भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 12

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क्रांतिकारी आंदोलन की असफलता के कारण

क्र्रांतिकारी आंदोलन की असफलता के निम्नलिखित कारण थे-

  • केन्द्रीय संगठन का अभाव- क्रांतिकारीयों का कोई केन्द्रीय संगठन नहीं था जो विभिन्न प्रांतों में क्रांतिकारी आतंकवादी कार्यो का संगठन तथा समन्वय कर सके।

  • आंदोलन का नवयुवकों तक सीमित होना- क्रांतिकारी आंदोलन मध्यम वर्ग के शिक्षित नवयुवकों तक ही सीमित था।

  • लोकप्रिय आंदोलन नहीं- क्रांतिकारी आतंकवादी आंदोलन लोकप्रिय नहीं बन सका। जिससे जनसाधारण का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त न हो सका।

  • उच्च मध्य वर्ग की सहानुभूति का अभाव- क्रांतिकारी आंदोलन को उच्च मध्य वर्ग की सहानुभूति भी नहीं मिल सकी, क्योंकि ये हिंसा कार्यो में विश्वास नहीं करते थे। ये संवैधानिक साधनों में विश्वास करते थे।

  • ब्रिटिश सरकार का दमन चक्र- क्रांतिकारी आंदोलन की असफलता का मुख्य कारण अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीति थी। सरकार ने 1907 में सभाएँ करने पर प्रतिबंध लगा दिया, 1908 ई. में ’विद्रोह सभा अधिनियम’ भी पास कर दिया। जिसका उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड दिया जाता था। 1908 में ही फौजदारी कानून में संशोधन लाकर और अधिक कठोर बना दिया गया। मामूली से अपराध के लिए भी भारतीयों को मृत्यु दंड दिया जाता था। 1908 ई. में ही समाचार-पत्र संबंधी कानून और 1910 ई. में प्रेस (मुद्रण यंत्र) संबंधी कानून बनाये गए। 1911 ई. में विद्रोही सभाओं संबंधी कानून पास हुआ, इसका उद्देश्य था सभाओं पर प्रतिबंध लगाना।

  • धन का अभाव- क्रांतिकारियों के पास धन का अभाव था, जिसके कारण वे अपनी गतिविधियों को ठीक तरीके से चलाने में असमर्थ थे।

  • महात्मा गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश- गांधी जी के राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश करने से क्रांतिकारी आंदोलन को गहरा धक्का लगा। गांधी जी ने देश की आजादी के लिए अहिंसा एवं शांतिपूर्ण मार्ग अपनाया, इससे जनता गांधी जी की ओर आकर्षित हुई।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन (गणतंत्रवादी) एसोसिएशन (सम्मेलन)

अक्टूबर, 1924 ई. को कानपुर में सभी क्रांतिकारी संगठनों, दलों का एक सम्मेलन बुलाया गया। इस सम्मेलन में रामप्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, जगदीशचन्द्र चटर्जी जैसे क्रांतिकारियों के साथ-साथ भगतसिंह, चन्द्रशेखर, शिव वर्मा, सुखदेव, भगवती चरण वोहरा आदि तरूण युवकों ने भाग लिया। इन्होंने शीघ्र ही ’हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना कर सशस्त्र क्रांति आयोजित करने के लिए प्रयास जारी कर दिया। पंजाब, दिल्ली, मद्रास तथा उत्तर प्रदेश में इस एसोसिएशन (सम्मेलन) की शाखाएँ स्थापित की गयी। इस संस्था के निम्नलिखित उद्देश्य थे-

  • गांधी जी की अहिंसावादी नीतियों की निरर्थकता के प्रति जागृति पैदा करना।

  • पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सीधी कार्यवाही करना तथा जनता को बताना कि बिना क्रांतिकारी आंतकवाद के आजादी नहीं मिल सकती।

  • समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर भारत में संघीय गणतंत्र की स्थापना करना।