भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 7

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सूरत की फूट

कांग्रेस के तरुण वर्ग के लोगों में हाथ पसारने की नीति के प्रति आस्था नहीं रही और अंग्रेजों की न्याय-निष्ठा में तृणमात्र भी विश्वास नहीं रहा। फलत: कांग्रेस दो दलों में बंट गई-नरम दल और गरम दल। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में उभरा मतभेद समाप्त तो नहीं हुआ था पर दब अवश्य गया था, जिसका परिणाम 1907 में सूरत के कांग्रेस अधिवेशन में दिखा। नरम दल के प्रमुख नेता गोखले, फिरोजशाह मेहता और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे। ये भारत की उन्नति वैधानिक विकास दव्ारा चाहते थे। गरम दल के उग्रवादियों को विश्वास था कि प्रार्थना करने एवं भीख माँगने से स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। ये सबल नीति के पक्ष में थे। इनके प्रमुख नेता थे- लाल, बाल और पाल।

स्वराज्य के अर्थ को लेकर दोनों दलों में मतभेद था। नरमदल के कांग्रेसियों ने इसका अर्थ लगाया कि वैधानिक तरीकों पर चलकर उत्तरदायी शासन की नींव डाली जाए। गरम दल वालों ने इसका अर्थ, पूर्ण स्वराज्य लगाया। इस बुनियादी भेद के कारण फूट अनिवार्य थी। आगे चलकर 1916 ई. में लखनऊ अधिवेशन में उग्रवादियों और उदारवादियों में समझौता हुआ और वे एक हो गए।

क्रांतिकारी आंदोलन का चरण (1906-25)

जिस समय कांग्रेस के राजनीतिक मंच पर गरम और नरम दलों का प्रादुर्भाव हो रहा था उस समय देश में एक दूसरी विचारधारा भी उत्पन्न हो रही थी। यह आतंकवादी या क्रांतिकारी विचारधारा थीं। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि गरम दलवालों के दव्ारा ही तैयार की गई थी।