पंजाब मेल में सरकारी खजाने की लूट।

  • लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने हेतु पुलिस सहायक अधीक्षक सांडर्स की हत्या।

  • विधान मंडल में बम का धमाका तथा पर्चे फेंकना।

  • न्यायालय में अपनी बात कहने का मंत्र की तरह इस्तेमाल।

क्रांतिकारी आंदोलन का स्वरूप

क्रांतिकारी आंदोलन बहुत अधिक सफल नहीं रहा। सही मायने में इसने एक शहरी और मध्यम वर्गीय आंदोलन का ही रूप लिया। इससे सहानुभति रखने वालों की संख्या बहुत ही सीमित थी। इस आंदोलन में एक केन्द्रीय संगठन नहीं था, जिससे कार्यक्रमों की एकरूपता नहीं रही। इसके अतिरिक्त क्रांतिकारी आंदोलन का कोई आर्थिक कार्यक्रम नहीं था, जो एक बहुत कमजोर साबित हुई। भारत में अंग्रेजों का विरोध सिर्फ राजनीतिक कारणों के चलते ही नहीं हो रहा था, बल्कि इसके पीछे महत्व आर्थिक कारण भी थे। परन्तु क्रांतिकारियों ने कोई आर्थिक कार्यक्रम नहीं अपनाया, जिसके चलते किसान और मजदूर इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए।

लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि क्रांतिकारी का राष्ट्रीय आंदोलन पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। क्रांतिकारीयों ने ढंग से जनता में जागृति लाने और उसे क्रांति के लिए तैयार करने का कार्य किया। कांग्रेस के वैधानिक और क्रांतिकारी आंदोलन एक-दूसरे के लिए पूरक का काम किया। इसमें कोई शक नहीं कि अंग्रेज क्रांतिकारियों से घबराते थे। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि लोग इस आंदोलन में भाग लें, परन्तु वे यह भी समझते थे कि ऐसा तभी संभव था जब ब्रिटिश सरकार वैधानिक आंदोलनकारियों की मांगों को माने, जिससे कि लोगों की आस्था वैधानिक आंदोलन में बनी रहे। इस अर्थ में क्रांतिकारी दल का उदय हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए काफी महत्वपूर्ण था।